सजा-ए-मौत बरकरार, पर क्या फांसी पर लटकाए जाएंगे निर्भया के दोषी!

निर्भया कांड के दोषियों की फांसी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है. पूरे देश ने सर्वोच्च अदालत के इस फैसले का स्वागत किया है. पांच साल बाद इस मामले में इंसाफ तो मिल गया लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल भी सबके सामने है, क्या सच में इन दोषियों को फांसी हो पाएगी? दरअसल, इस सवाल के पैदा होने की कई पुख्ता वजह हैं, जो कहीं न कहीं इस सवाल को मजबूत बनाती हैं.

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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बराकरार रखा है इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बराकरार रखा है

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 06 मई 2017,
  • अपडेटेड 7:19 AM IST

निर्भया कांड के दोषियों की फांसी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है. पूरे देश ने सर्वोच्च अदालत के इस फैसले का स्वागत किया है. पांच साल बाद इस मामले में इंसाफ तो मिल गया लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल भी सबके सामने है, क्या सच में इन दोषियों को फांसी हो पाएगी? दरअसल, इस सवाल के पैदा होने की कई पुख्ता वजह हैं, जो कहीं न कहीं इस सवाल को मजबूत बनाती हैं.

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दस वर्षों में 1300 को फांसी की सजा
भारत में सजा-ए-मौत विरले से विरले मामलों में ही दिए जाने का प्रावधान है. यदि अपराध की प्रवृत्ति बहुत संगीन हो तो दोषी को उम्रकैद बामुशक्कत की सजा दी जाती है. अदालतें भी सजा-ए-मौत कम ही मामलों में सुनाती हैं. वर्ष 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले 10 वर्षों के दौरान 1300 से ज्यादा अपराधियों को सुनाई गई.

केवल पांच लोगों को मिली फांसी
जिन 1300 लोगों को फांसी की सजा दी गई, उनमें से केवल पांच लोगों को ही फांसी के फंदे पर लटकाया गया. सजा पाने और फांसी पर लटकाए जाने वाले लोगों की संख्या में एक बहुत बड़ा अंतर है. यहीं अंतर उस सवाल को बल देता है कि क्या निर्भाय के दोषियों को भी सजा-ए-मौत दी जा सकेगी.

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22 वर्षों में केवल इन्हें मिली फांसी
पिछले 22 वर्षों के दौरान सिर्फ पांच लोगों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया. जिसमें 1999 में ऑटो शंकर, 2004 में धनंजय चटर्जी, 2012 में आमिर अजमल कसाब और 2013 में अफजल गुरु और 2015 में याकूब मेमन को फांसी पर लटकाया गया. एक अनुमान के अनुसार भारत में हर साल तकरीबन सवा सौ लोगों को फांसी की सजा मिलती हैं, मगर वो अमल में नहीं लाई जाती. जिसकी वजह है इस सजा की लंबी प्रक्रिया और उसके बाद के विकल्प.

सजा के बाद भी तीन विकल्प
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट से मौत की सजा पाए लोगों के सामने भी फैसले को चुनौती देने के लिए तीन विकल्प खुले रहते हैं. जिनमें पुनर्विचार याचिका, राष्ट्रपति के यहां दया याचिका और क्यूरेटिव याचिका का विकल्प शामिल हैं. ये विकल्प भी कहीं न कहीं इस सवाल के पैदा होने का कारण बनते नजर आते हैं.

पुनर्विचार याचिका
निर्भया गैंग रेप और हत्या के चारों दोषियों को की तीन जजों की खंडपीठ ने फांसी की सजा सुनाई है. लेकिन ये तीनों अभी मौत से बचने के लिए बड़ी खंडपीठ के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर कर सकते हैं. बड़ी खंठपीठ से आशय है, तीन जजों से ज्यादा जजों वाली खंडपीठ. जिसमें इस मामले पर पुनः सुनवाई की जा सकती है.

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राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका
अगर दोषियों की पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो जाती है, तो ये चारों राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल कर अपनी जान बख्शने की गुहार लगा सकते हैं. इसके बाद यह फैसला पूरी तरह से राष्ट्रपति के ऊपर है कि वह इनकी फांसी की सजा को बरकरार रहने दें या फिर उसे उम्रकैद में तब्दील कर दें. राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह पर इस बारे में फैसला लेते हैं.

क्यूरेटिव याचिका
क्यूरेटिव याचिका तब दाखिल की जाती है, जब किसी दोषी की राष्ट्रपति के पास भेजी गई दया याचिका और सुप्रीम कोर्ट में डाली गई पुनर्विचार याचिका दोनों खारिज हो जाएं. इसके तहत सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हो जाता है. लेकिन याचिकाकर्ता को यह बताना होता है कि वह किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रहा है.

अब क्या करेंगे निर्भया कांड के दोषी
भारत में सजा-ए-मौत का इतिहास इस बात का गवाह है. सर्वोच्च अदालत से मौत की सजा पाने वाले अपराधी भी फांसी के फंदे तक नहीं जा पाते. जिसकी वजह है कानून में दोषियों को मिलने वाले विकल्प और मानव अधिकार संरक्षण संबंधी प्रावधान. बहरहाल, अब देखना दिलचस्प होगा कि सजा-ए-मौत पाने के बाद निर्भया मामले के चारों दोषी अब किस विकल्प का इस्तेमाल करेंगे.

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