पुरी का जगन्नाथ धाम सदियों से अपनी आस्था, रहस्य और चमत्कारी विधानों के लिए जाना जाता है. इस वक्त श्रीमंदिर में 'वार्षिक रथयात्रा' की तैयारी जोरों पर हैं. रथयात्रा को अब लगभग 15 दिन बाकी हैं, लेकिन उससे पहले ओडिशा के इस प्रसिद्ध पवित्र तीर्थ जगन्नाथ धाम में एक सांस्कृतिक घटनाक्रम सामने आया है.
यहां रथयात्रा तक भगवान के सार्वजनिक दर्शन बंद रहेंगे और पूजा-पद्धति में विशेष बदलाव किए जाएंगे. मंदिर में घंटा ध्वनि भी नहीं होगी और सुबह-शाम के होने वाली शंखनाद भी नहीं होंगे. अगले 15-16 दिनों तक मंदिर पूरी तरह खामोश होने वाला है. लेकिन इसकी वजह क्या है?
शुरू होने वाला भगवान का 'अनासरा विधान'
असल में जगन्नाथ धाम में होने वाली 'रथयात्रा' एक पारंपरिक अनुष्ठान है. ये अनुष्ठान सिर्फ एक दिन का नहीं होता है, बल्कि इसकी शुरुआत कई महीने पहले ही हो जाता है. ये समझिए कि रथयात्रा इस पूरी धार्मिक प्रक्रिया का अंतिम चरण होती है. इससे पहले श्रीमंदिर में कई तरह के विधान, संस्कार और दैव साधना की जाती है. इन्हीं में से एक है 'अनासरा विधान' . अनासरा यानी कि भगवान का एकांत वास.
क्या होता है 'अनासरा'?
इस अनुष्ठान में होता ये है कि 'माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन तीनों ही बीमार पड़ जाते हैं. इस दौरान राजवैद्य की निगरानी में उनका उपचार चल रहा होता है. 15 दिनों तक लगातार कई तरह की पंचन और लेपन क्रिया (भगवान जगन्नाथ को औषधि लगाना) की जाती है. ये अनुष्ठान विशेष 'दइतापति' की देखरेख में होते हैं. इस दौरान भगवान को एकांत में ही फुलुरी तेल (सुगंधित फूलों का तेल और इत्र) लगाया जाता है.
औषधि में नीम की पत्तियों और छाल का चूर्ण दिया जाता है. उनका शृंगार नहीं किया जाता है और चंदन लेपन किया जाता है. माना जाता है कि इन 15 दिनों में भगवान एकांत वास में विश्राम और स्वास्थ्य लाभ लेते हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए मंदिर में साल भर होने वाली पूजा और दर्शन परंपरा में कुछ बदलाव किया जाता है.'
ऐसे में ऊंचे सुर में स्तुति नहीं होती है. भजन-आरती तेज आवाज में नहीं गाई जाती है. मंदिर परिसर में भगवान के एकांत वास के पास ही ढोल-नगाड़े नहीं बजते हैं. मंदिर में घंटी बजाकर, घंटानाद करके पूजा नहीं होती है और यहां तक की शंख भी नहीं बजाते हैं. इस दौरान मंदिर के वातावरण में एक भक्तिमय शांति रहती है और साधना, जप, ध्यान तथा हरिकीर्तन किए जाते हैं.
भगवान बीमार क्यों पड़ते हैं?
भगवान के बीमार पड़ने का भी श्रीमंदिर में एक अलग विधान है. ज्येष्ठा एकादशी के बाद भगवान को आम फलों का भोग लगाया जाता है. उन्हें स्वादिष्ट आमरस बनाकर पिलाया जाता है. इस दौरान अधिक गर्मी भी पड़ती है. ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन तीनों दैव प्रतिमाएं गर्भगृह से निकाल कर मंदिर के आंगन में लाई जाती हैं.
यहां उन्हें 108 कलश में भरे सुगंधित जल से स्नान कराया जाता है. इनमें 35 घड़ों को जल से जगन्नाथ जी को 33 घड़ों से बलभद्र महाराज और 22 घड़ों के जल से सुभद्रा देवी को स्नान कराया जाता है. इससे पहले 18 घड़े जल से सुदर्शन चक्र, गरुण जी आदि को स्नान कराया जाता है.
तीनों देवता धारण करते हैं 'गजानन वेश'
ज्येष्ठ पूर्णिमा के इसी महास्नान के कारण यह दिन स्नान पूर्णिमा कहलाता है. इस स्नान के बाद भगवान की प्रतिमाओं को सूती-मलमली वस्त्रों से पोछा जाता है और फिर बड़ेृ-बड़े कपड़ों में लपेटा जाता है. इस दौरान बड़े-बड़े कपड़ों में लिपटे तीनों दैव प्रतिमाएं हाथीनुमा आकार में नजर आती हैं. भगवान के इस शृंगार को 'गजाबेशा' या गजवेश कहा जाता है. इस स्वरूप में उन्हें गणेश जी के रूप में पूजा जाता है और जगन्नाथ बन जाते हैं गजानन नाथ.
आज 29 जून को यही ज्येष्ठ पूर्णिमा का मौका है. जिसे महास्नान पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. इसके बाद आषाढ़ कृष्ण प्रथमा से भगवान एकांतवास में चले जाएंगे और मंदिर परिसर में एक अध्यात्मिक खामोशी फैल जाएगी. जप-तप और ध्यान-अनुष्ठान की खामोशी...
विकास पोरवाल