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रामविलास शर्मा रचनावली: पढ़ें-पुस्तक के अंश

पुस्तक में भारतीय इतिहास के बारे में बहुत-सी बातें कही गई हैं. सिन्ध और पंजाब से आर्य लोग उत्तर प्रदेश और बिहार तक पहुंचे. ऐसा लगता है कि वे दो रास्तों से एक साथ भारत में प्रवेश कर रहे थे.

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रामविलास शर्मा रचनावली रामविलास शर्मा रचनावली

रामविलास शर्मा रचनावली 18 खंडों का संपूर्ण सैट है जिसे रामकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. यह डॉक्टर रामविलास शर्मा के संपूर्ण आलोचनात्मक लेखन की प्रस्तुति है, जिसमें उनके विचार परख लेखन को संकलित किया गया है. पेश हैं पुस्तक के अंशः- 

रामविलास शर्मा रचनावली खंड-9 से 

कला का इतिहास 

महेन्द्रसिंह रंधावा और जान कैनेथ गेलब्रेथ ने भारतीय चित्रकला पर इंडियन पेंटिंग्स : द सीन, थीम्स एंड लीजेंड नाम से एक सुन्दर पुस्तक लिखी है. यह 1968 में अमरीकी नगर बोस्टन से प्रकाशित हुई थी. रंधावा भारतीय चित्रकला पर इससे पहले भी लिखते रहे हैं. वे हिमाचल प्रदेश की कला के विशेषज्ञ रहे हैं. गेलब्रेथ भारत में अमरीकी राजदूत थे. भूमिका से ज्ञात होता है कि सामग्री रंधावा ने एकत्र की, उसे क्रमबद्ध कथा का रूप दिया गेलब्रेथ ने. गेलब्रेथ मूलत: अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ हैं. यहाँ वह चित्रकला के साथ प्रकृति के प्रेमी के रूप में प्रकट होते हैं. चित्रों के सौन्दर्य के अतिरिक्त यहाँ जो प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन किया गया है, उसके लिए भी यह पुस्तक पढ़ी जाने के योग्य है. यहाँ भारतीय इतिहास के बारे में बहुत-सी बातें कही गई हैं. इनमें कुछ दूसरों से उधार ली हुई हैं और कुछ अत्यन्त मौलिक हैं.

प्रथम सहस्राब्दी ई.पू. के मध्य में भारत पर घुमन्तू आर्य कबीलों ने आक्रमण किया. वे इंडो-यूरोपियन समुदाय की शाखा थे. यह समुदाय यूराल पर्वतमाला के दक्षिणी मैदानों से यूरोप, ईरान और मध्य एशिया पहुँचा. मध्य एशिया से वह अफगानिस्तान और भारत में पहुँचा. ये कबीले विनम्रता से स्वयं को आर्य अथवा श्रेष्ठ ‘नोवलवंस’ कहते थे. यह व्यंग्य मौलिक है. खानाबदोश कबीले जब अपने को श्रेष्ठ कहें, तब कोई कहे कि वे ऐसा विनम्रतावश (मोडिस्टली) कहते थे तो इसे व्यंग्य ही माना जाएगा.

आर्य शब्द में श्रेष्ठता के भाव के साथ नस्ल की धारणा जोड़ते हुए लेखकों ने कहा है—ये आर्य लोग गोरे और ऊँचे कद के थे. नखशिख दुरुस्त था और नासिकाएँ उभरी हुई थीं. इसके बाद आर्यों की व्यंग्यविहीन आलोचना करते हुए ये लेखक कहते हैं : “ये लोग बड़बोले और डींग हाँकनेवाले थे. (दे वेयर पोम्पस एंड बोसफुल) यहाँ की आदिवासी द्रविड़ जनता से वे घृणा करते थे और समझते थे कि इनके साँवले रंग के लिए इन्हें दंड मिलना चाहिए. मानना चाहिए कि अमरीकी गोरों ने काले गुलामों से काम कराया. तो इस प्रथा की शुरुआत हजारों साल पहले भारत में हो गई थी. आर्य लोग अपने घोड़ों और हल्के रथों की गतिशीलता के कारण जीत गए. 

उनके विरोधी भोंडे हाथी (क्लम्जी एलीफेंट्स) लिये उनका मुकाबला कर रहे थे.” (पृ. 13-14) राजा पुरु ने अपने हाथियों से सिकन्दर के घोड़ों का मुकाबला किया था. वह चित्र इन लेखकों ने आर्य-द्रविड़ भिड़न्त कथा पर चिपका दिया है. यद्यपि ये आर्य कबीले घुमन्तू थे, परन्तु इन लेखों के अनुसार, वे अपने गाँवों के आसपास जंगल साफ करके वहाँ जौ की खेती करते थे. (पृ. 13) यह स्पष्ट नहीं है कि जौ की खेती करना वे भारत में आने के पहले सीख चुके थे या यहाँ रहते हुए उन्होंने इस कौशल का विकास किया. सिन्धु घाटी के लोग ईंटों के दुर्ग बनाकर नगरों में रहते थे.

