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कहानी | काला धुआं | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

शहर में हर तरफ दंगे फैले हुए थे। सड़कों से जली हुई गाड़ियों का काला धुआं उठ रहा था और बीच बीच में पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियां सन्नाटे को चीरती हुई निकल जाती थीं। इसी वक्त मैं एक सड़क पर अपनी कार में बैठा मदद का इंतज़ार कर रहा था क्योंकि रास्ते में मेरी कार ख़राब हो गयी थी। तभी एक शख्स ने खिड़की पर दस्तक दी और उसके बाद वो हुआ जिसका मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था - सुनिए स्टोरीबॉक्स में कहानी 'काला धुआं' जमशेद कमर सिद्दीक़ी से

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कहानी - काला धुआं
जमशेद कमर सिद्दीक़ी

 

शहर में फसाद फैला हुआ था। कई दुकानें जला दी गयी थीं। दो मज़हबी गुटों के बीच हुई थोड़ी सी कहासुनी ने अब एक बड़ी आग की शक्ल ले ली थी। दोनों तरफ से कई आवाज़ें अपने-अपने नारों के साथ चीख रही थीं। 

आखिर कब तक बर्दाश्त करें हम.. कब तक...  शहर के एक चौराहे पर जमी भीड़ में एक नेता एक दुकान के ऊंचे पायदान पर खड़ा चीख रहा था ... उसके हाथ में मोबाइल फोन था जिसमें कोई वीडियो चल रही थी और वो भीड़ की तरफ वीडियो दिखाते हुए चीख रहा था- देख रहे हैं आप लोग ये .... ये हो रहा है....ये वीडियो आपके फोन में आई होगी... देखिए इसे और अगर इसे देखने के बाद भी तुम्हारा खून नहीं खौलता... तो शर्म से डूब मरो तुम लोग... और अगर शर्म है... तो कहो मेरे साथ कि - अब हम बदला लेंगे... ऐसा सबक सिखाएंगे कि कभी भूल नहीं पाएंगे... 

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(बाकी की कहानी यहां से पढ़ें) उसके ये कहते ही भीड़ में सुगबुगाहट होने लगी। कुछ लोग अपने अपने फोन में आई उसी वीडियो को देखने लगे... और उनकी भवें तन गयीं। उस नेता के लफ्ज़ और लहजे में उसने कहा कि भीड़ के खून में उबाला आने लगा। सबकी भुजाएं फड़कने लगीं... चलो चलते हैं उनकी बस्ती में... आओ मेरे पीछे... उस नेता ने कहा और भीड़ उसके पीछे चलती चली गयी। 

टीवी पर खबरों के चैनलों की हड़बड़ाई पट्टियों पर पूरे शहर की जानकारी आ रही थी... बताया जा रहा था कि कहां पर क्या हालात हैं... कई इलाकों में घर में घुसकर आग लगा दी गयी थी... अब तक कई जानें जा चुकी थीं। कौन किस पर ज़ुल्म कर रहा था पता नहीं चल रहा था क्योंकि जो जहां भारी था, वो वहां दूसरे को दबा रहा था। काला गाढ़ा धुआं... जली हुई गाड़ियों, ठेलों, दुकानों से उठता हुआ आसमान में शामिल हो रहा था। इस फसाद में इस लड़ाई में... न किसी नेता की कोई गाड़ी जली थी, न किसी अमीर आदमी का शो रूम... जले थे तो वही गरीब, मज़लूम, परेशान हाल लोगों की छोटी छोटी दुकानें, बैटरी रिक्शे, एक एक कमरे के घर, साइकिलें... और उनके सपने। 

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मेरी किस्मत भी उस दिन खराब थी जो मैं पापा के मना करने के बावजूद घर से कार लेकर निकल गया था। दरअसल उस रोज़ मुझे अपनी बेटी से मिलने जाना था... मेरी बेटी जो अपनी मम्मी के साथ रहती थी, हमारे सेपरेशन के बाद से। मैं हर हफ्ते उससे मिलने जाता था... पर इस वीकेंड पर नहीं जा पाया था। हालांकि मेरी एक्स वाइफ और मेरी बेटी सिया ने मुझे मना किया था कि मैं न आउं... रास्ते में खतरा है... लेकिन मुझे सिया से मिलने का बहुत मन था। वो यूं भी शहर में फैली नेगेटिविटी से, टीवी रेडियो पर आती खबरों से घबरा गयी थी। छ साल की बच्ची के लिए ये सब बहुत बुरा था। मैंने सोचा था कि उसके पास जाउंगा और उसे नार्मल करूंगा। पर मुझे क्या पता था कि अचानक शहर का माहौल इतना बिगड़ जाएगा... और उसी बिगड़े हुए माहौल में मेरी गाड़ी खराब हो जाएगी... 

