WorldEnvironmentDay: 21वीं सदी के अंत तक खत्म हो जाएगी धरती

आज भले ही कितनी भी चिंता जाहिर कर लें हम पर्यावरण के लिएलेकिन हम सब जानते हैं कि ये बर्बाद हमारी वजह से हो रहा है. विशेषज्ञों की मानें तो अगर ऐसा ही चलता रहा तो 21वीं सदी के अंत तक धरती नष्ट हो जाएगी. ं 

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वंदना भारती

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  • 05 जून 2017,
  • अपडेटेड 11:35 AM IST

आज जहां हम रहकर खुलकर सांस ले रहे हैं, हम उस धरती मां के शुक्रगुजार हैं. लेकिन धरती मां के साथ उस पर्यावरण के भी शुक्रगुजार है जिसकी खुली हवाओं के बीच हम सांस ले रहें हैं. आज दुनिया में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है. इसकी शुरुआत 5 जून 1974 को हुई थी. विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का सिर्फ एक ही उद्देश्य है, लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना.

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फॉरेस्ट रिसर्च ऑफ इंडिया स्टडी की रिपोर्ट के अनुसार साल 1880 से 2013 के बीच भारत में जंगल का क्षेत्र 40 फीसदी कम हो गया है. ये बात किसी से नहीं छुपी है कि आप और हम ना जाने कितनी ही बार पर्यावरण को चोट पहुंचा रहे हैं. पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं. अगर आज भी हम नहीं जागे तो भविष्य में कुछ नहीं बचेगा और पर्यावरण के विनाश के सबसे बड़े जिम्मेदार हम ही होंगे. शायद इस बात का अंदाजा पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव को पहले ही हो गया था, इसलिए उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा था कि मेरे मरने के बाद मेरी प्रतिमाएं न बनवाई जाएं. अगर आप मुझसे प्रेम करते हैं तो मेरे नाम से एक पेड़ लगाएं.



बर्बादी की ओर धकेल रहे है हम पर्यावरण को
1. साल 1972 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मानव पर्यावरण विषय पर संयुक्त राष्ट्र महासभा का आयोजन किया गया था.

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2. इसमें हर साल 143 से अधिक देश हिस्सा लेते हैं.

3. आपको जाकर हैरानी होगी कि 6 अरब किलोग्राम कू़ड़ा हर रोज समंदर में डाला जाता हैं.

4. भारत हर साल प्रदूषण की वजह से 2 लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठा रहा है.

5. रिसर्च के मुताबिक हर 8 सेकेंड में एक बच्चा गंदा पानी से मर जाता है.

6. 10 लाख टन तेल की शिंपिग के दौरान 1 लाख टन समुद्र में गिर जाता है.

7. वहीं मुंबई के हवा को सांस लेना 100 सिगरेट पीने के बराबर माना गया है.

8. ये कहना गलत नहीं होगा कि पर्यावरण का हम खुद गला घोंट रहे हैं. हम ये बात अच्छे से जानते हैं कि पृथ्वी के लिए सबसे घातक पॉलीथीन है क्योंकि इसके इस्तेमाल से भूमि की उर्वरक क्षमता नष्ट हो रही है. वहीं इसे जलाने से निकलने वाला धुआं ओजोन परत को नुकसान पहुंचाता है, जो ग्लोबल वार्मिग का सबसे बड़ा कारण है.

9. वहीं अगर पर्यावरण दूषित होता है तो इसका सीधा असर पृथ्वी पर पड़ता है. पृथ्वी के औसत तापमान में बढ़ोतरी ही ग्लोबल वार्मिग कहलाती है. 20वीं शताब्दी के शुरुआत से ही पृथ्वी के तापमान में बढ़ोतरी की शुरुआत हो गई थी. पृथ्वी के तापमान में पिछले सौ सालों में 0.18 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की वृद्धि हो चुकी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि धरती का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो 21वीं सदी के अंत तक 1.1- 6.4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ़ जाएगा. जो पृथ्वी को नष्ट करने के लिए काफी है.

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10. हम कई बार कह देते है कि मौसम खराब चल रहा है. लेकिन ये क्यों भूल जाते है कि इस खराब मौसम की सबसे बड़ी वजह तो हम ही हैं. ना जाने कब हम पेड़ को काटना और नदियों, तालाबों को गंदा करना कब बंद करेंगे.

11. हर साल बहुत सारे पर्यावरण से जुड़े गैर-सरकारी संगठन अंतराष्ट्रीय पर्यावरणीय मुददों पर बात करते हैं, लेकिन सिर्फ बात करने से ही जिम्मेदारियों का एहससास नहीं होता. उसके लिए कुछ करना पड़ता है. भले ही हम अब चाहे कुछ कर लें पर आज का पर्यावरण बर्बादी की ओर जा चुका है. और उस पर्यावरण का गला घोंटने वाला कोई ओर नहीं बल्कि हम है.

 

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