उन्हें आर्यों ने जीता, उनके नगर नष्ट कर दिये और वहाँ के मूल निवासियों को बँधुआ बनाकर रखा, जिनका काम शारीरिक श्रम करना था. बहुत-से लोग मानते हैं कि इस तरह उन्हें हीन स्थान देने के कारण अस्पृश्यता का जन्म हुआ. (पृ. 14) गोरे अमरीकियों ने काले हब्शियों को सिर्फ गुलाम बनाकर रखा, उन्हें अस्पृश्य नहीं माना. यहाँ वे प्राचीन आर्यों से बाजी मार ले गए. आगे बताते हैं, सिन्ध और पंजाब से आर्य लोग उत्तर प्रदेश और बिहार तक पहुँचे. (पृ. 14) ऐसा लगता है कि वे दो रास्तों से एक साथ भारत में प्रवेश कर रहे थे. 

एक रास्ता अफगानिस्तान से था और दूसरा सिन्ध से. आर्य हमलावर एक साथ नहीं, आगे पीछे आए. रामायण के प्रसंग में कहते हैं—माना जाता है कि आर्य आक्रमणकारियों की दूसरी लहर एक हजार ई.पू. के आसपास उत्तर प्रदेश और बिहार तक पहुँची. (पृ. 14) इसके बाद मौलिक स्थापना है. दशरथ के दो रानियों से चार पुत्र थे : ‘दशरथ हैड फोर सन्स फ्रॉम टू वाइव्स’—इनमें राम सबसे बड़े थे और सबसे छोटे का नाम भरत था : ‘द यंगेस्ट सन वाज भरत.’ (उप.) रामायण के बाद महाभारत का उल्लेख है. रामायण के राम और महाभारत के कृष्ण, दोनों अपने साँवले रंग के लिए प्रसिद्ध हैं. लेखकों ने यह नहीं बताया कि आर्यों के इन महाकाव्यों में ये दोनों नायक साँवले रंग के क्यों हैं?

बहुत-से इतिहासकारों की तरह ये लेखक भी मानते हैं कि आर्य ईरान होकर भारत आए. इसलिए उनका सोचना बहुत स्वाभाविक है कि सूर्योपासना की शुरुआत ईरान में हुई थी. जहाँगीर के समय के चित्रों के बारे में लिखा है : “जहाँगीर के चित्रों में पहली बार सिर के चारों ओर प्रभामंडल दिखाया गया है. यह सूर्य का प्रतीक है. और सूर्योपासना के साथ इसका जन्म ईरान में हुआ था.” (पृ. 38) उस समय तक इस्लाम का जन्म न हुआ था. अनेक धर्मों में इस प्रभामंडल को स्वीकार किया गया. उसका इतिहास शिक्षाप्रद है. कहते हैं—बौद्ध धर्म की महायान शाखा के बौद्ध कलाकारों ने बुद्ध के लिए इसका प्रयोग किया. जहाँ अब तुर्की राष्ट्र है, वहाँ पहले रोमन और यूनानी रहते थे. 

ईसाई धर्म के प्रसार के बाद वहाँ बाईजेंटाइन चर्च स्थापित हुआ. उसने यह प्रभामंडल स्वीकार किया. मध्यकाल के ईसाई कलाकारों ने बड़े पैमाने पर इसका व्यवहार किया. आगे बताते हैं—जब यूरोप के चित्र जहाँगीर को भेंट किए गए, तब यह प्रतीक भारत लौट आया और जहाँगीर ने अपने चित्रों में कलाकारों से यह प्रभामंडल बनवाया. (उप.) इस विवरण से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रभामंडल का व्यवहार अनेक धर्मावलम्बियों ने किया. बौद्धों, ईसाइयों और मुसलमानों ने किया. इससे निष्कर्ष यह निकलेगा कि कलाओं के इतिहास में धर्म को आधार नहीं बनाया जा सकता.

रामविलास शर्मा रचनावली खंड-10 से 
अतिथि 

अतिथि से मेरा मतलब उन लोगों से नहीं है, जो बिना तिथि बताए आपके भोजन में शरीक होने के लिए आ जाते हैं. इस तरह का आतिथ्य अब चाय- पानी तक रह गया है, खास कर, इस महँगाई के जमाने में लोग भोजन के लिए पूछते हुए सवाल को मन में दोहरा लेते हैं. अगर आपका जजमान जिसके यहाँ आप अतिथि, यानी मान न मान मैं तेरा मेहमान बने हैं—दम साधकर घबराहट में एक ही साँस में आपसे भोजन के लिए पूछे तो आप उसके शब्दों का उत्तर उनकी ध्वनि में पढ़कर तुरन्त ही नहीं दे देंगे. 

यदि मीठी-मीठी बातें करके वह आपसे भोजन के लिए ऐसे आग्रह करे, जैसे वह आपकी बाट ही जोह रहा था और आप के बिना उसका भोजन विष-तुल्य हो जाएगा, तो आप निश्चय जानिए कि उसने कोई भारी दाव सोच रखा है. आप लेखक हों और मेहमान-नवाज प्रकाशक हो तो समझ लीजिए कि डालडा की पूड़ियाँ और कद्दू की तरकारी खिलाकर वह आपसे मुफ्त लेख लिखाना चाहता है. इस काल के अतिथि-सत्कार से ब्राह्मण सावधान!

मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अतिथि से मेरा मतलब उन लोगों से नहीं है. मेरा मतलब उन लोगों से है जो ‘तिथि’ की तो बात दूर, ‘घड़ी’, ‘पल’, ‘पहर’, ‘घंटा’ का भी ध्यान न रखे हुए एकदम अयाचित आ धमकते हैं. इन सभी शब्दों में ‘अ’ लगाने से इनका नामकरण हो सकता है, लेकिन जब तक ‘अच्छी हिन्दी’ के लेखक इस ओर अपना उत्तरदायित्व नहीं निबाहते, तब तक मैं उन्हें अतिथि ही कहता हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ कि शब्द पर न जाकर आप मेरा मतलब समझ लें.

आप सोचिए, चौबीस घंटों में ऐसा कौन-सा घंटा या मिनट है, जब कभी-न-कभी किसी अतिथि ने आकर आपका काम न रोक दिया हो? वे लोग धन्य हैं, जिन्हें बारह से चार तक, कम-से-कम रात के समय इन मेहमानों से नजात मिली हो.

कॉलेज का अध्यापक अगर लेखक भी हो, तो उसके लिए अतिथि की आवाज यमदूत के सन्देश से कम भयावह नहीं होती. सबेरे चाय पीकर या स्वस्थ मन के हुए तो दूध-बादाम पीकर आप कॉलेज की किताबें लेकर बैठे. दस मिनट के बाद जब अापकी तन्मयता बढ़ रही थी, तभी आ गए अतिथि जी कहेंगे, “आप शायद काम कर रहे थे; मैं थोड़ी ही देर बैठूँगा.” अब आप यह तो कहने से रहे, “नहीं, थोड़ी देर भी न बैठिए.” अरब के तम्बू में पहले ऊँट की गर्दन आई, फिर क्रमश: दस बज गए और आपकी उदासीनता, अँगड़ाइयाँ, इधर-उधर देखना, खामोश रहना—वह सभी कुछ व्यर्थ करते रहे. 


आखिर वे आपकी परेशानी का पूरा मजा लेकर उठे. आपका समय नष्ट करने के लिए खेद प्रकट किया और अन्त में चलने ही लगे कि उन्हें वह असली काम याद आ गया जिसके लिए वह आए थे. आप जल्दी से निपटाने के फिराक में कमरे से बाहर निकले, लेकिन वह सीढ़ी पर एक पैर रखकर फिर जम गए. खैर, दस मिनट के बाद उन्होंने नमस्ते भी किया, लेकिन आपको घूमकर चलने का मौका न देकर उन्होंने अपना ‘पुनश्च’ फिर आरम्भ कर दिया. यहाँ एक-एक क्षण कल्प हो रहा है, यह किसी को क्या मालूम?

भोजन के उपरान्त अखबार पढ़ते-पढ़ते कहीं आप झपकी लेने लगे, तो अतिथि की आवाज ब्रह्मांड पर सोटे की तरह ऐसे गिरती है कि स्वप्न-सत्य सब एक हो जाता है. टारपिडो लगने से जैसे जहाज का मल्लाह चौंक उठता है, वैसे ही कुछ क्षण को तो हृदय-वीणा के तार ऐसे झनझना उठते हैं, जैसे उसकी तूम्बी पर पत्थर पड़े हों!

सौभाग्य से नींद पूरी करके, हाथ-मुँह धोकर, प्रसन्नचित्त आप बहुत दिनों के पत्रों का जवाब लिखने बैठे, तभी यह सोचकर कि यह आपका फुर्सत का समय होगा, अतिथि जी पुन: आ पधारे. कहीं कॉलेज की छुट्टियाँ हुईं, तब तो अतिथि को छूट ही मिल जाती है. आपने बड़ी शिष्टता बरतते हुए किसी काम का जिक्र किया, तो बस, वह बरस पड़े—अजी, अब भी तुम्हें काम है? अब तो छुट्टियाँ हैं, तुम्हें फुरसत ही फुरसत है. और फिर जमे तो बेहोश होकर अंगद का पैर बनकर रह गए.

रात में आप बहुत निश्चिन्त होकर लिखने बैठे. कुछ देर तक कागज खराब करने के बाद जब सुरूर आया, तभी आपके फालतू समय में हिस्सा बटाने के लिए पुन: अतिथि जी आ धमके. क्या करें बेचारे! दिन में आपके मिलने का ठीक नहीं रहता. रात में खुद अपने काम का नुकसान करके आपको कृतार्थ करने आए हैं. उन्हें क्या मालूम, उनके कारण हिन्दी का भंडार कितने रत्नों से वंचित रह जाता है.

कितने ही महाग्रंथों की रचना का विचार इन महापुरुषों का ध्यान आते ही तज देना पड़ता है. कम-से-कम कवि होने का विचार तो छोड़ ही देना पड़ा क्योंकि इन कविता के दुश्मनों का कोई ठिकाना नहीं, कब कल्पना-लोक में वनमानुष बनकर कूद न पड़ें. सम्पादक चिट्‌ठी लिखते हैं, फिर तार भेजते हैं, पत्रों का उत्तर न पानेवाले गालियाँ लिखकर भेजते हैं. समय पर भोजन-स्नान के बदले, आलोचक बनने के अभिशाप स्वरूप, निठल्ले कवियों से कविता और उन्हीं के मुँह उसकी प्रशंसा सुननी पड़ती है. लेकिन इस दर्द को कोई क्या समझे?

