Advertisement

यूटिलिटी

Gold vs Govt: 4 मौके... जब सोने की वजह से सरकार हुई परेशान, आजादी के बाद से ही चल रहा खेल!

अमित कुमार दुबे
  • नई दिल्ली,
  • 12 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:48 PM IST
  • 1/10

सोना सुख-दुख का साथी होता है, चाहे आम आदमी हो या सरकार... मुसीबत में सोने ने कई बार उबारा है. लेकिन इतिहास देखें तो सोने ने कई बार सरकार को परेशान भी किया है. यानी सोने को लेकर सरकार का दांव उल्टा पड़ा है. आज हम आपको ऐसे मौकों के बारे में बताएंगे, जब सोने की वजह से सरकार के हाथ-पांव फूले हैं. यानी आजादी के बाद से लेकर अभी तक कई बार देश की अर्थव्यवस्था के लिए सोना एक 'मीठा जहर' साबित हुआ है.

  • 2/10

1962 का स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम
आजादी के बाद सोने ने पहली बड़ी चुनौती 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान पेश की. युद्ध के कारण विदेशी मुद्रा की भारी कमी हो गई थी. तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने महसूस किया कि भारतीय घरों में दबा सोना देश के काम नहीं आ रहा है. फिर सरकार को सोना निकलवाने के लिए देश में 'गोल्ड कंट्रोल एक्ट' लागू करना पड़ा. इसके तहत देश में 14 कैरेट से अधिक शुद्धता वाले सोने के गहने बनाने पर रोक लगा दी गई. (Photo: Getty)

  • 3/10

मोरारजी देसाई थे वित्त मंत्री

वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को लगा था कि उनके इस कदम से देश में सोने की तस्करी बंद हो जाएगी. लेकिन इसके विपरीत देश में सोने की तस्करी और 'ब्लैक मार्केट' का जन्म हुआ, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया था, और इसका असर दशकों तक दिखा था.  (Photo: Getty)

Advertisement
  • 4/10

जब सोना गिरवी रखना पड़ा
यह भारतीय इतिहास का सबसे भावनात्मक और चुनौतीपूर्ण वक्त था. साल 1991 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि देश के पास केवल दो हफ्ते के आयात (Import) के लिए पैसे बचे थे. सरकार के हाथ-पांव फूल रहे थे. (Photo: ITG)
 

  • 5/10

1991 में देश के सामने था बड़ा संकट 

जिसके बाद आनन-फानन में भारत सरकार ने भुगतान संतुलन संकट से बचने के लिए बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड के पास अपना 47 टन सोना गिरवी रख दिया. इस दौरान जब मुंबई के हवाई अड्डे से सोने के बक्से लंदन भेजे जा रहे थे, तो मौजूदा सरकार की खूब किरकिरी हुई थी. हालांकि इसी संकट ने 1991 के आर्थिक उदारीकरण की नींव भी रखी. (Photo: ITG)

  • 6/10

साल 2013 में सोने ने किया परेशान
साल 2013 में रुपया डॉलर के मुकाबले तेजी से गिर रहा था. जिससे भारत का करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, इसका मुख्य कारण कच्चे तेल के बाद सोने का अंधाधुंध आयात था. इस संकट के निकलने के लिए सरकार को सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 10% करना पड़ा था. साथ ही तत्कालीन यूपीए सरकार और आरबीआई ने सोने के आयात को नियंत्रित करने के लिए '80:20 स्कीम' लागू की थी. ताकि देश सोने की खपत को जबरन कम किया जा सके. (Photo: Reuters)

Advertisement
  • 7/10

80:20 स्कीम का गणित
इस स्कीम का नियम था कि अगर आप 100 किलो सोना विदेश से मंगवाते हैं, तो उसका 20% हिस्सा आपको दोबारा एक्सपोर्ट करना होगा. जबकि आयात किए गए कुल सोने का 80% हिस्सा देश के भीतर ज्वैलर्स और निर्माताओं को बेचने की अनुमति थी. इस कदम के बाद 2013-14 में भारत का करेंट अकाउंट डेफिसिट कम करने में मदद मिली थी. नवंबर 2014 में मोदी सरकार ने इस स्कीम को खत्म कर दिया. क्योंकि सोने की तस्करी बढ़ने की खबरें आने लगी थीं. (Photo: ITG)

  • 8/10

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) पर सरकार का यू-टर्न 
साल 2015 में मोदी सरकार ने सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) स्कीम शुरू की थी. इसका मकसद था लोगों को 'फिजिकल गोल्ड' के बजाय 'पेपर गोल्ड' की तरफ ले जाना, ताकि सरकार को बाहर से सोना न खरीदना पड़े. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सोने की कीमतें बेतहाशा बढ़ीं. सरकार ने जब बॉन्ड बेचे थे तब दाम कम थे, अब भुगतान के समय सरकार को अपनी जेब से भारी रकम देनी पड़ रही है, जो वित्तीय घाटे को बढ़ा रहा है.

  • 9/10

SGB से पीछे हटने का फैसला क्यों?
हाल ही में सरकार ने SGB की नई सीरीज जारी करने पर रोक लगा दी, क्योंकि सरकार को SGB स्कीम से दोतरफा नुकसान हो रहा था. पहला, निवेशकों को 2.5% सालाना ब्याज देना और दूसरा- मैच्योरिटी के समय सोने की बढ़ी हुई कीमत का भुगतान करना पड़ रहा था. इस बीच बजट 2024 में केंद्र सरकार ने सोने पर आयात शुल्क को 15% से घटाकर 6% कर दिया. इससे घरेलू बाजार में सोने के दाम गिरे. अगर सरकार SGB जारी रखती, तो उसे निवेशकों को पुराने ऊंचे दामों के हिसाब से भुगतान करना पड़ता, जो आर्थिक रूप से घाटे का सौदा था. (Photo: Getty)

Advertisement
  • 10/10

अब पीएम मोदी की सोना नहीं खरीदने की अपील 
अब एक बार फिर सोना भारत के लिए चुनौती बन गया है. जब दुनिया भर में युद्ध के बादल मंडराते हैं, तो निवेशक डॉलर और सोना खरीदने भागते हैं. जबकि भारत में सोना 'डेड इन्वेस्टमेंट' की तरह है. लोग सोना खरीदकर लॉकर में रख देते हैं, जिससे वह पैसा सर्कुलेशन से बाहर हो जाता है. सरकार चाहती है कि लोग सोने में पैसा फंसाने के बजाय उसे विकास कार्यों या शेयर बाजार में लगाएं, ताकि डॉलर बाहर न जाए और रुपया मजबूत रहे. (Photo: PTI)

Advertisement

लेटेस्ट फोटो

Advertisement