गमले में आम लगाया है, आपने कभी? और लगाया है तो फल भी आते हैं क्या? और हां, मैं आम्रपाली जैसे आम की बात नहीं कर रहा हूं. बहुत तो नहीं, लेकिन आप में से कुछ लोग तो ऐसे होंगे जो अपने गमले में आम लगाए होंगे और कुछ लोग ऐसे भी होंगे, जो गमले में लगे आम से फल भी तोड़ रहे होंगे. मैंने भी अन्य पौधों की तरह गमले में आम लगाने की बहुत कोशिश की है लेकिन, अब तक मेरी एक ही कोशिश थोड़ी कामयाब रही है.
मेरे यहां गमलों में अनार और अमरूद से लेकर नींबू तक सभी तरह के फल मिल जाते हैं, लेकिन आम इतना खास हो गया है कि अभी तक मामला अंजाम तक नहीं पहुंच सका है. बचपन में तो आम खाने के बाद बीज जमीन में गड्ढा करके लगा देते थे तब तो चार-पांच पत्ते ही आए होते थे कि जमीन से बीज निकालकर उसका व्हिसल बजाने लगते थे तब तक, जब तक कि पूरा परिवार जबरदस्ती मना नहीं कर देता था.
बीज लगाने के प्रयोग तो बीते कई बरसों में भी किया है, लेकिन अब कभी उसका व्हिसल नहीं बजाता. कई बार पौधे बड़े भी हुए हैं, लेकिन बात उससे आगे नहीं बढ़ सकी है. जगह-जगह से पौधे लेकर भी बहुत सारे आम लगाए, लेकिन मामला एक खास लेवल तक पहुंच कर थम जाता है कर्म करने के बावजूद फल नहीं मिल पाता. अल्फांसो सहित कई आमों के बीज भी लगाए थे और पौधे बड़े भी हुए थे, लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात. बताने की बात बस इतनी ही होती है कि घर में पूजा के लिए पल्लव की जरूरत हो तो बाजार नहीं जाना पड़ता.
आम में फल आने को लेकर एक टेबल या पहाड़े की तरह एक देसी कहावत सुनी है - ‘पांचे आम, पचीसे महुआ, तीस बरिस पर इमिली के फहुआ. गमले में आम का पौधा लगाने के गंभीर प्रयासों की बात करें तो पहली बार आम लगाने के बाद बड़े आराम से पांच साल तक इंतजार करता रहा, लेकिन न तो मंजरी आई न फल. एक बार मंजरी जैसी चीजें दिखी जरूर थीं. कई मित्रों से पूछा भी कुछ एक को छोड़ कर किसी को मंजरी जैसा नहीं लगा और वे लोग बिल्कुल सही थे.
कहने का मतलब हुआ कि आम का पेड़ पांच साल में महुआ का पच्चीस साल में और इमली का पेड़ तीस साल में फल देने लायक होता है. वैसे ये काफी पुरानी बात होगी, क्योंकि अब तो कई तरह की आम की किस्में आ चुकी हैं. राजस्थान के कोटा शहर के पास एक किसान ने तो आम की ऐसी किस्म तैयार की है, जिसमें साल भर में तीन बार फल आते हैं. आठ साल तक लगातार प्रयोग और प्रयास करने के बाद किसान श्रीकिशन सुमन को 2005 में कामयाबी मिल पाई. इस आम का नाम रखा गया है सदाबहार आम.
एक बार एक नर्सरी वाले ने बारह महीने फलने वाला बोल कर आम के दो पौधे दिये थे. दोनों ही पौधों में आम के दो-दो कैरी लगे हुए थे, लेकिन बाद में टूट कर गिर गए. एक पौधा भी सूख गया. पौधे देते वक्त नर्सरी वाला बोला था, आम आएंगे, लेकिन आम के फल नहीं आये. पिछले साल भी एक नर्सरी वाले ने पहले वाले की ही तरह गारंटी वाले भाव में दावे के साथ आम का एक पौधा दिया था बल्कि, यहां तक दावा कर रहा था कि आम से सीजन के अलावा भी फल आते रहेंगे बस आप एनपीके डालते रहना.
नर्सरी वाले के बताए अनुसार तो नहीं, लेकिन मैं अपने तरीके से एनपीके डालता रहता हूं. एप्सम सॉल्ट और घर का बना ऑर्गेनिक खाद भी. दिलचस्प बात ये रही कि नतीजा बीते सीजन में ही देखने को मिल गया. जब बागों में पेड़ों पर मंजरी आई तो मेरे गमले में भी मंजरी बहार बन कर आई बिलकुल खिली खिली. पहले छोटी छोटी खूब सारी, फिर कुछ दिन बाद थोड़ी बड़ी भी हुईं. जैसा कि आम के हर पेड़ के साथ होता है, जितनी मंजरी नजर आती है फल उतने नहीं आते और मौसम के तमाम थपेड़ों से जूझते हुए कम ही फल बच पाते हैं.
मेरे गमले के आम के साथ भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ. आखिर में सोक किए हुए चीक पी के बराबर आम के दो कैरी नजर आ रहे थे. मैं तो उसी में खुश था, लेकिन अफसोस खुशी का ज्यादा देर का साथ नहीं रहा. शाम को गुड नाइट बोल कर बालकनी से लौटा था, लेकिन सुबह पहुंचा तो वे दोनों भी गमले में गिरे पड़े थे, जैसे कलेजे के टुकड़े पड़े हुए हों. अब अगले सीजन से ही उम्मीद है.