अगर इस लेख को मैं अपने कमरे में टाँग दूँ तो क्या आप समझते हैं, उनकी स्थिरता में—अथवा जड़ता में—कोई अन्तर आ जाएगा? वे इस लेख की प्रशंसा करने के बहाने ही जम जाएँगे और फिर तो दस-पाँच मिनट में उठनेवाले कोई और ही होंगे.

रामविलास शर्मा रचनावली खंड-10 से 

सहानुभूति और साहित्य 

हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों में कुछ की यह धारणा रही है कि साहित्यकार के लिए मुख्य वस्तु उसकी सहानुभूति है. उसका सामाजिक दृष्टिकोण क्या है, जनता के प्रति उसकी जिम्मेदारी क्या है, सामाजिक संघर्ष में वह किसका पक्ष लेता है—ये प्रश्न हमें न उठाने चाहिए और साहित्य को इनकी कसौटी पर न परखना चाहिए. ‘साहित्य में संयुक्त मोर्चा’ पुस्तक में श्री अमृतराय ने ‘साहित्य की साहित्यता’ पर अपनी राय जाहिर करते हुए लिखा है : “इसलिए आइए, सबसे पहले हम अपनी अनुभूतियों और भावनाओं के प्रति एकदम सच्चे होकर लिखना यानी साहित्य रचना सीखें, बाकी बातें तो सब धीरे-धीरे प्रयत्न से आ जाएँगी, लेकिन यह बुनियादी बात अगर हाथ से छूट गई या अगर उस पर जरूरी जोर नहीं दिया गया तो समझो कि सब कुछ गया, क्योंकि साहित्य-रचना में लेखक का अपने साहित्य के प्रति दृष्टिकोण ही मुख्य चीज होती है और हम अपने साहित्यकार के अन्दर स्वभावत: उसके अपने साहित्य के प्रति गम्भीरतम दायित्व का बोध जगाना चाहते हैं.”

जहाँ तक अपनी अनुभूतियों और भावनाओं के प्रति सच्चे होने का सवाल है, अज्ञेय, भगवती चरण वर्मा, राजर्षि टंडन—सभी सच्चे हैं. किसी की अनुभूति विकृत वासनाओं तक सीमित है, किसी की साम्प्रदायिकता तथा किसी की भावनाएँ साम्राज्यवादियों को अपना ईमान बेचकर गौरवान्वित होती है, किसी की पूँजीपतियों की चाकरी करके. प्रगतिशील लेखक के लिए सबसे बड़ी और पहली शर्त क्या है? उसके लिए सबसे बड़ी और पहली शर्त यह है कि वह अपने देश की जनता के प्रति सच्चा हो. प्रगतिशील साहित्यकार के लिए कला जनता की सेवा के लिए है, किन्हीं भी अनुभूतियों, किन्हीं भी भावनाओं के प्रति वफादारी दिखाने के लिए नहीं. ऊपर के वाक्य में कहा गया है कि “लेखक का अपने साहित्य के प्रति दृष्टिकोण ही मुख्य चीज होती है.” इसका मतलब हुआ कि जनता के प्रति दृष्टिकोण मुख्य नहीं है, उसका दृष्टिकोण ‘कला जनता के लिए’ उसूल को मारकर न बने बल्कि ‘कला कला के लिए’ उसूल को मानकर बने.

इस अनुभूतिवाद या ‘कला कला के लिए’ के सड़े-गले सिद्धान्त से अज्ञेय के प्रतीक के पन्ने ही नहीं रँगे रहते, अमरीकी सरकार के भेजे हुए युद्ध-प्रचारक भी हिन्दुस्तान में बड़ी सरगर्मी से उसका प्रचार करते हैं. वह लेखक को अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त रहने की सलाह देते हैं, खास कर भारत को साम्राज्यवादी व्यूह से बाहर निकालने की हर कोशिश को वह कम्यूनिस्ट पार्टी की चाल कहकर उसका विरोध करते हैं. इसलिए लेखक की सामाजिक जिम्मेदारी के सवाल को—आज की ठोस परिस्थितियों में एक जनवादी सरकार के लिए लड़ने की जिम्मेदारी के सवाल को—और भी साफ तौर से उठाने की जरूरत है. शब्दों के हेर-फेर से ‘कला कला के लिए’ के सिद्धान्त को लागू करने की कोशिशों का विरोध करना आवश्यक है. प्रगतिशील साहित्य ‘कला जनता के लिए’ के सिद्धान्त को अमल में लाकर आगे बढ़ेगा.

अप्रैल, 1952 की ‘आलोचना’ में श्री देवराज ने लिखा है : “सारांश यह कि प्रगतिवादी उस अच्छे साहित्य को पसन्द करता है जो जनहित का साधक हो. इस मन्तव्य में कोई ऐसी बात नहीं जो किसी निष्पक्ष और समझदार व्यक्ति को अग्राह्य हो.” श्री देवराज के इस कथन का मैं स्वागत करता हूँ. इसके बाद उनकी कुछ शंकाएँ और आक्षेप हैं.

“प्रगतिवाद का अनुरोध है कि साहित्य की विषय-सामग्री सामाजिक जीवन होना चाहिए, वैयक्तिक नहीं; साहित्य में सामाजिक जीवन का चित्र होना चाहिए, अर्थात् व्यक्ति के उस सुख-दु:ख एवं उन भावनाओं का, जिनका मूल सामाजिक व्यवस्था में है.”

