सिया की साजिश, केतन का कत्ल और पुलिस का खेल... 5 दिनों तक खाई में लावारिस पड़ी रही डमी, ऐसे हुआ खुलासा

केतन अग्रवाल हत्याकांड में पुणे पुलिस ने पूरे तमाशे के साथ डमी ट्रायल किया था, जिस पर सवाल खड़े हो गए हैं. 'आज तक' की टीम ने खुलासा किया कि पुलिस द्वारा इस्तेमाल की गई डमी पांच दिन तक लोहगढ़ किले की खाई में लावारिस पड़ी रही. लेकिन 'आज तक' की खबर के बाद पुलिस ने डमी को वहां से हटाया. पढ़ें पूरी कहानी.

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'आज तक' की खबर के बाद पुणे पुलिस हरकत में आई (फोटो-ITG) 'आज तक' की खबर के बाद पुणे पुलिस हरकत में आई (फोटो-ITG)

aajtak.in

  • पुणे,
  • 06 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 8:08 PM IST

केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में पुणे पुलिस का बहुचर्चित डमी ट्रायल अब सवालों के घेरे में आ गया है. 'आज तक' की पड़ताल में सामने आया कि जिस डमी को पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने जांच के नाम पर लोहगढ़ किले की खाई में गिराया था, उसे पांच दिन तक वहीं लावारिस छोड़ दिया गया था. हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने डमी के गिरने के बाद उसकी फॉरेंसिक जांच तक नहीं की. 'आज तक' की टीम जब मौके पर पहुंची तो जो तस्वीर सामने आई, उसने जांच की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए. लेकिन जैसे ही पुणे पुलिस को 'आज तक' टीम के वहां पहुंचने की खबर मिली, वो हरकत में आ गई. चलिए आपको बताते हैं, पूरी कहानी.  

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पुणे से 52 किलोमीटर दूर मौजूद लोहगढ़ का किला पिछले 18 दिनों से सुर्खियों में छाया हुआ है. किले का एंट्री गेट से लोग सीधे क़िले के ऊपर जाते हैं. चोटी पर. चोटी तक पहुंचने के लिए करीब सवा सौ मीटर की चढ़ाई चढ़नी होती है. लेकिन इसी एंट्री प्वॉइंट से 300 मीटर पहले एक गेट है. वहां से एक सड़क उसी क़िले के एंट्री प्वॉइंट तक जाती है. और उसी सड़क किनारे जो गेट है, वो उस जंगल की तरफ ले जाता है, जहां पर किले की खाई है. उस गेट से अंदर दाख़िल होने के बाद कुछ कच्चे रास्ते हैं तो कुछ ऊबड़ खाबड़ रास्ते. फिर आगे जाने के बाद ये कच्चे रास्ते भी ख़त्म हो जाते हैं. अब बस जंगल, झाड़ी और पत्थरों पर चलते हुए आगे का रास्ता तय होता है.

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उस गेट के अंदर के जंगल और क़िले की गहराई तक पहुंचने का रास्ता हम आपको इसलिए बता रहे हैं ताकि आपको बता सकें कि 18 जून को केतन किले की चोटी से कहां पर गिरा था. उसकी लाश कहां से मिली थी. और फिर 28 जून को डमी ट्रायल के तमाशे के नाम पर सिया ने जिस डमी को धक्का दिया था, वो कहां पर गिरी थी? 

'आज तक' की टीम ने ये मुश्किल सफर सिर्फ इसलिए तय किया ताकि आपको बता सकें कि कुछ दिन पहले पुणे पुलिस और फ़ॉरेंसिक टीम के तामझाम के बीच जिस डमी को सिया ने चोटी से खाई में धक्का दिया था, क्या वो डमी अब भी वही पड़ी है या पुणे पुलिस अपने साथ ले गई. हम ये जानना चाहते थे कि जिस जगह डमी गिरी है क्या वहां तक पहुंचना इतना मुश्किल है कि पुणे पुलिस और फ़ॉरेंसिक टीम पैदल वहां तक पहुंच ही ना सके. चलिए पूरी कहानी बताते हैं.

