Ayatollah Ali Khamenei Death Inside Story: अमेरिका और इजरायल ने एक सोची समझी रणनीति के तहत तेहरान में बड़ा हमला कर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को निशाना बनाया और पूरी दुनिया दहल गई. इस ऑपरेशन से पहले महीनों तक अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) और मोसाद ने खुफिया जानकारी जुटाई. कई दिनों तक रेकी की. लंबी निगरानी की गई. जिनेवा में बैकडोर बातचीत चली, डेडलाइन दी गई और फिर अचानक हमला कर दिया गया. जानिए 60 सेकंड में अंजाम दिए गए इस ऑपरेशन की पूरी कहानी.
13 जून 2025
सुबह का वक्त था, जब इजरायल ने ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए थे. इस हमले के ठीक 4 दिन बाद अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने 17 जून 2025 की शाम 5 बजकर 19 मिनट पर सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट किया था. इस पोस्ट में उन्होंने लिखा था- 'हमें पता है कि तथाकथित सुप्रीम लीडर कहां छुपे हैं. वो एक आसान टारगेट हैं. लेकिन सुरक्षित हैं. अभी हम उन्हें बाहर निकालना नहीं चाहते. यानि मारना नहीं चाहते.'
दरअसल, जून में 12 दिनों तक चली ईरान इजरायल के बीच इस जंग में इजरायल को एक बार एक मौका मिला था, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को मारने का. लेकिन तब खुद ट्रंप ने इजरायल को ऐसा करने से रोक दिया था. सलाहकारों ने ट्रंप को समझाया था कि खामेनेई को मारने का असर पूरे मिडिल ईस्ट पर पड़ेगा. 12 दिन बाद तब वो जंग रुक गई लेकिन इजरायल नहीं रुका. डिप्लोमेटिक चैनल से ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत जारी थी. अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम और खासतौर पर लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल को बनाना रोक दे. पर बात बन नहीं रही थी.
फरवरी 2026
इसी बीच फरवरी के दूसरे हफ्ते में ट्रंप ने एक धमकी दी. ट्रंप ने ईरान को न्यूक्लियर प्रोग्राम रोकने या न्यूक्लियर डील पर समझौता करने के लिए 10 से 15 दिन का वक्त दिया. साथ ही ये भी कहा कि ऐसा नहीं होता है तो फिर अंजाम बुरा होगा. ट्रंप की इस डेडलाइन के बाद बैकडोर चैनल से ईरान और अमेरिका के बीच जिनेवा में बातचीत चल रही थी. ईरानी अधिकारियों के अलावा अमेरिका की तरफ से इस बातचीत में अमेरिका के मिडिल ईस्ट के दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेर्ड कुशनर शामिल थे. इस बातचीत की मध्यस्थता कर रहे थे ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल बुसैदी.
शुक्रवार, 27 फरवरी 2026
सुबह की बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. दूसरे राउंड की बातचीत के लिए शाम को फिर से मिलने का तय हुआ. ट्रंप को इस बातचीत की पल पल की जानकारी दी जा रही थी. पर ट्रंप इस बातचीत से ज्यादा खुश नहीं थे. असल में वो ईरान से सुनना चाहते थे कि वो कभी न्यूक्लियर हथियार नहीं बनाएंगे. पर ऐसा हुआ नहीं. 16 घंटे जिनेवा में रहने के बाद विटकॉफ और कुशनर अमेरिका लौट आए.
बातचीत नाकाम हो चुकी थी. ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल बुसैदी जिनेवा से सीधे वाशिंगटन पहुंचे. उपराष्ट्रपति जे डी वेन्स से मिले. ट्रंप तब तक वॉशिंगटन से वीकेंड मनाने टेक्सास से फ्लोरिडा पहुंच चुके थे. उपराष्ट्रपति वेन्स 27 फरवरी की रात अमेरिकी सांसदों से मिले और पहली बार खुलासा किया कि ईरान के खिलाफ हमला तय है. ईरान पर अमेरिका के इस हमले की दो और वजह थी.