व्यक्ति और समाज का झगड़ा तब खड़ा होता है जब दोनों में सामंजस्य नहीं होता. सड़ी-गली समाज-व्यवस्था के खिलाफ व्यक्ति के विद्रोह का सभी स्वागत करेंगे, उसके बहिष्कार का सवाल नहीं उठता. व्यक्तिवाद या व्यक्तिगत भावनाओं को साहित्य में जगह न देने का सवाल तब उठता है, जब वे उस सड़ी-गली समाज-व्यवस्था को कायम रखने में मदद देती हैं.

श्री देवराज ने आगे सवाल किया है : “क्या मन की प्रत्येक अवस्था और साहित्य की प्रत्येक अभिव्यक्ति का सामाजिक हेतु अथवा समकालीन समाज-व्यवस्था से सम्बन्ध होता है? यदि हाँ, तो फिर किसी साहित्य की यह शिकायत करना कि वह सामाजिक नहीं है, गलत है; वह स्वयं अपने सिद्धान्त को खंडन करने के समान है. और यदि कोई साहित्य ऐसा हो सकता है जिसकी समाज-व्यवस्था अथवा सामाजिक परिस्थितियों से आवश्यक लगाव नहीं है, तो यह अनुगत होता है कि सब प्रकार के साहित्य की समाजशास्त्रीय छानबीन सम्भव नहीं है.”

मनुष्य के संस्कार, उसके चित्त की वृत्तियाँ इस भौतिक संसार से ही नियमित होती हैं. उसके विचार और भावनाएँ समकालीन समाज-व्यवस्था और पिछली व्यवस्थाओं से भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती हैं. इसमें सन्देह नहीं कि किसी भी साहित्य की यह शिकायत करना कि वह सामाजिक नहीं है, गलत है. शिकायत इस बात की हो सकती है कि वह समाज-विरोधी है या सामाजिक विकास में बाधक होता है. साहित्य पढ़ने से मनुष्य पर कैसा प्रभाव पड़ता है, उसके संस्कार उसे किस दिशा में ले जाएँगे—यह सवाल हम हर तरह के
 साहित्य से कर सकते हैं. यह सवाल न करना साहित्य की रूपवादी (फॉर्मलिस्ट) आलोचना करना है. साथ ही हम उसके कलात्मक सौन्दर्य को भी परखते हैं और यह सौन्दर्य उसके विचारों की गहराई, उसकी मानवीय सहानुभूति पर निर्भर रहता है.

जुलाई, 1952 की ‘आलोचना’ में सम्पादक ने मेरे एक निबन्ध से यह वाक्य उद्धृत किया है : “प्रगतिशील साहित्य से मतलब उस साहित्य से है जो समाज को आगे बढ़ाता है, मनुष्य के विकास में सहायक होता है.” इस धारणा को ‘दक्षिणपंथी दौर में समाजशास्त्रीय दृष्टि से’ की हुई व्याख्या बतलाया है. मेरे अन्य लेख से “प्रगतिशील साहित्य भारतीय जनता की सांस्कृतिक विरासत का ऐतिहासिक विकास है”, “प्रगतिशील साहित्य स्वाधीनता, शान्ति और जनतंत्र का साहित्य है”, आदि धारणाओं को उन्होंने संकुचित बतलाया है.

अगर प्रगतिशील साहित्य समाज को आगे बढ़ाता है, मनुष्य के विकास में सहायक होता है, तो यह सवाल करना अप्रासंगिक न होगा कि आज की परिस्थितियों में किस तरह का साहित्य समाज को आगे बढ़ाएगा और मनुष्य के विकास में सहायक होगा. क्या ऐसा साहित्य जो हमारी सांस्कृतिक विरासत से नाता तोड़ ले या आँख मूँदकर उसी के पीछे चलता रहे, जो शान्ति, स्वाधीनता और जनतंत्र का साहित्य न हो, समाज को आगे बढ़ा सकता है, मनुष्य के विकास में सहायक हो सकता है? ‘आलोचना’ के सम्पादक ऐसे साहित्य की तलाश में हैं जो शुद्ध 
सौन्दर्यवादी नियमों के अनुसार रचा जाता हो; जो शान्ति, स्वाधीनता और जनतंत्र के सामयिक झंझटों में न पड़े, साथ ही जो ‘प्रगतिशील’ भी हो! ऐसे साहित्य का मंत्र मेरे पास तो है ही नहीं, शायद ‘आलोचना’ के सम्पादक के पास भी नहीं है. भारत और विदेश के किसी विद्वान् के पास नहीं है. आज ही नहीं है और आज से पहले भी नहीं रहा. इसीलिए वह कुछ खिन्न होकर लिखते हैं : “काव्यशास्त्र या Aesthetics क्षेत्र के अरस्तू, भरत मुनि आदि जैसी किसी युग-प्रवर्तक प्रतिभा की अभी प्रतीक्षा है, जो ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि से अपने में सम्पूर्ण एक वैज्ञानिक सौन्दर्य सिद्धान्त की प्रतिष्ठा कर सके.”

आशा है कि बन्द होने से पहले ‘आलोचना’ इस प्रतिभा को जन्म दे जाएगी जिसके लिए देश-विदेश के और आनेवाले युगों के तमाम साहित्यकार उसका अहसान मानेंगे.

