हिमाचल प्रदेश में क्यों कम हुई सेब की पैदावार? जान लीजिए वजह

मध्य प्रदेश के कुल फल उत्पादन में सेब का हिस्सा लगभग 85% है. राज्य में फलों की खेती के तहत कुल भूमि क्षेत्र के लगभग आधे हिस्से में सेब की फसल है. इसके बावजूद प्रदेश के सेब की वार्षिक उपज लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. आइए जानते हैं इसके पीछे की वजह.

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सतेंदर चौहान

  • मनाली,
  • 15 मई 2023,
  • अपडेटेड 1:47 PM IST

हाल के कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश में सेब का उत्पादन गिरा है.  2022-23 की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल में सेब की खेती के तहत क्षेत्र में वृद्धि हुई है, लेकिन वार्षिक पैदावार में बंपर गिरावट है. 2010-11 में 8.92 लाख मीट्रिक टन से अधिक की उच्चतम वार्षिक उपज दर्ज की गई थी. इसके बाद से ही हिमाचल प्रदेश इस आंकड़े को पार नहीं कर पाया है.

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6.74 लाख मीट्रिक टन रह सकता है सेब की उपज

हिमाचल प्रदेश में सेब की उपज 2011-12 में घटकर 2.75 लाख मीट्रिक टन और 2018-19 में 3.68 लाख मीट्रिक टन रह गई. वहीं, पिछले साल सेब का उत्पादन 6.11 लाख मीट्रिक टन था. इस साल प्रदेश में 6.74 लाख मीट्रिक टन से अधिक सेब की कुल उपज दर्ज करने की उम्मीद है.

सेब की खेती के रकबे में वृद्धि

राज्य के कुल फल उत्पादन में सेब का हिस्सा लगभग 85% है. राज्य में फलों की खेती के तहत कुल भूमि क्षेत्र के लगभग आधे हिस्से में सेब की फसल है. प्रदेश में सेब की खेती का रकबा 1950-51 में 400 हेक्टेयर से बढ़कर 2021-22 में 1,15,016 हेक्टेयर हो गया है. 2007-08 से सेब की खेती के तहत क्षेत्र में 21.4% की वृद्धि दर्ज की गई. बावजूद इसके प्रदेश में  सेब के उत्पादन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई.

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मौसम में आए बदलाव के चलते सेब की पैदावार में कमी

सेब उत्पादकों और विशेषज्ञों के अनुसार, सेब का उत्पादन घटने के पीछे मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है. मौसम में आए बदलाव के कारण  हिमाचल प्रदेश में सेब बेल्ट लगभग 1,000 फीट तक स्थानांतरित हो गई है. पहले हमें समुद्र तल से 4000  से 5000 फीट की ऊंचाई पर अच्छी गुणवत्ता वाले सेब मिलते थे. अब, अच्छी गुणवत्ता वाला सेब केवल 6,000 फीट से ज्यादा की  ऊंचाई पर स्थित पेड़ों पर ही उगता है. तापमान में बढ़ोतरी के कारण यह सेब पट्टी हिमालय के अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक सिमट रही है. इससे सेब  के उत्पादन में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है.

ठंड कम होना भी सेब की पैदावार में कमी की मुख्य वजह

सर्दियों के दौरान ठंड कम होने से कुल उत्पादन के साथ-साथ सेब की गुणवत्ता पर भी असर पड़ा है. सर्दियों के दौरान असामान्य रूप से गर्म मौसम, बेमौसम बारिश या बिल्कुल भी बारिश जैसा मौसम बदल रहा है. सेब के घटते उत्पादन में ये सभी जलवायु गड़बड़ी एक प्रमुख कारक रही है. रॉयल डिलीशियस जैसी पुरानी सेब किस्मों को 7 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान के 1200-1400 चिलिंग घंटों की आवश्यकता होती है. वहीं, नई किस्मों को ठीक से फूलने और फल देने के लिए 300-500 चिलिंग ऑवर्स की आवश्यकता होती है. हिमाचल प्रदेश में अभी भी सेब की पुरानी वैरायटी लगी हुई  है. जिन पर सेब का उत्पादन पूरी तरह से मौसम पर निर्भर करता है.