2 जुलाई 2026, लोहगढ़ किला, पुणे
शाम के 5 बजकर 23 मिनट हुए थे. थोड़ी बारिश हो रही थी. इसीलिए हमारी टीम का सफर देरी से शुरु हुआ. हमारी टीम घने जंगल में दाखिल हो चुकी थी. ज़ाहिर है जंगल भी घना है तो वहां कोई आता-जाता भी नहीं. कुछ दूरी तक तो कच्चे रास्ते ने काम आसान कर दिया था. लेकिन फिर उस कच्चे रास्ते ने भी साथ छोड़ दिया. अब बिना रास्ते के झाड़ियों को किनारे करते सफर जारी था. बारिश की वजह से जगह-जगह फिसलन भी थी. टीम को मंज़िल तक पहुंचना भी जल्दी था. क्योंकि अंधेरा होने से पहले लौटना भी था. अंधेरे में वो रास्ता ही नहीं दिखता. कायदे से वहां तक जाने के लिए जो रास्ता ही नहीं था. जंगल में दाखिल हुए तब तक 17 मिनट हो चुके थे. पर मंज़िल अब भी थोड़ी दूर थी.

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जैसे-जैसे अब हमारी टीम किले की पहाड़ी के दामन के करीब होती जा रही थी, रास्ता और भी दुश्वार होता जा रहा था. अब आगे चारों तरफ घनी झाड़ियां थी. कटीले पेड़ थे और ज़मीन पर पड़ी आड़ी तिरछी चट्टानें थी. बारिश की वजह से जिसपर चलकर गुजरते हुए बराबर फिसलने का ख़तरा था. वहां से रास्ता थोड़ा मुश्किल था. इसलिए रफ़्तार भी कम करनी पड़ी. फिर एक जगह अचानक आख़िरकार हमारी टीम को पहाड़ी की चोटी नज़र आई. 400 फीट नीचे से लोहगढ़ किले की पहाड़ी नजर आ रही थी. सामने से बिल्कुल खड़ी. आम पहाड़ों से बिल्कुल अलग. और फिर अचानक हमारी टीम को वो चीज़ नज़र आ गई, जिसके लिए वो इस मुश्किल और ख़तरों से भरे सफर को तय कर वहां तक पहुंची थी. तब घड़ी में शाम के 5 बजकर 45 मिनट हुए थे. यानि गेट से उस जगह तक आने में टीम को कुल 22 मिनट लगे.

2 जुलाई 2026 
शाम 5 बजकर 45 मिनट का वक्त था. यही वो वक्त था, जब हमारी टीम वहां पहुंची थी. हमें लगा था शायद जिस मेहनत और सरकारी खर्चे पर पुणे पुलिस और फ़ॉरेंसिक टीम ने पूरे तामझाम के साथ केतन की मौत की जांच के नाम पर डमी ट्रायल किया था, उसके नतीजे की कुछ जांच भी की होगी. लेकिन अफसोस वो डमी अब भी उसी हालत में वहां लावारिस पड़ी थी. देश के किसी भी फ़ॉरेंसिक एक्सपर्ट से पूछ लीजिए उनका जवाब यही होगा कि डमी ट्रायल की जांच तभी मुक्कमल होती है, जब डमी के गिरने की जगह पर डमी के गिरने की पोजिशन, उसके टूटने-फूटने, कपड़े-जूते की जांच की जाती है. 

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देखिए ऐसा नहीं है कि पुलिस या फ़ॉरेंसिक टीम ने आधा-अधूरा काम किया था. केतन के वज़न की डमी तैयार की, ठीक केतन के हाईट की डमी तैयार की, डमी को जींस पैन पहनाए गए, लाल कलर की टी शर्ट पहनाई गई, यहां तक की डमी के पैरों में जूते भी पहनाए गए. ये सब कुछ अब भी यहां जस का तस पड़ा है. जींस और टी शर्ट तो शायद फट भी गए पर ये जूता अब भी किसी के काम आ सकता है. सरकारी खर्चे पर ख़रीदी गई ये चीज़ें हैं, पर लावारिस पड़ी हैं.