पहली वजह इजरायल था. ट्रंप के डेडलाइन दिए जाने के बाद इजरायल लगातार अमेरिका को ये यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा था कि ईरान जून के हमले के बावजूद बड़ी तेजी से फिर से अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहा है. हालांकि खुद ट्रंप के कई सलाहकारों ने ट्रंप को ये समझाया था कि इजरायल के इस दावे पर पूरी तरह यकीन नहीं करना चाहिए.
दूसरा, सउदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान लगातार ट्रंप को फोन कर जल्द से जल्द ईरान के खिलाफ एक्शन लेने की बात कर रहे थे. क्राउन प्रिंस का कहना था कि अगर अभी ईरान पर एक्शन नहीं लिया गया तो ईरान पूरे मिडल ईस्ट के लिए खतरा बन जाएगा. एक तरफ ये सारी प्लानिंग चल रही थी. ट्रंप की दी हुई डेडलाइन खत्म हो रही थी.
इसी बीच अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने एक अहम जानकारी दी. ये जानकारी ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के तेहरान में मौजूद ठिकाने की थी. सीआईए से मिली इस जानकारी को अमेरिका ने इजरायल के साथ शेयर किया. सीआईए की जानकारी को हर तरह से क्रॉस चेक करने के बाद ये साफ हो गया कि खबर पक्की है.
खामेनेई तेहरान में ही अपने दफ्तर में हैं. अब चीजें तेजी से बदल रहीं थी. इसी बीच सीआईए ने एक और बड़ी खबर दी. खबर ये थी कि अयातुल्लाह खामेनेई ईरान के टॉप ऑफिशियल्स के साथ 28 फरवरी यानि शनिवार की सुबह अपने कंपाउंड में ही एक हाई लेवल मीटिंग करने जा रहे हैं. ये खबर और भी बड़ी थी. क्योंकि ईरान की टॉप लीडरशिप और ईरानी रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स एक साथ खामेनेई के साथ होने वाले थे.
असल में बीते कई महीनों से सीआईए और मोसाद खामेनेई की हर गतिविधि पर नजर रख रहे थे. बीते साल जून में हुई 12 दिनों की जंग में भी खामेनेई के ठिकाने के बारे में अमेरिका और इजरायल को पूरी जानकारी थी. हालांकि तब ये कहा गया था कि खामेनेई अपनी जान बचाने के लिए रूस जा सकते हैं. लेकिन खामेनेई को करीब से जानने वालों को मुताबिक खामेनेई कभी देश छोड़ के भागने वाले लीडर नहीं थे. अलबत्ता जून की जंग के बाद उन्होंने अपना ठिकाना बदल लिया था. बताते हैं कि वो तेहरान में एक ऐसी बिल्डिंग में रह रहे थे, जिसमें लिफ्ट जमीन के अंदर पांच फ्लोर तक जा सकती है. यानि एक गहरे बंकर में बने घर में.
जून के बाद मोसाद और सीआईए... दोनों ही खामेनेई का नया ठिकाना जानने की कोशिश में जुटे रहे. सीआईए ज्यादातर टेक्नोलॉजी और सेटेलाइट इमेज की मदद से खामेनेई के नए ठिकाने को ढूंढ रहा था. जबकि मोसाद ईरान में मौजूद अपने लोकल एजेंटों की मदद से.
दरअसल, मोसाद कुछ वक्त पहले अपने ऑपरेशन में एक नया बदलाव लाया है. अब मोसाद के एजेंट मिडिल ईस्ट में ज्यादातर लोकल लोगों को अपना एसेट बनाते हैं. ये वो लोग होते हैं जो सत्ता या सरकार में बैठे लोगों से नाराज रहते हैं. इन्हें मोसाद खुद ट्रेनिंग देता है और फिर उन्हीं देशों में उनकी तैनाती कर दी जाती है. अब तेहरान के अंदर रहकर मोसाद के जासूस खामेनेई का ठिकाना ढूंढ रहे थे. तो वहीं दूसरी तरफ सीआईए सेटेलाइट, ड्रोन, सिग्नल इंटेलिजेंस, AI और डाटा एनालिसेस की मदद से खामेनेई को ढूंढ रहा था.
