न लालू की रैली, न पासवान की सभा, इस बार बहुत बदली दिखेगी बिहार की चुनावी फिजा

बिहार की सियासत में इस बार उन नेताओं की कमी जरूर महसूस होगी, जो अपने भाषणों के जरिए सियासी फिजा को बदल देने की ताकत रखते थे. इनमें लालू यादव जेल में बंद होने के चलते नजर नहीं आएंगे तो रामविलास पासवान, शरद यादव, बशिष्ठ नारायण सिंह बीमार चल रहे हैं जबकि रघुवंश प्रसाद सिंह का निधन हो चुका है.

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वीपी सिंह के साथ, शरद यादव, लालू यादव, रामविलास पासवान वीपी सिंह के साथ, शरद यादव, लालू यादव, रामविलास पासवान

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 02 अक्टूबर 2020,
  • अपडेटेड 2:30 PM IST
  • लालू अपने भाषणों से सियासी फिजा बदल देते थे
  • रामविलास पासवान बीमार होने के चलते नहीं दिखेंगे
  • रघुवंश प्रसाद सिंह की कमी इस बार चुनाव में खलेगी

बिहार विधानसभा चुनाव की सियासी हवा तेजी से बहने लगी है. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए और तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले महागठबंधन के बीच मुख्य मुकाबला माना जा रहा है. हालांकि, बिहार की सियासत में इस बार उन नेताओं की कमी जरूर महसूस होगी, जो अपने भाषणों के जरिए सियासी फिजा को बदल देने की ताकत रखते थे. 

कोरोना संक्रमण के बीच हो रहे बिहार चुनाव का माहौल पहले से ही फीका-फीका है. इस बार न तो बड़ी-बड़ी रैलियां होंगी और न ही चुनावी शोर की गूंज लोगों के कानों में सुनाई देगी. चुनाव प्रचार के नाम पर सिर्फ वर्चुअल रैली और 5 लोगों के साथ जनसंपर्क करने की इजाजत ही चुनाव अयोग ने दी है, हालांकि अब कुछ और रैलियों की इजाजत देने की बात कही जा रही है. इसके अलावा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चुनाव प्रचार में मौजूदगी रहेगी, लेकिन बिहार के आधा दर्जन बड़े नेताओं की आवाज चुनावी समर में नहीं सुनने को नहीं मिलेगी, जो पिछले पांच दशक से बिहार की सियासत की धुरी बने हुए थे. 

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आरजेडी के प्रमुख लालू यादव चारा घोटाला मामले में जेल में सजा काट रहे हैं, जिसके चलते इस बार की चुनावी फिजा में उनकी आवाज नहीं सुनाई देगी. 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने सबसे ज्यादा करीब 250 रैलियों को संबोधित किया था. संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए गए बयान को लेकर लालू यादव ने ऐसा मुद्दा बनाया कि बीजेपी का पूरा चुनाव प्रचार भागवत के बयान का खंडन करते-करते बीत गया था. 

लालू ने अपने भाषणों के जरिए नरेंद्र मोदी की लहर को बिहार में फीका कर दिया था. लालू यादव के बोलने का अपना अंदाज है, जिसे लोग बिहार ही नहीं बल्कि देश भर में पंसद करते हैं. हालांकि, लालू प्रसाद को अगर जमानत मिल भी गई और कोर्ट की अनुमति मिलती है तो वो चुनाव प्रचार कर सकते हैं, पर उनकी तबीयत जिस तरह से खराब है. उसे देखते हुए बहुत मुश्किल है कि वो चुनावी प्रचार करते दिखें.  

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केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान पिछले कुछ हफ्तों से बीमार चल रहे हैं. बीमार होने के कारण पासवान फिलहाल दिल्ली के एक निजी अस्पताल में आईसीयू में भर्ती हैं, जहां पर उनका इलाज चल रहा है. ऐसे में इस बार के चुनावी समर से वो दूर ही रहेंगे जबकि 2015 के चुनाव में उन्होंने 70 से ज्यादा रैलियां संबोधित की थी. पासवान की राजनीतिक विरासत उनके बेटे चिराग संभाल रहे हैं और ऐसे में इस बार पार्टी की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है. 

ओबीसी सिसायत के बिहार में दूसरे चेहरे पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव हैं, जिनकी आवाज इस बार के चुनाव में नहीं सुनाई देगी. शरद यादव काफी दिनों से बीमार चल रहे हैं और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है, जिसके चलते वो चुनाव मैदान में नहीं दिखेंगे जबकि 2015 में जेडीयू के तत्कालीन अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने 40 जनसभाएं संबोधित की थी. ओबीसी की राजनीति के दिग्गज नेता शरद यादव का जन्म तो मध्य प्रदेश में हुआ था, लेकिन उन्होंने अपनी कर्मभूमि बिहार को बनाया था. 

वहीं, जेडीयू बिहार के प्रदेश अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह भी बीमार चल रहे हैं और फिलहाल दिल्ली में हैं. ऐसे में उनके भी चुनाव प्रचार में उतरने की बहुत ही कम संभावना है. वे नीतीश के राइटहैंड माने जाते हैं, जिन्हें पार्टी में लोग दादा कहकर बुलाते हैं. जेडीयू कार्यकर्ताओं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच पुल का काम करते हैं. हालांकि, इस बार की चुनावी फिजा में उनके भी उतरने की संभावना बहुत ही कम है. 

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ऐसे ही रघुवंश प्रसाद सिंह की भी कमी इस चुनाव में खलेगी. हाल ही में उनका निधन हो गया था. हालांकि वे लालू के सबसे करीबी नेताओं में से एक थे. सवर्ण होते हुए भी उनकी पकड़ दलित और ओबीसी समुदाय के बीच थी. वो समाजवादी नेता थे और जमीन से जुड़े होने के साथ-साथ ठेठ देसी अंदाज के चलते उन्हें सुनने के लिए बिहार में लोगों में उत्सुकता रहती थी. 2015 में रघुवंश प्रसाद सिंह ने 100 से अधिक सभाएं और रोड शो किए थे. 

 

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