शहर कोई भी हो, लेकिन ऑटो में लोगों को बैठाने का नियम (गैरकानूनी) लगता है एक जैसा है. एनसीआर के ऑटो हों या फिर किसी छोटे शहर के, नियम से ज्यादा लोग हमेशा ऑटो में बैठे आपको मिल जाएंगे. ऐसा लगता है कि मानों ऑटो के लिए ये नियम भी ऑटोमेटिक चल रहे हैं.
इसकी चर्चा हाल में एक खबर के आने के बाद शुरू हुई है, जब एक ऑटोरिक्शा से 19 लोगों को बाहर निकाला गया. मामला उत्तर प्रदेश के कन्नौज का है, जहां ट्रैफिक पुलिस ने जब एक ऑटो को रोका, तो सवारियों के उतरने का सिलसिला खत्म ही नहीं हो रहा था.
जब लोगों को ऑटो से उतारा गया है, तो सवारियों की संख्या 1,2,3,4,5...से होती हुई 19 तक पहुंच गई. इसमें बड़े और बच्चे सभी शामिल थे. पुलिस ने जब ऑटो चालक से इतनी सवारियों को बैठाने की वजह पूछी तो, उसने बताया कि सवारी तो 15 ही हैं, बाकि 4 तो बच्चे हैं. इस घटना के बाद पुलिस ने ऑटो को सीज कर दिया और सभी यात्रियों को दूसरे वाहन से सुरक्षित आगे भेज दिया.
ये तो रहा एक मामला, लेकिन अगर आप अपने शहर की सड़कों पर नजर दौड़ाएंगे, तो पाएंगे कि हर तरफ ऑटो में ज्यादा सवारी भरी हैं. कई बार तो ऑटो चालक तब तक सवारी भरता है, जबकि उसे लगता है कि ऑटो चल सकता है. ऐसे में एक सवाल ये भी है कि भारत में किसी ऑटो में कितने लोगों को बैठाया जा सकता है.
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वहीं पुराने शहरों में एक पॉपुलर ऑटो विक्रम ब्रांड नेम के तहत आता है. इस ऑटो को स्कूटर इंडिया लिमिटेड बनाती थी, जो अब ऑपरेट नहीं कर रही है. इस ऑटो में भी आधिकारिक रूप से 6 लोगों के बैठने की जगह होती थी, लेकिन इन ऑटो को आफ्टर मार्केट में काफी हैवी कस्टमाइज किया जाता था.
रिटायर्ड एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिशनर पीएस सत्यार्थी ने बताया, 'ऑटोरिक्शा 3 सीटर या 5 सीटर (पैसेंजर) सेटअप में आते हैं. इसके बाद बैठने के लिए जो जगह बनाई जाती है, वो गैरकानूनी मॉडिफिकेशन होता है. इस मॉडिफिकेशन को ऑटो खरीदने के बाद कराया जाता है. इसके रोकने के कई तरीके हैं.'
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उन्होंने बताया, 'ऑटोरिक्शा को हर दो साल पर फिटनेस सर्टिफिकेट लेना होता है. अगर वहां पर अथॉरिटी इन मॉडिफिकेशन्स को चेक करें, तो इसे रोकने में मदद मिल सकती है. इसके अलावा ये भी हो सकता है कि फिटनेस के लिए जाते हुए ड्राइवर मॉडिफिकेशन को हटा देते हों.'
पीएस सत्यार्थी ने बताया कि अगर पुलिस, नगर निगम और दूसरी लोकल अथॉरिटीज ऑटोरिक्शा के रूट्स को चिह्नित कर लें, तो बहुत सी समस्याओं को रोका जा सकता है. जरूरत पड़ने पर कुछ रूट्स पर ई-रिक्शा और ऑटोरिक्शा को बैन भी किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए सर्वे और प्लानिंग की जरूरत होगी. कुल मिलाकर इन गैरकानूनी मॉडिफिकेशन के लिए अथॉरिटीज का सही तरीके से काम करना जरूरी है.
अभिषेक मिश्रा