हाई रिजोल्यूशन सेटेलाइट जो तस्वीरें भेजती हैं वो इतनी साफ होती हैं कि कार में बैठा शख्स तक नजर आ जाता है. सीआईए ने सेटेलाइट का इस्तेमाल हर उन ठिकानों पर किया जहां खामेनेई की मौजूदगी का जरा भी शक होता. किस इलाके में या किस कंपाउंड के इर्द गिर्द सुरक्षा बढ़ा दी गई है. कौन सी गाड़ी किस बिल्डिंग तक जाती है. कहां पर अचानक रोजमर्रा से हटकर ज्यादा गतिविधियां नजर आ रही हैं. सुरक्षा काफिलों का मूवमेंट ज्यादा किधर है.
सेटेलाइट के जरिए मिली इन तस्वीरों से टारगेट के बारे में बहुत कुछ जानकारी मिल जाती है. सेटेलाइट इमेज के अलावा सीआईए ने मोबाइल या फोन या दूसरे डिवाइस पर भी नजर रखी. इसके जरिए ये पता करना था कि कौन किसके संपर्क में है. कहां से संपर्क किया जा रहा है. किसी खास ठिकाने पर अचानक कोई मोबाइल या फोन चालू या बंद तो नहीं हुआ. ये भी एक तरह का संकेत होता है.
सीआईए और मोसाद ने मिलकर 86 साल के खामेनेई की महीनों जासूसी की. खामेनेई का रूटीन क्या है. वो कब उठते हैं, कब सोते हैं, क्या खाते हैं, किन किन से मिलते हैं, जिनसे नहीं मिलते उनसे कैसे संपर्क करते हैं, कैसे बातचीत करते हैं, हमले की सूरत में कहां-कहां पनाह ले सकते हैं. ये सारी जानकारी महीनों तक सीआईए जुटाती रही. इस दौरान ऐसा कई बार हुआ जब सीआईए ने खामेनेई के ठिकाने के बारे में मोसाद को जानकारी दी. लेकिन तब ऐसी तमाम जानकारियां पुख्ता नहीं थी. लेकिन 27 फरवरी की रात तेहरान में जब एक खास बिल्डिंग के इर्द-गिर्द सीआईए ने हलचल महसूस की तब लगा कि इस बिल्डिंग में कुछ बड़ा होने वाला है.
दरअसल, खामेनेई के जो चुनिंदा ठिकाने थे, जिनपर सीआईए महीनों से नजर रख रही थी, उनमें से एक बिल्डिंग ये भी थी. सीआईए को बिल्डिंग में ये हलचल थोड़ी अजीब लगी. इसी के बाद सीआईए तेहरान में अपने लोकल एजेंट को एक्टिव करता है. और तब एक सबसे बड़ी खबर मिलती है. खबर ये कि 28 फरवरी यानि शनिवार की सुबह तेहरान की उसी बिल्डिंग में अयातुल्लाह खामेनेई ईरान के टॉप लीडरशिप जिनमें ईरान के डिफेंस मिनिस्टर और ईरानी रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के कमांडर इन चीफ समेत तमाम आला अफसर के साथ मीटिंग करने वाले हैं.
सीआईए की ये पुख्ता जानकारी इजरायल को दी गई. इसी जानकारी के बाद अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर फौरन हमला करने का प्लान बनाया. पहले ईरान पर हमला शायद 28 फरवरी या एक मार्च की रात को होना था. लेकिन चूकि, खामेनेई की मीटिंग 28 फरवरी की सुबह होनी थी. लिहाजा, हमला पहले करने का फैसला लिया गया. तय ये हुआ कि इजरायल खामेनेई के ठिकानों पर हमला बोलेगा. जबकि अमेरिका ईरान के सैन्य ठिकानों पर. इससे पहले इजरायल ने हमेशा ईरान पर रात के अंधेरे में हमला किया था. पर ये पहली बार था जब सुबह के उजाले में ईरान पर हमला होने वाला था.
