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स्त्री आंदोलन रक्त नहीं, संवाद का वाहकः कवयित्री अनामिका से खास बातचीत

हिंदी कविता में पहली बार किसी स्त्री को साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत किए जाने को जब एक ऐतिहासिक घटना की तरह रेखांकित किया जा रहा है, तब साहित्य आजतक पर पढ़िए उनसे हुई खास बातचीत.

कवयित्री अनामिका कवयित्री अनामिका

हिंदी की सुपरिचित कवयित्री कथाकार अनामिका को पिछले दिनों साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई, तो कविता प्रेमियों व स्त्री कवियों में उत्साह की लहर दौड़ गयी. गए साढ़े चार दशकों से लेखन में सक्रिय अनामिका ने यों तो 14 वर्ष की उम्र में ही काव्याभ्यास आरंभ कर दिया था तथापि कविता के प्रति यह अनुरक्ति धीरे-धीरे प्रबल होती गयी. पिता की लाइब्रेरी की पुस्तकों की संगति में यह प्रेम और परवान चढ़ा. उन्नीस की उम्र तक दो संग्रह छप चुके थे. उसके बाद दिल्ली पहुंच कर अध्ययन के साथ लेखन जैसे नियमित अभ्यास में जुड़ गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि लगातार पुस्तकें आती रहीं. पश्चिम के स्त्री-विमर्श ने भी अनामिका को भारतीय स्त्री को परखने की दृष्टि दी. कविताओं में यह स्त्री अपनी पूरी स्थानीयता के साथ आई और अनामिका ने स्त्री के ताप, संताप, सुख, दुख, हास-उल्लास, हताशा और अभिलाषा को एक नए अंदाज में रचा.

अनामिका की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि हम उस जगह, उस देश-काल और उस समाज से जुड़ गए हैं जिसकी कथा ये कविताएं कह रही हैं. बोल-बतकहियों में गंभीर से गंभीर बात कैसे कही जाती है, अनामिका ने इसे सलीके से साधा है. कविता के साथ अनामिका ने कथालेखन में भी पदार्पण किया. कई उपन्यास आए. उनके नायक समाज के लिए कुछ कर गुजरने वाले संघर्षशील और अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाले थे. अनामिका का स्त्री विमर्श गांधी की चिंतनभूमि से प्रेरणा पाता है. गांधी जैसे हिंदू धर्म का अंत तक प्रक्षालन करते रहे. हिंदू सभ्यता के मटमैलेपन को अंत तक धोते पखारते रहे, अनामिका यही काम पुरुष समाज को लेकर करती रहीं. वे स्त्री की पीड़ा का भाष्य  रचते हुए भी स्त्री-पुरुष के सहकार की कामना से भरी रहीं. इसलिए उनका स्त्री विमर्श प्रचलित स्त्री विमर्श की अवधारणा से दूर छिटका हुआ पर समावेशी है. वह पुरुष-विद्वेष या पितृसत्ता के प्रति अमर्ष से भरा हुआ नहीं है- वह पौरुषेय सत्ता से सहयोग की अभिलाषा रखता हुआ एक समृद्ध स्त्री पुरुष समाज की कल्पना से आशान्वित है.  इस बातचीत में इसी आशा और उम्मीद से भर कर वे कहती हैं: मेरी कविता सहकारिता का वृंदगान है.  

हिंदी कविता में पहली बार किसी स्त्री को साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत किए जाने को जब एक ऐतिहासिक घटना की तरह रेखांकित किया जा रहा है, तब साहित्य आजतक के लिए हिंदी के सुपरिचित लेखक डॉ ओम निश्चल ने उनसे बातचीत की.

