भोजपुर में भरत तिवारी का एनकाउंटर का मामला अब बिहार में केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है. इस घटना ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. सवाल उठ रहा है कि क्या राज्य में एक बार फिर अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण की जमीन तैयार हो रही है.
गौरतलब है कि एनकाउंटर के बाद अलग-अलग सामाजिक संगठन की बैठकों, महापंचायत का आयोजन और सोशल मीडिया पर चल रही बहस ने इस मामले को नया राजनीतिक रंग दे दिया है. घटना को लेकर अलग-अलग समाज की अपनी-अपनी राय सामने आ रही है जिस पर राजनीतिक दल भी लगातार नजर बनाए हुए हैं.
एक तरफ जहां अगड़ी जाति से आने वाले नेता जैसे मंत्री विजय कुमार सिन्हा और मिथिलेश तिवारी एनकाउंटर पर सवाल खड़े कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ पिछड़ी जाति से आने वाले नेता जिनमें दिलीप कुमार जायसवाल और पूर्व सांसद नागमणि शामिल है, भरत तिवारी पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं.
भोजपुर एनकाउंटर के बाद पिछले दिनों अगड़ी जातियों का बिलौटी गांव में महापंचायत लगा, जहां भरत तिवारी के लिए न्याय की मांग की गई तो इसी के जवाब में 5 जुलाई को पिछड़ी जातियों ने भी बहुजन महापंचायत आयोजन करने की घोषणा कर दी थी. जिसमें केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी शिरकत करने का ऐलान किया था, लेकिन अब इस पूरे कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया है .
महापंचायत स्थगित होने के पीछे आधिकारिक कारण चाहे जो भी हों, लेकिन माना जा रहा है कि मौजूदा समय में बिहार में जिस तरीके का राजनीतिक माहौल है और जहां अगड़ा और पिछड़ा की राजनीति एक बार फिर से उफान पर है उसी के वजह से बहुजन महापंचायत को कैंसिल करना पड़ा है.
माना जा रहा है कि इस समय कोई भी राजनीतिक दल ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे बिहार में जातीय तनाव की स्थिति पैदा हो .
इसी कड़ी में अब यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या बिहार में 1990 के दशक वाली राजनीति की वापसी हो रही है?
1990 का दशक बिहार की राजनीति में सामाजिक बदलाव का दौर माना जाता है. सामाजिक न्याय की राजनीति के शुरुआत ने सत्ता का सामाजिक समीकरण बदल दिया था. पिछड़े और वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी, लेकिन इसके साथ ही कई इलाकों में जातीय तनाव और वर्चस्व की लड़ाई भी देखने को मिली.
यह वह दौर था जब बिहार में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे और उनके शासनकाल में अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीति चरम पर थी. लालू प्रसाद की राजनीति का आधार ही उसे वक्त अगड़ा बनाम पिछड़ा था जिसके दम पर राजद ने 15 साल बिहार में शासन किया.
हालांकि, 2005 में नीतीश कुमार जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उस वक्त से लेकर अगले 20 सालों तक उनके शासनकाल में बिहार में सामाजिक संतुलन और विकास की राजनीति ही फोकस में रहा.
उन्होंने अत्यंत पिछड़ा वर्ग, महादलित, महिलाओं और अन्य सामाजिक समूहों को साथ लेकर चलने की रणनीति अपनाई और इन 20 सालों में जातीय संघर्ष की आग को दबा कर रखा.
नीतीश कुमार के शासनकाल में जाति के आधार पर चुनाव और राजनीति जरूर होती थी, लेकिन अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच खुला राजनीतिक टकराव पहले की तुलना में कम दिखाई दिया.
लेकिन भोजपुर एनकाउंटर के बाद बिहार का माहौल बिल्कुल बदल गया है, जिसके वजह से कई सवाल खड़े हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर चल रही बहस, अलग-अलग सामाजिक संगठन की बैठकें और राजनीतिक बयानबाजी इस बात का संकेत है कि जातीय पहचान एक बार फिर बिहार की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गई है.
बिहार की चुनावी राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहा है और लगभग सभी दल अपनी रणनीति बनाते समय सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हैं.
हालांकि, सिर्फ भोजपुर की घटना के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगा कि बिहार पूरी तरह 1990 के दशक में लौट गया है. आज के दौर में बिहार काफी बदल चुका है. आज के समय में रोजगार, शिक्षा, पलायन, विकास और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं.
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि भोजपुर एनकाउंटर ने बिहार में जातीय राजनीति की पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस फिलहाल कुछ वक्त के लिए ही रहेगी या फिर 2029 लोकसभा चुनाव और फिर 2030 बिहार विधानसभा चुनाव तक बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनी रहेगी.
रोहित कुमार सिंह