रामविलास शर्मा रचनावली खंड-12 से 

शास्त्र और समाज 

पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘विचार और वितर्क’ में वर्तमान समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शास्त्र को उसके अनुकूल बनाने की चेष्टा की है. हमें देखना है कि वर्तमान समाज की ये आवश्यकताएँ क्या हैं और शास्त्र कहाँ तक उनके अनुकूल हो सकता है.

‘विचार और वितर्क’ में एक तरह के लेख मध्यकाल और वैष्णव कवियों के ऊपर हैं, दूसरी तरह के लेख कुछ आधुनिक कवियों और लेखकों पर और कुछ संस्कृत साहित्य पर हैं. तीसरी तरह के चिन्तनपूर्ण लेख अपने ढंग के निराले हैं. जैसे ‘जब कि दिमाग खाली हो और दिल भरा हो’. आधुनिक साहित्यकारों में प्रसाद जी,आचार्य द्विवेदी, प्रेमचन्द आ जाते हैं. चिन्तनशील लेखों में काल्पनिक चित्रों की बहुतायत है और इन्हीं के द्वारा लेखक अपनी बात समझाता है. कुल मिलाकर यह संग्रह जैसा विचारोत्तेजक है, वैसा ही वैचित्र्यपूर्ण और सरस भी है. इसमें कुछ निबन्ध श्री व्योमकेश शास्त्री के हैं लेकिन वे कौन-से हैं, इसका उल्लेख नहीं किया गया.

हिन्दी के आलोचना-साहित्य से जिन पाठकों का थोड़ा भी परिचय है, वे जानते हैं कि द्विवेदी जी मध्यकालीन वैष्णव कवियों के परम भक्त हैं. उनकी रचनाओं से यह स्पष्ट है कि उनके मध्यकालीन साहित्य के आकर्षण का कारण आध्यात्मिक न होकर सामाजिक है. इन्हीं वैष्णव कवियों ने शास्त्रसम्मत समाज-व्यवस्था को धक्का देकर मनुष्यमात्र की महत्ता की घोषणा की थी. द्विवेदी जी ने इस तथ्य का यथेष्ट निर्लिप्त भाव से विवेचन किया है. उनके चिन्तन को देखते हुए यह मानना पड़ता है कि उनका मानसिक विकास शास्त्र और प्राचीन रूढ़ियों की चहारदीवारी को तोड़ता हुआ नवीन समाज-हितकर लक्ष्य की ओर बढ़ता गया है. इसीलिए जिन लेखों में भक्तिपूर्ण भावुकता अधिक है, उनके बारे में सन्देह होने लगता है कि ये व्योमकेश शास्त्री के तो नहीं हैं?

‘हिन्दी का भक्त साहित्य’ नाम के निबन्ध में द्विवेदी जी ने मध्यकालीन समाज-व्यवस्था का उल्लेख किया है. इस व्यवस्था में यह गुण था कि वह अपनी चीजों को बाहर फेंक सकती थी लेकिन बाहर की चीज को अपने अन्दर समेट न सकती थी. इस तरह समाज के बहिष्कृत लोगों द्वारा नई-नई जातियाँ बनती जाती थीं; लेकिन, ‘अब सामने एक सुसंगठित समाज था जो प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक जाति को अपने अन्दर समान आसन देने की प्रतिज्ञा कर चुका था. एक बार कोई भी व्यक्ति उसके विशेष धर्ममत को यदि स्वीकार कर ले तो इस्लाम समस्त भेद-भाव को भूल जाता था. वह राजा से रंक और ब्राह्मण से चंडाल तक सबको धर्मोपासना का समान अधिकार देने को राजी था. समाज का दंडित व्यक्ति अब असहाय न था. इच्छा करते ही वह एक सुसंगठित समाज का सहारा पा सकता था.’ इस भूमिका के साथ वैष्णव कवियों के साहित्य का अध्ययन करने की जरूरत है. हिन्दी के अधिकांश आलोचक मुस्लिम समाज के उस एक रूप को भूल जाते हैं जो जनतांत्रिक भी था. 

गोस्वामी तुलसीदास और अन्य भक्त कवियों का महत्त्व घोषित करते हुए वे कहते हैं कि इन्होंने इस्लाम के आक्रमण से हिन्दू समाज की रक्षा की. शास्त्रों की निरंकुशता और उनके एकच्छत्र शासन को चुनौती देकर हिन्दू समाज में जनवादी भावनाएँ फैलाकर उन्होंने उसकी रक्षा की. परन्तु इन आलोचकों के विचार से भक्त कवियों ने उसी प्राचीन समाज-व्यवस्था की रक्षा की, जो भीतर से खोखली होने के ही कारण अब ज्यादा दिनों तक जीवित न रह सकती थी. आज के विषम वातावरण में अपने ‘विरोधियों’ की उन बातों को हम स्वीकार नहीं करना चाहते जिनसे हमारा हित भी हो सकता है. अपने भक्त कवियों को धर्म का ऐसा कवच पहनाकर खड़ा करते हैं, मानो उनका आविर्भाव धार्मिक विद्वेष बढ़ाने के लिए ही हुआ हो! मानो हिन्दू समाज में ऐसे अवगुण न रहे हों जिन्हें दूर करना ज्यादा आवश्यक था! मानो इन संत कवियों में हिन्दू और मुसलमान, दोनों ही न रहे हों! जिन मुसलमान संतों ने हिन्दू संतों के स्वर में स्वर मिलाकर बानी कही है, उनके लिए तो हम यह समझ लेते हैं कि ये तो नाम के मुसलमान हैं, काम तो सब हिन्दुओं के हैं. शायद बहुत-से धार्मिक पाठकों के कोमल हृदय को यह पढ़कर धक्का लगेगा कि प्रसिद्ध संत दादू का वास्तविक नाम दाऊद था.