-विनोबा भावे ने कहा है कि पुरस्कार टपका हुआ फल है. किसी भाग्यशाली की गोद में यह आ गिरता है. जब कि आप अपने लेखन के उस मोड़ पर हैं, जहां पहुंच कर यह आश्वस्ति होती है कि न केवल कविता, बल्कि किस्सागोई व स्त्री विमर्श की दिशा में आपने काबिलेगौर भूमिका अदा की है, यह पुरस्कार पाकर कैसी अनुभूति होती है?
*बहुत सटीक दृष्टांतों से बात करते हैं विनोबा जी. पुरस्कार संयोग-शासित होते ही हैं. मेरे पिता आस्तिक थे, उन्होंने इस विषय में अपने महाकाव्य 'इड़ा गायत्री' में लिखा है--
''क्या पुरस्कार, क्या तिरस्कार!
दोनों ही माता के दुलार
दो चार बढ़ाते आलोचक
दो-चार बनाते समाचार! ''
पुरस्कार पाकर ऐसा ही लगता है जैसे मैथिल लोकगीत में बालिका वधू को, जो अचानक दरवाजे पर गाजा-बाजा देख कर चौंक जाती है:
सूतल छलियई बाबा के भवनवा
अचके में आयल कहार.
एकांत श्रम का गर्भ गृह किसी भी व्यक्ति के लिए 'बाबा का भवनवा' ही है.

- हमारे यहां कहा गया है, बाढ़ैं पुत्र पिता के धरमे. खेती उपजै अपने करमे. पर आप तो स्त्री होकर अपने मां-पिता की संयुक्त तपस्या का प्रतिफल हैं, जिनकी प्रतिश्रुतियों का फल आपके सम्मुख है. क्या सोचती है आप इस बारे में?
*जी वे मुझे 'दादी मॉं' बुलाते थे और बचपन से मुझमें अहसास भरते थे अनामा शक्ति की तरह. जिस अनामा शक्ति पर मेरा नाम पड़ा. मैं अखिल ब्रह्मांड की मॉं हूँ, जैसे कि हर औरत होती है और हर संवेदनशील पुरुष. माता-पिता खुद भी ऐसे ही थे.

- कहते हैं पटना के बाद मुजफ्फरपुर की अपनी पुख्‍ता साहित्यिक पृष्ठभूमि रही है. अनेक बड़े साहित्यकारों का गढ़ रहा है वह. मुजफ्फरपुर की चर्चा चलने पर क्या कुछ याद आता है?
*पूरा शहर एक संयुक्त परिवार था. दिन भर जानकीवल्लभ शास्त्री, मदन वात्स्‍यायन, राजेंद्र प्रसाद सिंह जैसे लेखक, सीताराम हरिराम दांडेकर जैसे संगीतकार, कुमार प्रशांत के माता-पिता जैसे चित्रकार और रामदास जैसे मूर्तिकार, सुहृद संघ जैसी संस्थाएं, नारायणी प्रेस जैसा प्राचीन प्रेस, गणिकाओं का प्राचीन मुहल्ला, पूरा विश्वविद्यालय, दाता कम्बलशाह की मजार- सब इस शहर के नैतिक भूगोल में शामिल थे.

- आपकी वार्ताओं को सुनकर आपके व्यापक पठन-पाठन की एक छवि उभरती है. कैसी थी यह अध्यवसायिता? पाठ्यक्रमों के अलावा क्या कुछ अध्ययन अनुशीलन में जुडता रहा?
*उस समय अंगरेजी विश्व साहित्य तक पहुंचने का सबसे आसान सेतु थी. विश्व साहित्य का चस्का मुझको पिता-माता की विशाल लाइब्रेरी में लग चुका था. वे ये चाहते थे कि विश्व साहित्य की श्रेष्ठ रचनाएं मैं हिंदी में लाऊँ और हिंदी में श्रेष्ठ रचनाएं अंगरेजी में. अब जाकर यह स्वप्न पूरा करने की स्थिति आई है- 'पश्यंती' नामक द्विभाषिक वेब जर्नल तैयार है इसके लिए. मुझे मेरी मातृभाषा ने दूध पिलाया था, अंग्रेजी मुझे थर्मस में थमाई गई थी- ऐंग्लो इंडियन शिक्षकों के खोले सेंट फ्रांसिस जेवियर्स अकादमी भेज कर. स्कूल में अंग्रेजी बोलनी-लिखनी होती थी पर परिवेश की भाषा तो हिंदी ही थी और जिनसे मैं हृदय की बात कहना चाहती थी- वे सब हिंदी ही लिखते-बोलते थे.

- बचपन या कैशोर्य के दिनों में इस क्षेत्र में कौन से लोग रोलमाडल रहे?
* रोल मॉडल तो हजारीप्रसाद द्विवेदी और निराला ही थे जो पिताजी को बहुत मानते भी थे. द्विवेदी जी ने मेरा नाम 'प्रज्ञा पारमिता' रखा था, पर पिता जी ने निराला जी के संग्रह वाला नाम (अनामिका) हटाया नहीं और बाद में छोटी मौसी के जो बेटी हुई उसका नाम रखा 'प्रज्ञा पारमिता'.