मैंने ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे बंद पड़ी कार की चाभी को फिर से घुमाया। पर कार स्टार्ट नहीं हुई। मैंने सड़क पर देखा... सन्नाटा था... शाम ढलने लगी थी... इलाके की दीवारों से धूप उतर रही थी। मैंने गुस्से में स्टीयरिंग पर हाथ मारा तो हॉर्न बज गया। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं... आज तो कहीं मेकैनिक भी नहीं मिलने वाला था...तभी मेरा फोन बजा... 
हैलो... संजय बेटा... कहां पहुंचे - पापा की आवाज़ आई तो मैंने खुद को थोड़ा संभाला... मैं नहीं चाहता था कि उन्हें पता चले कि मेरी गाड़ी खराब हो गयी है और मैं फंस गया हूं... वो बिल्कुल ही घबरा जाते... मैंने कहा... पापा मैं ठीक हूं... अभी थोड़ी देर में पहुंच जाऊंगा। 
हम्म.. ठीक है...
पापा बोले... बेटा... थोड़ा संभल कर रहना... माहौल तो तुम देख ही रहे होगे... ये लोग... किसी भी हद तक जा सकते हैं... 
मैंने कहा... हां पापा मुझे पता... आप फिक्र मत कीजिए... मैं... ठीक हूं... अभी पहुंच कर फोन करता हूं आपको... 

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कहते हुए मैंने कॉल जल्दी से कट किया और फिर फोन में देखने लगा कि किससे मदद मांगी जा सकती है। पर कौन ही करता मदद... ऐसे माहौल में कौन अपनी जान का रिस्क लेकर मदद करने आता। मैंने सर उठाकर इलाके का जायज़ा किया... सामने की तीन चार दुकानों के नाम से अंदाज़ा लग रहा था कि ये... ये मुस्लिम मेजॉरिटी वाला इलाका था। सच बताऊं तो अब मैं थोड़ा सा घबरा गया था। गाड़ी में बैठे-बैठे एक घंटा हो चुका था। रास्ते में मैंने जो मंज़र मैंने देखे थे वो अबतक मेरी आंखों में कौंध रहे थे। जलती मोटर साइकिलें, रोते-बिलखते लोग और लाठी-डंडे थामे भीड़ के मज़हबी नारे। 

तभी ठक ठक की ज़ोर की आवाज़ हुई... तो मैं कांप गया। देखा तो कार के शीशे के पास कोई था। 
- “क्या कर रहे हो यहां” मैंने देखा कि एक एक लंबा-चौड़ा शख्स था। मैंने डरते-डरते शीशा नीचे किया तो वो झुका, “क्या बात है”
- “वो.. वो एक्चुअली.. मेरी.. मेरी गाड़ी खराब हो गयी.. स्टार्ट नहीं हो रही... मैंने कोशिश भी” कहते-कहते मैंने देखा, उसकी नज़रें मेरी कार के डैशबोर्ड पर रखी गणेश जी की मूर्ति पर थी। लेकिन जिस्म में सनसनाहट तब बढ़ गयी जब मेरी नज़र उसकी कमीज़ के कॉलर के नीचे से झांकती ताबीज़ पर पड़ी। मैंने कहा, "दोस्तों को फोन कर दिया है... यहीं रहता है... बिल्कुल दो मिनट की दूरी पर... आते ही होंगे... बल्कि शायद उन्हीं का फोन आ गया"... कहते हुए मैंने बिना किसी कॉल के फोन कान में लगा कर बात करने की एक्टिंग की। 

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"हां भई, पहुंच गए ... ठीक है... मैं भी बस यूं हूं... हां.. हां... तीन चार लोग हो तो बस ठीक है... आ जाओ... आ जाओ" मैं उसको सुनाना चाहता था ताकि वो ये न समझे कि मैं अकेला हूं। मैंने फोन रखा... और झूठमुठ कॉल डिस्कनेक्ट की... फिर उसकी तरफ देखकर कहा... आ ही गए वो लोग

लेकिन तभी हमारी नज़रें मिलीं तो अजीब सा शक गहरा गया। एक पल में ज़हन में सोशल मीडिया पर दोस्तों, रिश्तेदारों की गुस्से और नफरत से भरी पोस्ट्स घूमने लगीं। मेरी हथेलियां पसीजने लगीं। वो मुझे गौर से देख रहा था... बिना चेहरे पर कोई एक्सप्रैशन लाए हुए। मैंने गले में कुछ गटकते हुए कहा... ठीक है फिर वो लोग आ ही गए... और ये कहते हुए मैंने फुर्ती से शीशा चढ़ा लिया। मेरी कनपटी से पसीने की बूंदे सरकने लगी थीं। वो पीछे गया... मैं उसे साइ़ड मिरर में देख रहा था। वो पीछे गया और नंबर प्लेट देखने लगा। मैंने घबराहट छुपाने के लिए मोबाइल स्क्रॉल करने लगा। इधर, सोशल मीडिया पर हर पोस्ट से नफ़रत टपक रही थी जो धीरे-धीरे एक गुस्से-डर के मिली जुले रंग में, मैं अपने अंदर भी महसूस कर रहा था। कनखियों से मैंने कार के साइड मिरर में फिर से देखा तो वो फोन पर किसी से बात कर रहा था, शायद... शायद किसी को बुला रहा था। मेरे हाथ पैर फूलने लगे... ऐसा लगा जैसे अब जान पर बन आई है.... शीशा मैंने थोड़ा सा नीचे किया... बिलकुल इंच भर ताकि फोन पर उसकी बात सुन सकूं... वो फोन पर कह रहा था... 