रामविलास शर्मा रचनावली खंड-14 से 

मुख्य अन्तर्विरोध साम्राज्यवाद और भारतीय जनता के बीच है 

[विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से बातचीत] 

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : डॉक्टर साहब, मुझे आपसे बातचीत करते हुए बड़ी खुशी हो रही है. आपने हिन्दी साहित्य का गम्भीरता से अध्ययन किया है. हिन्दी के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों—तुलसी, भारतेन्दु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला, प्रेमचन्द, आचार्य शुक्ल—पर आपने बहुत गम्भीर कार्य किया है. मार्क्सवाद में आपकी दृढ़ आस्था है. जाहिर है कि मैंने जिन साहित्यकारों के नाम लिये, उनमें से कोई मार्क्सवादी नहीं है, तो इनके बारे में लिखने की प्रेरणा आपमें क्यों और कैसे हुई? 

रामविलास शर्मा : मार्क्सवाद के बारे में लोगों में एक बड़ी भ्रांति है. लोग यह समझते हैं कि मार्क्स के पहले जो कुछ लिखा गया, उसका निषेध है मार्क्सवाद. ऐसा नहीं है, बल्कि मार्क्स के पहले जो कुछ लिखा गया, उसका विकास है मार्क्सवाद. सच्चा मार्क्सवादी वह है जो अपनी सांस्कृतिक विरासत पहचानता है—चाहे अपनी भाषा की हो, चाहे दूसरे की भाषा की हो. स्वाभाविक है कि शुरुआत अपनी भाषा से ही करेंगे. मार्क्सवाद का विकास ही इस ढंग से हुआ है कि पहले का जो ज्ञान है, उसको आत्मसात् करके मार्क्स ने कुछ निष्कर्ष निकाले और कुछ सिद्धान्त रचे, और उसके आधार पर आगे बढ़ें. मैं अपने मित्रों से कभी-कभी मजाक में कहा करता हूँ कि ‘पूँजी’ के प्रथम खंड में तुम उनकी पाद-टिप्पणियाँ देखो, और यह देखो कि उन्होंने किन लोगों को अधिकारी मानकर उद्धृत किया है. 

दो तरह के विद्वान हैं—एक, जिनका उन्होंने खंडन किया है; दूसरे, जिनको उन्होंने अधिकारी माना है. और अधिकारी मानने के साथ-साथ कहीं-कहीं कुछ लोगों की बहुत प्रशंसा की है. और ये सब मार्क्सवाद के पहले के हैं. यह जो मेरी पुस्तक है : ‘मार्क्स और पिछड़ा हुआ समाज’, इसमें जो पहला लेख है, उसमें मैंने यही प्रश्न रखा है कि मार्क्स औद्योगिक क्रान्ति से पहले के समाज को पिछड़ा हुआ मानते हैं. वैज्ञानिक भौतिकवाद, स्वाभाविक है कि, औद्योगिक समाजों के बारे में सोचता है; जो आज के संघर्ष हैं, उनसे निकलने का रास्ता दिखाता है. क्या कारण है कि मार्क्स पर जिस संस्कृति का प्रभाव पड़ा है, वे सब औद्योगिक क्रान्ति से पहले की हैं? उस प्रभाव के क्रम को मार्क्स ने आगे बढ़ाया है यानी हमारी समझ से मानव संस्कृति का जो विकास है, यदि मार्क्सवाद को सही ढंग से कोई आदमी समझे तो उसी रास्ते पर आगे बढ़ेगा. मार्क्सवाद उसका निषेध नहीं है, उसका अगला विकास है.

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : डॉक्टर साहब, आज की स्थिति से आप वाकिफ हैं. हम विशेष रूप से इस सन्दर्भ में कहना चाहते हैं, खास तौर पर नये आलोचकों, यानी अपनी पीढ़ी के आलोचकों के बारे में. उनमें इतनी ‘हाई लाइकिंग’ दिखाई पड़ती है कि वे किसी भी रचनाकार पर विचार करने के पहले यह देखते हैं कि वह रचनाकार मार्क्सवादी है या नहीं; अर्थात् उनकी पार्टी का सदस्य है या नहीं. पार्टी-कमिटमेंट के बारे में काफी विचार हो चुका है, फिर भी इस सम्बन्ध में मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ. 