- परिवार में किन लेखकों-कवियों की आवाजाही रहती थी. उनसे क्या कुछ सीखने को मिलता था?
*हजारीप्रसाद द्विवेदी, दिनकर और केदारनाथ सिंह से घरेलू रिश्ते थे. इनके अलावा हिंदी, अंगरेजी, संस्कृत और उर्दू विभागों के कुछ उद्भट विद्वानों की गोष्ठी भी लगातार होती थी. कभी घर पर कभी बाहर. कूपहिं में यहॉं भंग परयो है' की स्थिति थी. हवा में पराग था पूरा विश्वविद्यालय का आंगन.

- आपने युद्धोत्तर अमरीकी स्त्री कविता में प्रेम और मृत्यु विषय पर भी शोध किया है. इस काव्य की क्या विशेषताएं आपकी प्रतीत होती हैं?
*प्रेम और मृत्यु मनुष्य की मूल संवेदनाएं हैं, जैसे निवेश और उन्मेष प्रकृति की. युद्धोत्तर पश्चिम कविता में मृत्यु की चिरायँध गंध ऐसी परिव्याप्त थी कि बहुत दिनों तक कोई प्रेम कविता लिखी ही न गई है. 'लव सांग ऑफ जे एल्फ्रेड प्रूफॉर्क' भी प्रेम नहीं, प्रेम के योग्य नहीं रह जाने की की चिंता का आख्यान है. पर यही दौर था जब स्त्री कवियों ने प्रेम कविताएं लिखीं और यहीं प्रेम कविताओं की संरचना बदली- वह प्रेम की पात्रता से नीचे गिर गए हिंसक युयुत्सु मनुष्य को नए ढब में ढालने की चिंता से लहालोट कविता थी- वहॉं बल रूप-निरूपण पर नहीं था, आंतरिकता पर था. उपमान भी आकाशी नहीं थे, कॉस्मिक की चूल कॉमन प्लेरट से मिलाई गई थी, पर्सनल की पोलिटिकल से. तो फलक और भाषा- दोनों बहुआयामी और परतदार हो चले थे.

-सबसे पहले आलोचना-समीक्षा में प्रवृत्त हुईं कि कविता में?
*पिता जी से समस्यापूर्ति आदि के खेल-खेलते हुए जिस उम्र में कविता फूटी थी, उस उम्र में 'समीक्षा' का 'स' भी नहीं समझती थी.

-'गलत पते की चिट्ठी' से आपके काव्य-लेखन की शुरुआत हुई. कविता में आपका यह पहला कदम कितना ध्यानाकर्षी रहा?
*'गलत पते की चिट्ठी' भी तो नहीं पहुंचती है. जिसके पास पहुंचती है वह संवेदनशील हो तो पहुंचने का मर्म सिद्ध हो जाता है. कादंबिनी, पराग, आर्यावर्त और 'इंडियन नेशन' में अच्छी समीक्षाएं आई थीं. गुरुजनों का स्नेह मिला था.

-आपके कविता संकलनों के शीर्षक खास हैं. बीजाक्षर, अनुष्टुप, खुरदुरी हथेलियां, दूब-धान, टोकरी में दिगन्त, पानी को सब याद था आदि. शीर्षकों के निर्धारण में आप क्या कुछ सोचती हैं?
* हर कालखंड की एक रचना का कोई एक बीज शब्द ढूंढा जा सकता है-शीर्षकों में इसकी आहट चाहे- न - चाहे आ ही जाती है.

-जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो- कभी पत्रकारिता के बारे में यह कहा जाता था. कविता किसलिए? कभी इस बारे में विचार किया? कहा गया है बही लिख-लिख के क्या होगा वही किस्सा पुराना है. फिर भी कविता लिखती हैं तो इसके पीछे क्या वजह रही है?
*शब्दों के बीच का अनंत आकाश- उसमें पंख खोल उड़ते हुए अक्षरों की अशेष ध्वनियां- कविता इनके प्रति प्राणपन से सजग करती है और इसी ध्वन्यालोक में जीवन की विडंबनाएं एक कौंध में खुल जाती हैं.

