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अध्यात्म से विज्ञान का समागम

आइआइटी-कानपुर में छात्रों को गीता और रामायण के जरिए तनावमुक्त रहने का पाठ पढ़ाया जा रहा है. अध्‍यात्‍म का सहारा लेने के बाद छात्रों पर अनावश्‍यक दबाब काफी कम हुआ है.

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{mosimage}पढ़ाई के बोझ से बढ़ते तनाव, सेमेस्टरों में फेल होने से उपजते अवसाद और सबसे बढ़कर आइआइटी में बढ़ती आत्महत्याओं से चिंतित वहां के छात्र-शिक्षक अब शांति की तलाश में गीता और रामायण की शरण में आ रहे लगते हैं. आइआइटी-कानपुर में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मीधर बेहरा और उनके कोई 50 छात्र साथी 1980 में गठित भक्ति वेदांत क्लब के जरिए गीता और रामायण के उपदेशों से अन्य छात्रों को ज्ञान दे रहे हैं कि वे तनाव में न जिएं और उसे दूर करने के लिए प्राचीन ग्रंथों का पाठ करें. इस तरह आइआइटी के छात्र विज्ञान से ज्ञान यानी अध्यात्म की ओर बढ़ते दिख रहे हैं. उच्च प्रौद्योगिकी की पढ़ाई करके विदेश में बसने का सपना संजोए आइआइटी के ये छात्र अब हरे रामा, हरे कृष्णा की धुन पर नाचते-गाते हैं और मंत्रमुग्ध हो जाते हैं.

अध्‍यात्‍म से तनाव में कमी
मैकेनिकल इंजीनियरिंग में एम.टेक. कर रहे रोहित दसरापुरिया कहते हैं, ''मैं कक्षा से आने के बाद बहुत तनाव में आ जाता था. पढ़ाई बोझ लगने लगी थी. तभी भक्ति वेदांत क्लब के लोगों से मुलाकात हुई और उनके आध्यात्मिक केंद्र में जाकर नित्य प्रति गीता और रामायण का पाठ करने लगा. कुछ दिन बाद तनाव दूर होता लगा और पढ़ने में मन लगने लगा.'' एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में बी.टेक. कर रहे अर्पित शर्मा का कहना है, ''प्रथम सेमेस्टर में कम अंक आने पर मुझे बहुत ग्लानि हुई और मैं सोचने लगा कि वार्षिक परीक्षा में फेल हो गया तो माता-पिता को क्या मुंह दिखाऊंगा? तभी मेरी मुलाकात क्लब के संस्थापक डॉ. बेहरा से हुई, जिनसे मुझे संबल मिला और अपनी जीवन-शैली तथा पढ़ने के तरीके में कमी ज्ञात हुई. आगे से फिर ऐसा दौर न आए इसलिए मैं नित्य प्रति गीता और रामायण का पाठ करता हूं.''

दबाव से उबरने में सहायक
दरअसल, आइआइटी के छात्र घरेलू माहौल से निकलकर संस्थान के हॉस्टलों में मुक्त रूप से रहते हैं और उन्हें घर से खासा पैसा भी मिलता रहता है. इंटरनेट पर पसरा अश्लील वेबसाइटों का मायाजाल कोमल मन के इन छात्रों को अपने चंगुल में फंसाता रहता है. वे पढ़ाई और भविष्य की योजनाओं के दबाव के बीच फंस जाते हैं. नशा और पार्टीबाजी सामान्य बुरी आदतों के रूप में उनसे जुड़ती जाती है. उनमें अच्छे प्रदर्शन का दबाव भी घर और संस्थान दोनों ओर से रहता है. युवा पीढ़ी घर से दूर एकाकीपन और तनाव के चलते टूट जाती है. बकौल डॉ. बेहरा, ''एकाकीपन के चलते जब छात्र किसी बड़े से अपनी बात नहीं कह पाता तो उसे अपने सभी रास्ते बंद से लगते हैं और इसी से वह आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होता है.''