चलिए डमी या डमी को पहनाए गए कपड़ों या जूतों का ख़र्चा छोड़ देते हैं. पर जिस चीज़ के लिए पुणे पुलिस ने डमी ट्रायल किया था, कम से कम उसे तो पूरा कर लेती. हमारी टीम ने पूरा रास्ता दिखाया बताया. ये भी बताया कि सड़क से वहां तक जाने में सिर्फ 23 मिनट लगे. लेकिन इसके बावजूद पुलिस या फ़ॉरेंसिक टीम पिछले 5 दिनों में भी वहां नहीं पहुंची. हांलाकि इस दौरान हमारी टीम ने उस डमी को भी ढूंढने की कोशिश की, जिसे डमी ट्रायल के नाम पर 1 जुलाई को दूसरे आरोपी चेतन ने पहाड़ी की चोटी से नीचे फेंका था. 

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एक तो अंधेरा होने जा रहा था, ऊपर से दूर-दूर तक कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. लिहाज़ा, उस डमी तक हम पहुंच नहीं पाए. हांलाकि पुणे पुलिस के सूत्रों ने ही हमें बताया कि चेतन की फेंकी डमी भी पहाड़ी के दामन में यहीं कहीं पड़ी हुई है. हमारी टीम ने काफी कोशिश की पुणे पुलिस से इस बारे में बात करने की. पर कोई भी इस सवाल का जवाब देना ही नहीं चाहता था. 

हांलाकि एक पुलिस अफसर ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि हम सिर्फ़ ये देखना चाहते थे कि सिया या चेतन ने केतन को किस तरह धक्का दिया था. हमारा मकसद नीचे जाकर डमी को चेक करना था ही नहीं. अगर पुणे पुलिस का ऑफ़िशियल जवाब भी यही है तो फिर सवाल तो बनता है कि डमी ट्रायल किया ही क्यों था. क्योंकि फ़ॉरेंसिक एक्सपर्ट्स के हिसाब से डमी ट्रायल तभी पूरा होता है, जब उस जगह पर जाकर उसकी जांच की जाए.

तो अब आप समझ गए होंगे कि पुणे पुलिस के लिए इस डमी ट्रायल का मतलब क्या था. सिर्फ पब्लिसिटी. इसका जांच से कोई लेना देना नहीं था. डमी ट्रायल के ज़रिए केतन की मौत के तरीके के बारे में पुलिस को कुछ नहीं जानना था. उनका मकसद साफ था. काम करो ना करो उसका ज़िक्र ज़रूर करो. लावारिस डमी पुणे पुलिस के उसी बेकाम ज़िक्र का बेजान सबूत है. 

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'आज तक' की टीम ने पहली बार 1 जुलाई को लावारिस डमी की तस्वीरें देश को दिखाई थी. और तभी ये ख़ुलासा कर दिया था कि कैसे पुणे पुलिस ने डमी ट्रायल के नाम पर तमाशा किया. इस ख़बर को दिखाए जाने के अगली दिन यानि 2 जुलाई को 'आज तक' की टीम फिर से उसी जगह पहुंची थी. सिर्फ ये देखने की पुणे पुलिस अब भी यहां तक पहुंची की नहीं. पर डमी तब भी वहीं उसी जगह उसी हालत में लावारिस पड़ी थी. उसे कैमरे में शूट करने के बाद हमारी टीम ने पुणे पुलिस से बात करने की कोशिश की थी. उन्हें बताया था कि हम उस जगह से होकर आ रहे हैं और अब तक पुलिस की टीम वहां जांच करने या डमी को उठाने नहीं गई. पुणे पुलिस को अब इस बात का पता चल चुका था. 

लिहाज़ा, 3 जुलाई को पुलिस की टीम ने मौके पर जाकर वहां से डमी को हटा लिया. अब फ़ॉरेंसिक जांच करके हटाया या यूं ही उठा कर ले गए ये पता नहीं. पर लोनावला के एसपी संदीप गोयल ने इस सवाल पर इतना ज़रूर कहा कि केतन के स्टैचू को निकाल लिया गया. यानि ये 'आज तक' की खबर का ही असर था कि पुलिस को डमी का ख़्याल आया और लगा कि काम का सिर्फ जिक्र ही मत करो, फिक्र भी करो.

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(पुणे से गोपाल हारने और श्रीकृष्ण पांचाल के साथ ओमकार वाबले का इनपुट)

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