- 'टोकरी में दिगंत- थेरीगाथा 2014' लिखने के पीछे क्या वजह रही. बुद्धकालीन थेरियों के अंतर्जगत में प्रवेश कर कविता उगाहना लगभग मिथकों के स्रोत से काव्य आयत्त करने जैसा ही है. इसे रचने के पीछे क्या  कुछ आपके मन में उमड़ता घुमड़ता रहा है?
* कुछ दुख सनातन हैं. उनकी सनातन उपस्थिति की चेतना हममें सिद्धार्थ की विकलता जगाती है. पर बुद्ध हम तभी होते हैं जब यह बात चित्त में बैठ जाए कि कोई किसी का स्वामी नहीं है, मनुष्य अपना स्वामी स्वयं है, स्वामित्व साधना है तो स्वयं पर ही साधना है. भीतर एक परिवर्तन घटित हो तो बाहर दस परिवर्तन घटित होंगे.
ठीक से देखिए तो बुद्धत्व‍ के बीज सब में हैं. यह संग्रह आधुनिक थेरियों की काल्पनिक संवाद श्रृंखला है- हिंसक से हिंसक व्यक्ति के भीतर छिपे बैठे बुद्ध से.  

- कहा जाता है आम्रपाली व अन्य स्त्रियों को संघ में प्रवेश देने के कारण ही बौद्ध धर्म पतन का शिकार हुआ. आप इस बारे में क्या सोचती हैं?
* जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि दुनिया पर नियंत्रण कायम करने के ख्वाब वही बुनता है जिसका स्वयं पर नियंत्रण न हो और स्त्री की उपस्थिति को पतन का द्वार भी वही मानता है. वस्तु स्थिति तो यही है कि आंख बंद करके कोई पुरुष सोचे तो साफ महूसस करेगा कि दुनिया के बेहतरीन क्षण वही थे जो किसी स्त्री के सान्निध्य में बीते. पर अफसोस की बात यह कि इसका विलोम सच नहीं. यानी- स्त्रियां यह दावा नहीं कर सकतीं कि उनके सबसे मधुर क्षण पुरुष-संगति में बीते.

-आपकी कविताएं जहां तक मैं देखता हूँ, सभी वर्ग की स्त्रियों के बीच पहुंचती हैं. उनके जीवन-संसार को अपने स्थापत्य में ले आती हैं. स्त्री-असमानता को बारीकी से चिह्नित करती हैं. दुनिया भर में स्त्री की जो स्थिति है, उसकी तुलना में आज भारतीय स्त्री कहां खड़ी है?
* भारतीय स्त्री की मुश्किल यही है कि उसे जिससे संवेदित करना है, वह पुरुष स्व‍यं भी पूरी तरह मजबूत नहीं- कितनों के पास नौकरी तक नहीं, कोई जातीय उत्पीड़न से परेशान है, किसी के पास रोटी-कपड़ा-मकान और सुशिक्षा तक की व्यवस्था नहीं है. अब क्‍या खाकर उससे वह बराबरी में लड़े! पिटती हुई औरत को भी कमजोर पति पर तरस आ जाता है, पर इसका नतीजा पुरुष स्वा‍भिमान के लिए अच्छा नहीं माना जाएगा. जिसे रोज माफ करना पड़े, उसे कोई शिक्षादीप्त ध्रुवस्वामिनी अपनी टक्कर का पुरुष कैसे माने? तो अकेलापन दोनों तरफ बढ़ रहा है जो किसी के लिए अच्छा नहीं- संवाद की स्थिति तो आनी ही होगी, इसीलिए विमर्श है.
भारतीय स्त्रीवाद की दूसरी खूबी है सामूहिक मातृत्व और दृष्टि का मातृत्व जो पुरुष देह में भी सध सकता है. हमारी जातीय स्मृतियों ने प्रमुख पुरुष गढंतों- शिव और कृष्ण में दृष्टि का यह मातृत्व, यह 'अर्धनारीश्वर' वाला आदर्श सधा भी है. तभी स्त्री भक्त कवियों में इनमें अपने मनचीते पुरुष का ब्लूप्रिंट दिखा.
सब प्राचीन सभ्यताओं की जातीय स्मृतियॉं गहन हैं, और उनसे अंत:पाठीय संवाद साधे बिना हम स्त्री दृष्टि का यह मॉडल साध भी नहीं सकते. अश्वेत, रेड इंडियन माओरी जनजातियों, लातिन अमरीका और आस्ट्रेलिया की अन्य जनजातियॉं इस गहनतर उत्तर-औपनिवेशकता का मर्म समझती हैं.