बढ़े हैं आत्‍महत्‍या के मामले
गत वर्षों में आत्महत्या के मामले तेजी से बढ़े भी हैं. अकेले कानपुर के आइआइटी में, जहां कोई 4,500 छात्र अध्ययन करते हैं, पिछले 12 वर्षों में आत्महत्या की 23 घटनाएं हुई हैं. पिछले तीन साल में तो यह आंकड़ा 12 तक पहुंच गया. संस्थान में इसके समाधान के लिए एंटी सुसाइड सेल (काउंसलिग सेंटर) भी है, जिसकी स्थापना 1968 में की गई थी. इसके प्रमुख एअरोस्पेस विभाग के डॉ. ए.के. घोष मानते हैं, ''छात्रों के तनाव और फेल होने के दबाव के कारण आत्महत्याओं में वृद्धि हुई है. कोई 20 प्रतिशत छात्र विभिन्न कारणों से निरंतर तनाव में रहते हैं. शैक्षणिक, आर्थिक और भावनात्मक स्तर पर उन्हें परामर्श मुहैया कराया जाता है.'' पर जानकारों के अनुसार, यह प्रकोष्ठ कोई ज्‍यादा कारगर नहीं है. डॉ. बेहरा कहते हैं, ''छात्रों को इसका लाभ नहीं मिला. ऐसी स्थिति में मैंने तनाव से दूर रहने की खोज गीता और रामायण में की, जो हिंदू धर्म से संबंधित होने के बावजूद कर्म पर आधारित होने के कारण सभी धर्म के छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी हैं. उनकी शिक्षाओं, उपदेशों और भजनों से मैंने धीरे-धीरे छात्रों में समर्पण की भावना जागृत की और कर्म पर विश्वास को मजबूत किया.''{mospagebreak}
आकांक्षाएं पूरी न होने से बढ़ती हताशा
भक्ति वेदांत क्लब के अनुयायियों का मत है कि विगत वर्षों में बी.टेक. और एम.टेक. के छात्रों में तनाव और हताशा में तेजी से वृद्धि की एक वजह विश्व में भारतीय मेघा का सही रोजगार के माध्यम से मूल्यांकन न होना है. इसके लिए वे अमेरिका में ट्विन टॉवर की घटना, भारत के परमाणु परीक्षण और वर्तमान की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी को जिम्मेदार मानते हैं. कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी से बी.टेक. और एम.टेक. के छात्र अपनी योग्यता के अनुसार पश्चिमी देशों में खप जाते थे, पर उपरोक्त घटनाओं के कारण अति योग्य भारतीय छात्रों का भी पश्चिमी देशों की ओर बहाव रुका है और वहां से उनका लौटना तेजी से बढ़ा है. आज आइआइटी में भारत की सर्वश्रेष्ठ मेधा पढ़ रही है जिसे अब तक अपनी श्रेष्ठता पर गर्व था और ये अधिकतर पढ़ते तो भारत में थे, मगर जीते खुद के लिए थे और बसते किसी और देश में थे. इस स्थिति में परिवर्तन आया और उनमें श्रेष्ठ रहने का दबाव बढ़ा जिससे आत्महत्या की पुनरावृत्ति बढ़ी.

छात्रों ने छेड़ा नया भक्ति आंदोलन
इसकी काट के लिए डॉ. बेहरा और उनके अनुयायी छात्रों ने नया भक्ति आंदोलन छेड़ा. इसका मूल उद्देश्य भारतीय संस्कृति को अपनाते हुए अंग्रेजी को भाषा के रूप में स्वीकार करना है और अंग्रेजियत को खुद से दूर रखना है. इसलिए भक्ति वेदांत क्लब टेक्नोक्रेट होते हुए भी गाय, गंगा और गांव की पवित्रता और अस्तित्व को बचाए रखने पर जोर देता है. इसके सभी सदस्य सुबह 5 बजे मंगलआरती में शामिल होते हैं. 15 मिनट की आरती के बाद 15 मिनट हरे कृष्णा महामंत्र के जप और 15 मिनट हरी नाम संकीर्तन के बाद वे एक घंटा श्रीमद्भागवत का अध्ययन करते हैं. इसके बाद प्रसादम्‌ ग्रहण कर सभी छात्र अध्ययन के लिए अपने कक्ष में चले जाते हैं. इसी प्रकार शाम को 7 से 8 बजे तक गौर आरती, कीर्तन, भगवद्गीता का अध्ययन और प्रसादम्‌ का कार्यक्रम होता है. शनिवार और रविवार को शाम की समयावधि 7 से 9 हो जाती है, जिसमें नए छात्रों को आमंत्रित कर गीता का अध्ययन क्यों करें और गीता के अध्ययन के महत्व और जप के महत्व पर परिचर्चा की जाती है. बी.टेक. (कंप्यूटर सांइस) कर रहे ऋषि कुमार का मानना है, ''जब भी मैं तनाव में होता हूं तो हरे रामा हरे कृष्णा का जाप मुझे आराम देता है.'' बी.टेक. टॉपर विपुल अरोड़ा गीता के उपदेशों की तरफ इसलिए आकर्षित हुए कि वहां ''उन्हें विज्ञान से जोड़कर समझते हैं.''
 
धार्मिक आस्था है व्यक्तिगत मामला
उधर, डॉ. घोष धार्मिक आस्था को व्यक्तिगत मामला मानते हुए कहते हैं कि आइआइटी प्रशासन इसको मान्यता नहीं देता है. लेकिन ऐसे छात्र भी हैं जो इस क्लब के सदस्य नहीं होने के बावजूद इसकी गतिविधियों को गलत नहीं मानते. यहां पीएचडी कर रहे आगरा निवासी नीरज गुप्ता का कहना है, ''समयाभाव के कारण मैं क्लब की सदस्यता नहीं ले सका, पर इसके साप्ताहिक कार्यक्रमों में या प्रसादम्‌ के समय यदा-कदा शामिल रहता हूं.''

क्लब ने आइआइटी परिसर के बाहर भी कालपी के निकट खरूसा गांव को अपने संरक्षण में लेने की योजना बनाई है जहां पुरुष नशाखोरी में रत हैं और महिलाएं तथा बच्चे अन्य कार्य करते हैं. यहां के छात्र रामबहादुर सिंह ने पढ़ाई के बाद अपने गांव पड़वा, ललितपुर के लोगों को नशा विशेषकर गुटखा खाने से रोका और नशामुक्त गांव बनाया. इसी प्रकार दसरापुरिया ने अपनी पाश्चात्य जीवन शैली को पूरी तरह त्याग दिया. कुल मिलाकर कहें तो यह देश के एक सर्वश्रेष्ठ तकनीकी संस्थान के कुछ छात्रों द्वारा भारतीय अध्यात्म में शांति खोजने के लिए किया जा रहा एक प्रयोग है.

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