रामविलास शर्मा : यह इस बात पर निर्भर है कि आप किस तरह की पार्टी की बात करते हैं और किस तरह की पार्टी के सदस्य हैं. मान लीजिए, एक आदमी मजदूर सभा में काम करता है और वह किसी कम्यूनिस्ट पार्टी का सदस्य नहीं है. अब अगर किसी अनुशासन के अन्दर वह काम नहीं करेगा, अराजक ढंग से काम करेगा, तो जितनी यूनियनें हैं, सब अलग-अलग ढंग से काम करेंगी और मजदूरों को साथ लिये बिना ट्रेड यूनियन काम कर नहीं सकती. अब आप लेखकों की स्थिति पर विचार कीजिए. मैं अपने मित्रों से कभी-कभी कहा करता हूँ कि मान लो, प्रेमचन्द साहित्य में संयुक्त मोर्चा बनाते और जितने उस समय के लेखक थे, उनको समझाते कि जैसा मैं लिख रहा हूँ, वैसा तुम्हें लिखना चाहिए, तो उनका कितना समय नष्ट होता. और मान लीजिए कि प्रेमचन्द के समकालीन जितने लेखक हैं, वे सब दूसरी धारा के हैं और प्रेमचन्द अकेले एक तरफ हैं, तो सवाल यह है कि मुझे किसका समर्थन करना चाहिए? तो मैं तो प्रेमचन्द का समर्थन करूँगा. साहित्य में और ट्रेड यूनियन में यह फर्क है कि वहाँ आप समूह के बिना आगे नहीं बढ़ सकते और उसकी अपनी उपयोगिता है. साहित्य में आपकी जवाबदेही व्यक्तिगत है और आपकी जवाबदेही अपनी पीढ़ी के प्रति ही नहीं, आनेवाली पीढ़ी के प्रति भी है. 

एक लेख में मैंने यह लिखा था कि मैं तो पार्टी के साथ यह सम्बन्ध चाहूँगा कि पार्टी को मेरी आलोचना करने की स्वाधीनता हो और मुझे भी पार्टी की आलोचना करने की स्वाधीनता हो. मैंने केवल यह लिखा ही नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में भी चरितार्थ किया. मैं पार्टी का नियमित सदस्य नहीं, लेकिन पार्टी के लोगों से मेरे बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं और कई पार्टियों के लोगों से हैं. मेरा कहना है कि व्यापक दृष्टि से यदि आप विचार करें तो पार्टी होती किसलिए है? मान लीजिए, मजदूर वर्ग की पार्टी है तो पार्टी मजदूर वर्ग के लिए है, मजदूर वर्ग पार्टी के लिए
 नहीं. इसलिए पहली प्रतिबद्धता आदमी की मजदूर वर्ग के प्रति है. स्तालिन के बाद मालेनकोव वहाँ के महासचिव हुए थे. मालेनकोव ने अपने एक भाषण में कहा था—सोवियत संघ के कम्यूनिस्टों का यह आदर्श होना चाहिए कि उनकी पहली प्रतिबद्धता मजदूर वर्ग के प्रति हो. और एक दूसरी घटना आपको बताता हूँ—शोलोखोव जो प्रसिद्ध लेखक हैं, वे सोवियत संघ के राष्ट्रपति कालिनिन से मिलने गए थे और कालिनिन ने उनसे पूछा कि “आजकल क्या लिख रहे हैं? लोग तो कहते होंगे कि जल्दी से उपन्यास खत्म करें.” 

इस पर शोलोखोव जोर से हँसे. उन्होंने कहा, “मैं तो अपना उपन्यास बहुत धीरे-धीरे लिखता हूँ. लिख लेता हूँ, फिर गाँव वालों को सुनाता हूँ और इसमें बहुत समय लगता है.” तो कालिनिन ने उनसे कहा था कि “तुम्हें लिखते समय केवल हम लोगों का ध्यान नहीं रखना है. आगे आनेवाली पीढ़ी यह नहीं कहेगी कि तुमने कालिनिन के कहने पर ऐसा लिखा है, इसलिए कालिनिन दोषी है, बल्कि वह यह कहेगी कि शोलोखोव ने ऐसा कैसे लिखा. तो तुमको यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि तुम आज की पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि कल की पीढ़ी के
 लिए भी लिख रहे हो.”

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : लेकिन डॉक्टर साहब, क्या इतनी छूट है उस व्यवस्था में कि लेखक विरोध कर सकता है? 

रामविलास शर्मा : इसके तो बहुत-से उदाहरण हैं. लेकिन भारत के बारे में बात करें, और आपने समकालीन लेखकों की बात उठाई है. मेरी सीमा यह है कि मैं इधर समकालीन साहित्य पढ़ नहीं रहा हूँ. इसकी बहुत शिकायत भी सुनता हूँ. लेकिन सिद्धान्तत: मैं यह बात मानता हूँ कि चूँकि मार्क्सवाद एक विकासमान विचारधारा है और चूँकि मार्क्सवाद के अनुसार मनुष्य यथार्थ को समग्रता में ग्रहण नहीं करता है, उसे सापेक्ष रूप में ग्रहण करता है, बराबर समझने की कोशिश करता है और मार्क्सवाद बदलने का दर्शन है, इसलिए यह बदलने-समझने की
प्रक्रिया बराबर चला करती है. अगर कोई यह बात नहीं समझता है, यह नहीं समझता है कि मार्क्स एवं एंगेल्स की विचारधारा का स्वयं विकास हुआ है, तो वह कच्चे किस्म का मार्क्सवादी है. तो यह समझकर ही बहस चलानी चाहिए और एक-दूसरे की आलोचना करनी चाहिए.
 

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