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नास्तिक और आस्तिक में क्या अंतर है?

Sadhguru article: किसी धर्म और एक आध्यात्मिक प्रक्रिया में बुनियादी अंतर यह है कि कोई धर्म मुख्यतया विश्वास प्रणालियों के संग्रह से आता है जबकि आध्यात्मिक प्रक्रिया एक खोज है. तो जो लोग किसी धर्म का अनुसरण करते हैं, उन्हें विश्वासकर्ता कहा जाता है और जो आध्यात्मिक माग पर हैं, उन्हें खोजकर्ता कहा जाता है.

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सद्गुरु जग्गी वासुदेव. सद्गुरु जग्गी वासुदेव.

विश्वास प्रणालियां कई तरह की हैं. लोग आस्तिक यानी ईश्वरवादी हो सकते हैं या नास्तिक यानी अनीश्वरवादी हो सकते हैं. एक विश्वास करता है कि भगवान होता है, दूसरा विश्वास करता है कि कोई भगवान नहीं होता, लेकिन इन दोनों में कोई अंतर नहीं है; दोनों एक ऐसी चीज में विश्वास करते हैं जो वे नहीं जानते.

मुख्य रूप से, विश्वास प्रणाली एक बुनियादी समस्या से आती है कि आप यह स्वीकार करने के लिए पर्याप्त ईमानदार नहीं हैं कि आप नहीं जानते. अगर आप कोई चीज खोजना चाहते हैं तो पहली और सबसे अहम चीज यह है कि आपको एहसास हो गया है कि आप नहीं जानते. जब आप यह देखते हैं, तो जानने की लालसा पैदा होती है, और फिर खोजना शुरू होता है. तब जाकर जानने की संभावना बनती है. ‘मैं नहीं जानता’ एक जबरदस्त संभावना है. जिस पल आप उसे किसी तरह के विश्वास से मार देते हैं, जो आपके लिए सुविधाजनक होता है, आप जानने की सारी संभावनाएं नष्ट कर रहे होते हैं.

अगर आप सवालों को जीवित रखते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से एक साधक हैं. मैं चाहता हूं कि आप वैसे बने रहें जहां आप इस बात से समझौता कर लेते हैं कि ‘जो मैं जानता हूं, उतना मैं जानता हूं, जो मैं नहीं जानता, उसे मैं नहीं जानता.’ लेकिन कुछ समय बाद, मन चालाक बन जाएगा. 10 साल की उम्र में आप जैसे थे उससे, अब आप जैसे हैं, क्या आप थोड़े ज्यादा चालाक नहीं बन गए हैं? दुर्भाग्य से, जब तक वे 30 साल के होते हैं, ज्यादातर लोग बहुत चालाक बन जाते हैं. वे कहना शुरू कर देंगे, ‘भगवान ने पूरा जगत बनाया है,’ हालांकि वे कुछ भी नहीं जानते.

अपनी मृत्युशैया पर भी, आप तब भी कई चीजें नहीं जानते होंगे. क्या यह ठीक है, या आप बस धारणा बना लेंगे? बहुत से लोग जो पूरे जीवन भर नास्तिक रहे, जब मृत्यु आने लगती है तो वे प्रार्थना करने लगते हैं क्योंकि वे उस मौके पर थोड़ी निश्चितता चाहते हैं. लेकिन आध्यात्मिक प्रक्रिया का मतलब है अनिश्चितता का जश्न मनाना. हम जानते हैं कि यह जीवन अनिश्चित है, और हम यह देखते हैं कि इस अनिश्चितता से निपटने के लिए खुद को कैसे समर्थ बनाएं.

अभी, हर कोई निश्चितता का एक झूठा भाव पैदा करने की कोशिश कर रहा है. ‘भगवान वहां बैठे हैं; चिंत मत करो, भगवान तुम्हारा ख्याल रखेंगे.’ लेकिन वैसा कुछ नहीं होता. जो चीज आप अच्छे से संभालते हैं, वह ठीक से काम करती है; जिसे आप ठीक से नहीं संभालते, वह झमेला बन जाती है. और इतनी सारी अनिश्चितताओं के साथ, अगर हम हर चीज ठीक से संभालते भी हैं, तो कल सुबह हम मर भी सकते हैं. यह संभव है. आपको खुद को अनिश्चितता को अनिश्चितता की तरह संभालने में समर्थ बनाना होगा, और आपको आत्मविश्वास, विश्वास और विचारधारा से निश्चितता का एक झूठा भाव नहीं लाना चाहिए.

किसी चीज में विश्वास करने का लाभ है कि आपको आत्मविश्वास मिल जाता है. दुर्भाग्य से, दुनिया में धर्मों से और कई दूसरी तरह की विचारधाराओं से, अपनी स्पष्टता को पैना करने के बजाय, लोग आत्मविश्वास बनाने की कोशिश कर रहे हैं. आत्मविश्वास स्पष्टता का विकल्प नहीं है. बिना स्पष्टता के आत्मविश्वास सबसे बड़ी आपदा है जिसे इंसान इस धरती पर फैला रहा है. 

मान लीजिए मैं लोगों की भीड़ में से गुजरना चाहता हूं, लेकिन मेरी दृष्टि स्पष्ट नहीं है. मुझे कम से कम हिचकना चाहिए और मदद मांगनी चाहिए, ‘कृपया, क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं?’ इसके बजाय, अगर मुझमें आत्मविश्वास है, तो मैं हर किसी से टकराता हुआ और उनके पैर कुचलता हुआ चलूंगा. जिन लोगों के पास स्पष्टता के बिना आत्मविश्वास है, वे लोग यही कर रहे हैं. उनमें जबरदस्त आत्मविश्वास है क्योंकि वे मानते हैं कि वे स्वर्ग जा रहे हैं. स्वर्ग की अवधारणा सबसे बड़ा अपराध है जो मानवता पर किया गया है. यह सोच कि रहने के लिए इससे बेहतर जगह मौजूद है, सबसे बुरी धारणा है जिसने मानवता को नष्ट किया है.

मान लीजिए कि आप भरपेट नहीं खा रहे हैं और आपके पास खाना नहीं है - लोग विश्वास करते हैं, ‘चिंता मत करो, जब तुम वहां जाओगे, वहां बहुत सारा खाना होगा!’ मान लीजिए आपका जीवन अच्छा नहीं है - वे विश्वास करते हैं, ‘चिंता मत करो, जब तुम भगवान की गोद में बैठोगे, तो हर चीज शानदार होगी.’ 

इस तरह की बेवकूफी की सोच बहुत लंबे समय से चल रही है. इस खत्म करने का यही समय है. आप इस जगह को या तो स्वर्ग बना सकते हैं या आप उसे नरक बना सकते हैं - यह हमारे हाथ में है. यह नास्तिकता या आस्तिकता नहीं है. यह बस एक समझदार इंसान होना है.

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