- सदियों से सामंती आदतों में ढला पुरुष समाज स्त्रियों की राह में रोड़ा बनता आया है. उसके अधिकारों को लेकर सजगता भले ही बाद के वर्षों में आई हो पर आज भी सर्वाधिक हिंसा औरतों पर होती है. वैश्विक स्त्रीवाद के संदर्भों को आप किस रूप में देखती हैं ?
* कोई भी पुरानी संस्कृ्ति पुरातन नदी की तरह होती है, रास्ते में बहुतेरी अशुद्धियां घुल ही जाती हैं. पानी डिस्टिल करने की जरूरत है, नदी सुखाने की नहीं, क्योंकि यही हमारी पहचान है. और सिर्फ भारतीय स्त्रियों ने 'सविनय अवज्ञा' का मॉडेल अपनाया हो, ऐसा नहीं है. विश्व भर में स्त्री आंदोलन ही इकलौता आंदोलन है जिसने एक बूंद रक्त नहीं बहाया- सिर्फ संवाद किया है और हमेशा अपने आंचल के साए में एक बृहत्तर मुद्दा लेकर चला है- नि:शस्त्रीकरण, नेग्रीच्यूड, पर्यावरण, उग्र बाजारवाद का प्रतिरोध आदि.

-कविताओं में जो स्त्री चरित्र आते हैं क्या- उसके लिए कोई यायावरी करती हैं तथा विभिन्न तबके की औरतों से मिलती-जुलती हैं या इर्द-गिर्द की स्त्रियों से ही हालात का जायज़ा लेती हैं?
*यायावरी कई बार की है- विस्थापन बस्तियों तक गई हूँ, निर्भया की मॉं को फालो किया है- निर्भया के वियोग में बीता बारहमासा उनकी ओर से लिखने के पहले; ढेला बाई लिखते हुए मुजफ्फरपुर की वृद्ध वेश्याओं से भी मिली हूँ.
वैसे भी हमेशा एक अंतर्यात्रा पर ही रहती हूँ. जो सामने आया, उससे अंतरंग संवाद ही किया. उसकी गहनतम स्मृतियों तक गई. औपचारिकता मेरे स्वभाव में नहीं तो जो संबंध बने, गहन ही बने. तो लोगों ने भी कोई दुराव छिपाव नहीं बरता और लगातार अपनी स्मृतियों से, सपनों से, अनुभूतियों से समृद्ध ही किया और जो भी मैंने लिखा, सुने, देखे, भोगे, पढ़े-लिखे, गुने के साक्ष्‍य से ही.

- आपके समकालीनों में '82 के बाद कवयित्रियों की एक पीढ़ी आई थी जिनमें तेजी ग्रोवर, गगन गिल कात्यायनी व निर्मला गर्ग जैसी कवयित्रियां थीं. पहला संग्रह 'शीतल स्पर्श एक धूप की' तो आपका भी 1975 में ही आ गया था तथा 'गलत पते की चिट्ठी' 1979 में फिर भी बीजाक्षर (1993) एवं अनुष्टुप (1998) ने आपकी पहचान को बतौर कवयित्री स्थापित किया. बाद में नीलेश रघुवंशी, सविता सिंह, अनीता वर्मा आदि की पीढ़ी सामने आई; यद्यपि निर्मला गर्ग का संग्रह 1992 में, कात्यायनी का संग्रह 1994 में व नीलेश रघुवंशी का पहला संग्रह 1997 में आ गया था. पर सविता सिंह व अनीता वर्मा के संग्रह 2000 के बाद प्रकाशित हुए. 1983 में गगन गिल का कविता संग्रह 'एक दिन लौटेगी लड़की' स्त्री-दृष्टि के लिहाज से बहुत चर्चित हुआ था. कात्यायनी की कविताओं में एक जुझारू स्त्री दिखती थी, जो प्रगतिशील चिंतन की हामी थी और जिसके लिए स्त्री वैचारिकी से ज्यादा वाम वैचारिकी अहमियत रखती थी. आपकी कविताओं में यह वैचारिकी किस रूप में आई है?
* मेरे आगे-पीछे बहुतेरे स्त्री स्वर विशिष्ट हैं. बड़ों को मैंने साहित्य अकादेमी और इतिहासबोध वाले समवेत संग्रहों में शामिल कर उनके योगदान पर यथेष्ट टिप्पणियां की हैं. छोटों में जो विशिष्ट लगे, उनकी किताबों में ब्लर्ब लिखे या 'इंडियन लिटरेचर' के 'हिंदी पोयट्री स्पेशल' में उनके अनुवाद शामिल किए- लंबी भूमिका में सबकी चर्चा के साथ.
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता. हम पौधों के बदले जलवायु नहीं बदलती.
जहां तक ऐसी अग्रजाओं से मेरे फर्क का सवाल है, गांव-कस्बों- महानगरों की सर्वसाधारण स्त्री हूँ मैं, कोई विशिष्ट स्त्री या 'टोकेन वूमेन' नहीं. मेरी भाषा के अवचेतन में कई परछाइयां और अनुगूँजें हैं, जो गहनतम संवादों का दाय हैं- 'मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ मैं सो तोय'.