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बर्फबारी में कमी से भी सेब की फसल पर पड़ा प्रभाव

सेब के उत्पादन का कम होने का एक और कारण  पुराने पेड़ों की जगह नई किस्मो के सेब के पेड़ लगाना भी है. बागवान टीकम ठाकुर का कहना है की सेब का घटता उत्पादन परेशानी का विषय है . प्रदेश में सेब की खेती रकबा तो बढ़ा है लेकिन उत्पादन में भारी कमी आई है. उत्पादन कम होने का कारण प्रदेश में अभी भी रेड डिलीशियस वैरायटी के पेड़ लगाए गए हैं. मौसम जब  खराब होता है तो पोलिनेशन सही न होने से सेब के उत्पादन में कमी आ रही है. दूसरा मुख्य कारण न्यूट्रीशन मेनेजमेंट भी अच्छा नही है.  बागवानों को अब वैज्ञानिक तरीके से सेब की खेती करने की ज़रूरत है. वहीं, दूसरी तरफ सेब को सही मौसम की ज़रूरत है . इस साल प्रदेश में मौसम के बिगड़े मिजाज़ के चलते सेब का उत्पादन प्रभावित होगा. मई के महीने में उपरी इलाकों में बर्फ़बारी हो रही है जो सेब की फसल के लिए अच्छे संकेत नहीं है. 

आग लगाने के चलते हुआ ऐसा

फ्रूट ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष महेंद्र का कहना है कि प्रदेश में सेब के उत्पादन में कमी होने का मुख्या कारण जलवायु परिवर्तन है. वहीं, दूसरा कारण कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग भी है. जसकी वजह से पोलिनेटर और पोलिनेशन में कमी आई है. बागवानों द्वरा जंगलों में आग लगाना भी एक प्रमुख कारण है जिसके चलते जंगली मखिया व् जंगली तितलिया अब बागों में नहीं आती है.  इससे सेब का उत्पादन प्रभावित हुआ है. सेब के ट्रेडिशनल पेड़  के लिए 1200 से  140 घंटे चिलिंग घंटे चाहिए होते हैं.अब चिलिंग हावर्स उतने नही मिल पा रहे हैं. इसके चलते सेब का उत्पादन कम हो रहा है. 

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उपनिदेश उद्यान विभाग कुल्लू बीएम् चौहान के अनुसार, उत्पादन कम होने का कारण मौसम में आया बदलाव और प्रदेश के बगीचों के सेब की पुरानी किस्म है. रॉयल सेव की वैरायटी ऊपरी इलाकों की तरफ जा रही है. सर्दियों में बर्फबारी पर्याप्त मात्रा में नहीं हो रही है. मौसम में बदलाव के चलते सेव के पौधों को चिलिंग हावर्स नही मिल पाए हैं. सेब के पेड़ अब काफी पुराने हो चुके हैं अब बागवान इन्हें उखाड़ कर नए पेड़ भी लगा रहे है.

सेब की पैदावार बढ़ाने का ये है उपाय

हिमाचल में करीब 10 लाख परिवार खेती से जुड़े हुए हैं. इनमें से 2 लाख परिवार ऐसे हैं जो सेब की खेती करते हैं. राज्य की जीडीपी में भी इसका 13 फीसदी से ज्यादा का योगदान रहता है. ऐसे में सेब का घटता उत्पादन बागवानों और राज्य सरकार दोनों के लिए अच्छे संकेत नही दे रहा है. सेब उत्पादकों और विशेषज्ञों का मानना है कि अब प्रदेश के बागवानों को सेब की पुरानी किस्मों के पेड़ों के स्थान पर नई किस्म के ऐसे पेड़ लगाने शुरू करने चाहिए जिनपर मौसम का प्रभाव नहीं पड़ता है. 

 

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