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साइंस न्यूज़

खतरे में पहुंची शार्क प्रजातियां अब बन रही हैं पालतू जीवों का खाना, DNA टेस्ट में खुलासा

sharks in pet food
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अगर आपके कुत्ते या बिल्ली का खाना आप बाहर से ला रहे हैं, तो एक बार देख लीजिएगा... कि कहीं उसमें शार्क मछली (Shark) मछली तो नहीं मिली है. क्योंकि हाल ही में पता चला है कि पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) में उन शार्क मछलियों को शामिल किया जा रहा है, जिनकी संख्या धरती पर कम है. या उनकी प्रजाति खत्म होने की कगार पर जा रही है. यह जानकारी पालतू जानवरों के खाने की DNA जांच से पता चली है. (फोटोः फर्नांडो जॉर्ज/अन्स्प्लैश)

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पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) पर अक्सर समुद्री स्रोत वाले पदार्थों (Ocean Sourced Ingredients) के बारे में जेनेरिक भाषा में फिश (Fish), व्हाइट फिश (White Fish), व्हाइट बेट (White Bait) या ओशन फिश (Ocean Fish) लिखा होता है. जब इनकी जांच की गई तो पता चला कि पालतू जानवरों का खाना बनाने वाली कंपनियां ऐसे नाम लिखकर ये बात छिपा लेती हैं कि इस उत्पाद में किस मछली को शामिल किया जा रहा है. (फोटोः गेटी)

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31 फीसदी सैंपल में मिले शार्क मछली के अंश

शोधकर्ताओं ने सिंगापुर में बिकने वाले 16 ब्रांड्स के 45 पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) की DNA जांच की. किसी भी उत्पाद में शार्क (Shark) जैसे शब्द का उपयोग उनके इनग्रेडिएंट में नहीं लिखा था. लेकिन जांच में पता चला कि 31 फीसदी सैंपल में शार्क मछली के डीएनए हैं. जिन शार्क मछलियों के डीएनए पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) में मिले हैं, उन्हें इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेटर (IUCN) ने खत्म होने वाली प्रजातियों की सूची में डाल रखा है. (फोटोः गेटी)

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नई तकनीक से किया गया हैरान करने वाला खुलासा

पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) में सिल्की शार्क (Silky Shark) यानी कैर्चारहिनस फैल्सीफॉर्मिस (Carcharhinus falciformis) और व्हाइटटिप रीफ शार्क (Whitetip Reef Shark) यानी ट्राइएनोडोन ओबेसस (Triaenodon obesus) कहते हैं. आमतौर पर डब्बा बंद पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) को इतना ज्यादा प्रोसेस कर दिया जाता है कि उसमें से डीएनए की जांच करना मुश्किल होता है. इसलिए वैज्ञानिकों ने नई तकनीक का उपयोग किया. जिसे मिनी-बारकोडिंग (Mini-Barcoding) कहते हैं. 

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पैक्ड फूड प्रोडक्ट्स में ज्यादा प्रोसेसिंग से टूटते हैं DNA

डीएनए टेस्टिंग के समय बारकोडिंग करके सैंपल को डीएनए बारकोडिंग (DNA Barcoding) दी जाती है. ताकि उसका जेनेटिक डेटा बारकोड्स के जरिए सुरक्षित रहे. साथ ही उसकी प्रजाति के जीनोम की सही जानकारी दे सके. लेकिन पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) में ज्यादा प्रोसेसिंग होने की वजह से शार्क के जीनोम मिलने मुश्किल होते हैं. वो बेहद सूक्ष्म टुकड़ों में टूट जाते हैं. इसलिए वैज्ञानिकों ने मिनी-बारकोडिंग करके पता लगाया कि पालतू जानवरों के खाने में शार्क मछली के अंश हैं. (फोटोः गेटी)

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एक भी हिस्सा बर्बाद न हो, इसलिए पेट फूड्स में शामिल शार्क

पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) में सबसे ज्यादा जिस शार्क मछली के अंश मिले हैं, वो है ब्लू शार्क (Prionace glauca). IUCN ने शार्क की इस प्रजाति को खतरे वाली सूची में डाल रखा है. कई स्टडीज में यह बात सामने आई है कि ब्लू शार्क को व्यवसायिक तौर पर मछली पकड़ने के दौरान बाई-प्रोडक्ट की तरह देखा जाता है. दक्षिण-पूर्व एशिया में इस शार्क के फिन्स का व्यापार बहुत ज्यादा होता है. (फोटोः गेटी)

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पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) में शार्क मछलियों के अंश का मिलना यानी इस मछली का वैध या अवैध व्यापार करने वाले लोग ये नहीं चाहते कि मरी हुई मछली का एक भी अंग या हिस्सा बेकार जाए. तो वो इसे पेट फूड्स बनाने वाली कंपनियों को बेंच देते हैं. वैज्ञानिकों ने बताया कि ब्लू, सिल्की और व्हाइट रीफ शार्क के अलावा 9 और प्रजातियों की शार्क मछलियां पालतू जानवरों के खाने में मिली हैं. (फोटोः गेटी)

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इन शार्क के DNA मिले पालतू जानवरों के खाने में

इन शार्क के नाम हैं-  सिल्की शार्क (Silky Shark), व्हाइटटिप रीफ शार्क (Whitetip Reef Shark), ब्लू शार्क (Blue Shark), स्पॉटटेल शार्क (Spottail Shark), स्लिटआई शार्क (Sliteye Shark) और सैंड टाइगर शार्क (Sand Tiger Shark). इनके अलावा 16 सैंपल्स ऐसे थे, जिनके डीएनए की जांच करने पर पता चला कि ये कैर्चारहिनस जीनस के हैं. (फोटोः गेटी)

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क्या है पेट फूड्स को लेकर नियम?

पालतू जानवरों के खाने (Pet Foods) बनाने वाली कंपनियों के लिए जरूरी नहीं है कि वो अपने उत्पाद के लेबल पर यह बताएं कि उनके उत्पाद में शार्क का मीट है. लेकिन उन्हें इस काम से ओशन फिश (Ocean Fish) नाम का शब्द बचा लेता है. ताकि पर्यावरण और जीव प्रेमियों का गुस्सा न बर्दाश्त करना पड़े. ताकि यह पता न चल सके कि ये कंपनियां पालतू जानवरों के खाने में किस तरह के पदार्थ मिला रही हैं. यह स्टडी हाल ही में फ्रंटियर्स इन मरीन साइंस नाम के जर्नल में प्रकाशित हुई है. (फोटोः गेटी)