- स्त्री विमर्श भारत में पश्चिम की देन है. हमारा पूरा समाज स्त्रियों को लेकर बहुत उदार रहा है किन्तु बाद में स्त्रियों को लेकर संकीर्ण और संकुचित भी हुआ. पुरुषसत्तात्मक नींव ज्यादा गहरी थी जिसे तोड़ पाना बहुत आसान न था. इस दृष्टि से पश्चिम के स्त्री-विमर्श और स्त्री-मुक्ति अभियानों का क्या असर आप हिंदी जगत में देखती हैं?
* कोई भी धर्म जीवन की उदात्ततम कल्पनाओं का समाहार ही होता है. दिक्कत उसके मूल सूत्रों के भाष्य को लेकर होती है. वे अगर आंख मूंद कर अगले युग तक घसीटी गईं तो रूढ़ि बन कर असंगत हो जाती हैं. हर्मेन्यूटिक्स की यह समस्या हर धर्म की उच्चाशयता को ग्रहण लगा देती है. धर्मशास्त्र पहले तो देश-काल के साथ बदले, बाद में रूढ़ हो गए. रूढ़ होना क्रूर होना है. रूढ़ि मोतियाबिंद है और विमर्शात्मक संवाद है. फीको सर्जरी का गहन यत्न. पर फीको सर्जरी एक कौशल है- इतनी महीनी तो चाहिए कि आंख फूटने से बच जाए; सिर्फ मोतियाबिंद हटे.

-दुनिया भर के स्त्री आंदोलनों और स्त्री अध्ययनों ने समाज में क्या कुछ प्रभाव डाला है, जिसकी फलश्रुति आज भारतीय कविता में तथा छाया हिंदी कविता में भी दिखती है? क्‍योंकि आज के समय में सैकड़ों प्रबुद्ध व संवेदनशील कवयित्रियां कविताएं व उपन्यास आदि लिख रही हैं तथा स्त्री-विमर्श में अपनी सक्रिय भागीदारी कर रही हैं?
*कई अवदान हैं स्त्री विमर्श के. दुनिया की हर भाषा में स्त्रियॉं अपनी गहनतम अनुभूतियां साझा कर पाएं -इसका परिवेश जो तैयार हुआ तो तीन चार मुख्य बातें अयॉं हुईं- स्त्री विमर्श मोनोलिथ (एकाश्म) नहीं है. हर वर्ग- वर्ण- धर्म- नस्ल- आदि की स्त्रियों की विशिष्ट समस्याएं भी हैं पर देहाधारित शोषण और भाषिक /मानसिक हिंसा की समस्याएं साझा हैं; घरेलू श्रम और प्रजनन बच्चे पालने आदि की जो अतिरिक्त भूमिका स्त्रियां इतनी तत्परता से निभाती हैं और पूरे प्राणपन से- उसके लिए न किसी का मन कृतज्ञ है, न वहां हाथ बँटाने को प्रवृत्त होता है कोई. 'मर्द को दर्द नहीं होता' आदि उक्तियों के जोर से पुरुषों में 'नारिकेल वृत्ति' एक समस्या -सी बन कर उभरती है. उनके मन में यह बैठा दिया जाता है कि क्रोध का सार्वजनिक प्रदर्शन उचित है, पर कोमल भावनाएं पुरुषोचित नहीं. यह वृत्ति भाषिक उच्छ्लता में भी बाधा बनती है- स्त्रियों का भाषिक अवचेतन एक तो अधिक समृद्ध होता है क्योंकि वे ध्यान से देखती- सुनती- पढ़ती हैं, दूसरा उन्हें  कोमल भावनाएं या कोई भी सुख-दुख खुल कर बतियाने में कोई बाधा नहीं होती. इसका नतीजा यह है कि वर्ग -वर्ण -नस्ल -धर्म आदि की कँटीली चारदीवारियां लॉंघती मीरा की प्रेम-बेल हो गया है स्त्री-विमर्श- अब तो बेल फैल गई' के भाव से बहनापा लगातार फूल-फल रहा है.
पूरब-पश्चिम के बीच एक क्रास-वेंटिलेशन संभव किया है उत्तर औपनिवेशिक स्त्री विमर्श ने- यह भी उसका एक बड़ा दाय है.

