ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा होने वाली है. भगवान जगन्नाथ इस दिन देवी गुंडिचा के घर जाते हैं. यह यात्रा ओडिशा ही नहीं बल्कि भारत की संस्कृति है. रथयात् समाज को एक कर देती है. इस यात्रा में जितना महत्व देव प्रतिमाओं और रथों का होता है उससे कहीं अधिक महत्व रथ को खींचने वाली रस्सियों का भी होता है. इनका स्पर्श भगवान को ही स्पर्श कर लेने जैसी अनुभूति देने वाला होता है.
भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सियों की कथा
रथों की ये रस्सियां अपने-अपने अलग और खास नामों से जानी जाती हैं. भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी का नाम शंखचूड़ है. पुरी में एक किवदंति है कि एक बार शंखचूड़ नामके राक्षस ने भगवान जगन्नाथ को अधूरी प्रतिमा समझकर उनका हरण करने का प्रयास किया. ऐसा करके वह लोगों के ईश्वर पर होने वाले विश्वास को डिगाना चाहता था, लेकिन अपने छोटे भाई के साथ ऐसा व्यवहार होता देख भगवान बलभद्र नाराज हो गए और उन्होंने शंखचूड़ का वध कर दिया.
लोकमान्यता है कि शंखचूड़ ने भगवान से कामना करते हुए कहा- वह भी आपकी सेवा में रहना चाहता है. तब बलराम ने उसकी नाड़ी, नस और रीढ़-तंतुओं आदि से एक रस्सी बनाई तब से, इस रस्सी का उपयोग भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए किया जाता है.
ज्योतिष का एक दोष भी होता है शंखचूड़
शंखचूड़ भले ही एक राक्षस था, लेकिन मोक्ष पा लेने से वह भी पवित्र हो गया. उसके नाम की यह रस्सी मोक्ष का ही प्रतीक है. रस्सी खींचना भक्तों की भक्ति और समर्पण का प्रतीक है. शंखचूड़ नाम के राक्षस की एक और कथा है. भगवान शिव का विरोध करने वाला असुर जलंधर, शंखचूड़ का मित्र था. शंखचूड़ के पास हरिकवच था और वह इसके सहारे ही जलंघर की सहायता कर रहा था. भगवान विष्णु ने ब्राह्मण बनकर अपना ही कवच उससे मांग लिया. इसके बाद शिवजी मे शंखचूड़ का वध कर दिया. तब भगवान विष्णु ने शंखचूड़ को कलियुग में अपने काम आने और अपनी भक्ति पाने का वरदान दिया. इसलिए उनके रथ की रस्सी का नाम शंखचूड़ है.
इसी तरह ज्योतिष में शंखचूर्ण कालसर्प दोष नाम का एक कालसर्प दोष भी होता है. जब जन्म कुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के बीच स्थित होते हैं, तब यह दोष बनता है. यह दोष व्यक्ति के जीवन में कई बाधाएं और संघर्ष ला सकता है, खासकर भाग्य, शिक्षा, और रिश्तों के क्षेत्र में. रथयात्रा की रस्सी छूने भर से इस दोष से मुक्ति मिलती है, ऐसा माना जाता है.
भगवान बलभद्र के रथ की रस्सी का नाम वासुकि
इसी तरह भगवान बलभद्र के रथ की रस्सी का नाम वासुकि (बासुकि) है, वासुकि भगवान शिव के गले में कंठहार हैं. पौराणिक कथाओं के आधार पर वासुकि शेष और अनंत नाग के छोटे भाई हैं. कहते हैं कि एक दिन वासुकि अपने भाई शेष नाग के पास आए और बोले कि आपने लक्ष्मण की तरह छोटे भाई बनकर जो उदाहरण सामने रखा है, उसका कोई जोड़ नहीं है, लेकिन मैं कभी छोटे भाई की तरह आपकी सेवा का अवसर नहीं पा सका हूं.
तब शेषनाग जी बोले, वासुकि- तुम चिंता मत करो, जब मैं बलदाऊ बलभद्र बनकर, नारायण का भी बड़ा भाई बनकर इस संसार में आऊंगा तब तुम मेरी सेवा जरूर करोगे. वही वासुकि जगन्नाथ रथयात्रा में बलभद्र के रथ की रस्सी बने हुए हैं और इस रस्सी को खींचकर भक्त अपना सौभाग्य समझते हैं.
सुभद्रा देवी के रथ की रस्सी भी महत्वपूर्ण
इसी तरह सुभद्रा देवी के रथ की रस्सी का नाम स्वर्णचूड़ है. यह रस्सी कुछ और नहीं माया का बंधन है और मोह की फांस है. इस रस्सी के जरिए तो मनुष्य संसार में कर्म, संबंध और अपने भाग्य के बंधनों के बीच बंधा और फंसा है. देवी सुभद्रा के रथ की रस्सी आत्मा का परमात्मा से मिलन का प्रतीक है.
विकास पोरवाल