शनिवार, 28 फरवरी 2026
इजरायली वक्त के मुताबिक सुबह के 6 बजे थे. यही वो वक्त था जब इजरायल से कुछ फाइटर जेट्स अपने बेस से उड़ान भरते हैं. इन फाइटर जेट्स में लंबी दूरी से मार करने वाले बेहद घातक हथियार थे. इन फाइटर जेट्स का रुख ईरान की राजधानी तेहरान की तरफ था.
सुबह 9 बजकर 40 मिनट
ठीक यही वो वक्त था, जब इजरायली फाइटर जेट ने लंबी दूरी तक मार करने वाले मिसाइल से तेहरान के उस सबसे ताकतवर बिल्डिंग को निशाना बनाया, जिस बिल्डिंग में खामेनेई की मौजूदगी की बात कही गई थी. इस बिल्डिंग के करीब एक और बिल्डिंग थी. जिस वक्त बिल्डिंग पर बम गिराए गए तब ईरानी रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के टॉप ऑफिसर एक बिल्डिंग में थे, जबकि खामेनेई अपने फैमिली के कुछ सदस्यों के साथ बराबर की दूसरी बिल्डिंग में. बिल्डिंग पर कुल 12 बम गिराए गए. ये सब कुछ सिर्फ एक मिनट में हुआ. यानि 60 सेकंड में. 60 सेकंड बाद इजरायल के फाइटर जेट वापस अपने बेस की तरफ मुड़ चुके थे.
खामेनेई और टॉप ईरानी ऑफिशियल्स को निशाना बनाने के कुछ देर बाद ही अमेरिका और इजरायल ने अब ईरान की बाकी सैन्य ठिकानों पर बमबारी शुरु कर दी थी. इसी के बाद पूरी दुनिया को पता चला कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला बोल दिया है. लेकिन घंटो बीत जाने के बाद भी किसी को ये पता नहीं था कि इस हमले में अयातुल्लाह खामेनेई की मौत हो चुकी है.
असल में खुद ट्रंप और इजरायल पहले ये पुख्ता कर लेना चाहते थे कि हमले में खामेनेई की मौत हो चुकी है. इसमें कुछ वक्त लगा. जिस बिल्डिंग में खामेनेई की मौत हुई उसी बिल्डिंग से खामेनेई की लाश की तस्वीरें ली गईं. उस तस्वीर को पहले सीआईए और फिर मोसाद ने कंफर्म किया और जब ये पुख्ता हो गया कि ये खामेनेई की ही लाश है, तब सबसे पहले पहली बार 1 मार्च की देर रात बल्कि तड़के 3 बजकर 17 मिनट पर डोनाल्ड ट्रंप ने खामेनेई की मौत को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली.
हालांकि तब तक 15 घंटे से ज्यादा बीत चुके थे. लेकिन ईरान अब भी खामेनेई की मौत पर खामोश था. बल्कि ईरान की तरफ से खामेनेई की मौत को लेकर ऐसी तमाम खबरों को अफवाह बताया गया. लेकिन फिर लगभग 15 घंटे बाद ईरानी सरकारी टीवी और नेशनल मीडिया ने ये खबर दी कि ईरान के रहनुमा अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो चुकी है.
इस खबर के साथ ही पूरे ईरान में मातम पसर गया. बस महीने भर पहले तक जो लोग ईरानी सरकार और खामेनेई से नाराज थे, वो खामेनेई के समर्थन में सड़कों पर उतर आए. लोगों का सैलाब अब सड़कों पर था और सभी अपने लीडर की मौत का बदला लेने की मांग कर रहे थे.
(आजतक ब्यूरो)
aajtak.in