बेटे की चाहत में कचरे में फेंकी जा रही हैं बेटियां

दिल को कचोट देने वाली ये सारी कहानियां राजस्थान के अलग-अलग इलाकों की हैं. जहां बदनसीब मासूम बच्चियां हैं, जिन्हें खुद उनकी अपनी मांओं ने गोद से उठा कर सड़क पर फेंक दिया. क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए था, पर ये बेटियां हैं.

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प्रियंका झा

  • नई दिल्ली,
  • 22 जून 2016,
  • अपडेटेड 4:49 AM IST

कचरा और इंसान में कुछ तो फर्क होना था. पर क्या करे वो सरकार भी, उसकी भी क्या गलती. कचरे की तरह जब लोग बेटियों को कचरे के ही ढेर पर फेंकने लगें तो बस यही फरियाद, यही गुजारिश की जा सकती है कि अपनी बेटियों को मारो या फेंको मत बल्कि हमें दे दो. राजस्थान के पालना गृह से निकली ये वो कहानी है जो बस झकझोर जाती है.

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दिल को कचोट देने वाली ये सारी कहानियां राजस्थान के अलग-अलग इलाकों की हैं. जहां बदनसीब मासूम बच्चियां हैं, जिन्हें खुद उनकी अपनी मांओं ने गोद से उठा कर सड़क पर फेंक दिया. क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए था, पर ये बेटियां हैं.

ये चार लाइनें पूरे समाज को आईना दिखाने के लिए काफी हैं- 'फेंकें मत हमें दे दें'. राजस्थान सरकार की ये फरियाद जीती-जागती बेटियों के लिए है. कूड़ा-कचरा के लिए नहीं. पर क्यों? क्यों मां-बाप कचरे में फेंक रहे हैं? क्यों मां-बाप मुंह छुपा कर बेटियों को पालना गृह में छोड़ रहे हैं? और क्यों किसी सरकार को जगह-जगह ऐसे पालना गृह बना कर इस तरह की फरियाद करनी पड़ रही है?

जाहिर है सवाल कचोट देने वाले हैं. आखिर क्यों? क्यों किसी सरकार को ऐसे पालना गृह बना कर मां-बाप से ये गुजारिश करनी पड़ रही है कि वो अपनी बेटियों को मारें या फेंके नहीं. बल्कि सरकार को दे दें. सरकार उन्हें पाल लेगी. असल में जब लोग बेटियों को कचरे के ढेर पर, सड़क किनारे, रेलवे लाइन पर और यहां तक कि झाड़ियों-जंगलों में फेंकने लगे तब बेटियों की जान बचाने के लिए राजस्थान सरकार ने एक फैसला लिया. फैसला बेटियों को खुद पालने का. और उसी फैसले से जन्म हुआ पालना गृह का.

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राजस्थान में लंबे अरसे से ये हो रहा था कि लोग कर ये पता लगा लेते थे कि गर्भ में पल रहा बच्चा लड़का है या लड़की. अगर लड़की होती तो उसे गर्भ में ही मार डालते थे. और इस काम में बहुत से डाक्टर उनकी पूरी मदद कर रहे थे. इसी के बाद राजस्थान सरकार ने एक कानून बनाया. बस इस कानून के आते ही बेटियों के फेंके जाने का सिलसिला शुरू हो गया.

राजस्थान सरकार की सख्ती
लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम यानी पीसीपीएनडीटी एक्ट. यही वो कानून है जिसने एक तरफ राजस्थान में कोख में तो बेटियों के कत्ल पर कुछ हद तक रोक लगा दी. मगर राज्य भर में ऐसे की तादाद बढ़ा दी. दरअसल कोख में बेटियों के कत्ल की बढ़ती वारदात को देखते हुए राजस्थान सरकार ने इस कानून के तहत गर्भ में लिंग जांच पर सख्ती से रोक लगा दी थी. इस दौरान राज्य भर में ऐसे डाक्टरों, नर्सिंग होम, क्लीनिक और अस्पतालों पर छापे मारे गए. इस कानून के तहत अब तक 60 से ज्यादा डाक्टरों के लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं जबकि 150 से ज्यादा सोनोग्राफी सेंटरों पर भी कार्रवाई की गई है.

वैसे राजस्थान सरकार के इस कानून का असर भी दिखा है. कोख में कत्ल की संख्या कम हो रही है. 2015-16 में लड़कों की तुलना में लड़कियों का अनुपात 929 हो गया है, जबकि 2011 में ये आंकड़ा 887 था.

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अभियान का नुकसान भी
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि गर्भ में भ्रूण जांच को लेकर चलाए जा रहे इस अभियान की वजह से अब लड़कियों को सड़कों पर य़ा पालना गृह में फेंकने की घटनाएं बढ़ रही हैं. इसकी वजह ये है कि अब लोग गर्भ में लिंग का पता नहीं लग पा रहे. लिहाजा पैदा होने के बाद ही उन्हें लड़का या लड़की होने का पता चलता है. बेटा हुआ तो ठीक बेटी हुई तो उसे फेंक आते हैं.

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