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हां यही है... मरून कार है... तुम लोग आ जाओ... मैं यहीं हूं

मेरी धड़कने तेज़ होने लगीं। अब मैं क्या करूंगा... कैसे अपनी जान बचाऊं... मेरा ब्लड प्रेशर तेज़ हो गया था। मैं कार से निकल कर भागना चाहता था लेकिन मौके का इंतज़ार कर रहा था। तभी, तभी अचानक वो शख्स मुड़ा और सामने वाले पीले मकान में चला गया। यही मौका था... मैं जल्दी से कार से निकला और पीछे जाकर डिग्गी खोली और वहां से एक लोहे का पाना थाम लिया। मेरा इतना ही दिमाग चल पाया। पर मुझे खुद पर थोड़ा फख्र हो रहा था कि मैंने समझदारी का काम किया। कम से कम कुछ तो रहेगा मेरे हाथ में। धड़कनें सीने से बाहर आई जा रही थीं। मैं बस.. बस दुआ करने लगा कि जिन दोस्तों को मैंने फोन किया था... मेरे खास दोस्त... जिनके साथ दिन रात का उठना बैठना था... और जिन्होंने मेरी कॉल नहीं उठाई... कम से कम मेरा मैसेज देखकर ही जवाब दे दें।... कोई तो मदद कर दे... 

तभी मैंने देखा कि एक आदमी गली से निकला... और वो मेरी तरफ बढ़ा... उसने टोपी लगा रखी थी और एक मैला सा कुर्ता पहना था। मैंने रॉड को कस लिया... मैं किसी भी वार के लिए तैयार था... पर भागूं या न भांगू के बीच फैसला नहीं कर पा रहा था। भागने पर कहीं वो मुझे दौड़ा न ले... आगे और लोग भी हो सकते हैं... नहीं, भागना नहीं है... मैं हड़बड़ाया हुआ सोच ही रहा था कि तभी उसने कहा,,,

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- “जी बताइये, क्या हो गया गाड़ी में... स्टार्ट नहीं हो रही....” मैं .. मैं चौंक गया। मैंन हड़बड़ाते हुए कहा, "आप आप कार मकैनिक?" 
- वो बोला, "जी भाई जान... वो अभी अभी अहमद भाई का कॉल आया था मेरे पास कि कोई भाई फंस गया है... आकर मदद कर दो... तो मैं चला आया... यहीं तो रहते हैं... वो देखिए... वो रहे....स्लालेकुम अहमद भाई"

उसने उसी पीले मकान के बालकनी पर खड़े उस आदमी की तरफ हाथ उठाकर इशारा किया, जो थोड़ी देर पहले यहां खड़ा था। मेरे पास। यानि उसी ने इस मकैनिक को बुलाया था कि वो मेरी मदद कर दे। मेरे हाथ में कसा पाना... ढीला पड़ने लगा था। आंखे जो कुछ देर पहले शक से फैली थीं... अब शर्म से झुकी जा रही थीं.... दुनिया में नफरत कितनी तेज़ फैलती है... और सच को पनपने के लिए कितना जद्दोजहद करना पड़ता था। मैंने सर घुमाकर पीले मकान की बालकनी में खड़े आदमी की तरफ ग़ौर से देखा... वो दूर था इसलिए उसकी शक्ल तो मुझे नहीं दिख रही थी... पर मैं खुद से शर्मिंदा था कि मैं उसे कितना गलत समझ रहा था... मैंने हाथ उठा कर उसे अभिवादन किया... उसने वहां से हाथ उठाकर जवाब दिया... इतनी देर में दूसरा आदमी मेरी कार का बोनट खोलकर चेक करने लगा... और मैं वहीं टेक लगाकर खड़ा हो गया और सोचना लगा कि इंसान का इंसान से इतना अविश्वास क्यों है... दुनिया उतनी बुरी भी नहीं है, जितनी हमाई दिखाई या सुनाई जाती है... मेरा फोन बजा

- “हैलो..” मैंने कहा। दूसरी तरफ पापा थे।
- “कहां पहुंचे तुम? उन्होंने पूछा तो मैंने कहा 
- “बस आ रहा हूं पापा”
- “अरे जल्दी निकलना चाहिए था। अभी एक वीडियो आई है मेरे पास.....उसमें..... ये लोग.... ”
 
- पापा.... मैंने उनकी बात काटते हुए पीले मकान की तरफ देखा और कहा, “हां पापा शहर के हालात खराब हैं, लेकिन फिक्र मत कीजिए। इस शहर को कुछ नहीं होगा”

 

(पूरी कहानी सुनने के लिए ऊपर दिए गए लिंक पर क्लिक करें या फिर SPOTIFY, APPLE PODCAST, GOOGLE PODCAST, JIO-SAAVN, WYNK MUSIC में से जो भी आप के फोन में हो, उसमें सर्च करें STORYBOX WITH JAMSHED)

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