- मुझे ऐसा लगता है कि आपके भीतर एक गांधीवादी चिंतक है जो पुरुष को स्त्री का प्रतिलोम नहीं मानता. उसे इसी परिस्थिति व परवरिश की उपज मानता है तथा पुरुष की जड़ीभूत अवधारणाओं को छीलता व परिशुद्ध करने का हामी है. क्या सोचती हैं आप इस बारे में?
*जी, सविनय अवज्ञा की तकनीक गांधी ने स्त्रियों से ही सीखी होगी. प्रीति-कलह का पूरा सिद्धांत, कोपभवन और खटवास-पटवास लेने की पूरी अवधारणा अंतर्वैयक्तिक संबंधों में अब तक कारगर है. बालहठ, त्रिया हठ के ऊपर की एक समझदार पहल के रूप में इसे लें तो 'कांतासम्मितउपदेश' के रूप में पढ़ सकते हैं. संवाद की पहल है, इसका साफ मतलब है कि सामने वाले की नैसिर्गिक अच्छाई में आस्था बनी हुई है.

-आपने एक साक्षात्कार में कहा है कि आपकी कविता सहकारिता का वृंदगान है. यह क्या वर्तमान स्त्री-विमर्श की दृष्टि से यथास्थितिवादी व पुरुष के अत्याचारों से मुँह फेरे हुए नहीं प्रतीत होता?
* मन मस्त हुआ तो क्या बोले. संवाद करने को कोई उत्सुक तभी होता है जब कुछ परेशान कर रहा हो, तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे हों मन में, अतर्व्यवस्था बदलने की जरूरत महसूस हो रही हो. पर परिवर्तन दोनों तरफ से हाथ लगाने पर ही घटित होते हैं. क्रिया-प्रतिक्रिया का खेल तमाशा है. आत्म क्रांति के अभाव में ही बड़ी क्रांतियां अपक्रांति में बदल गईं. इतिहास से कुछ तो सीखना चाहिए. अंधी स्‍पर्धा मनुष्य को घुड़दौड़ का घोड़ा बना देती है, सहकारिता ही उसकी मनुष्यता का उचकुन है.

- किस्सागोई व औपन्यासिकता को लेकर आपका मानना क्या है?
* कविता बीज-विधा है और उसका स्वभाव स्त्री के स्वभाव जैसा है- वह कम जगह घेरती है, कम बोलती है, इशारों में बोलती है और सामने वाले से उम्मीद करती है कि वह उसके इशारे समझे.
पर कभी कभी कुछ नैतिक कुहेलिकाएं इतनी सघन हो जाती हैं कि एक कौंध में राह नहीं सूझती तो फिर उत्तर मांगने इतिहास के पास, मिथकों के पास, अलग-अलग जीवन संदर्भों तक जाना पड़ता है- तरह-तरह के चरित्रों के माध्यम से सत्य के अलग-अलग आयाम टटोलने होते हैं, इसी क्रम में उपन्यास लिखे जाते हैं.
किस्सागोई उपन्यास का एक टूल है, एक इकलौता टूल नहीं.

-आप लोक अभिप्रायों की कवयित्री हैं. यह लोक आपकी कविताओं को जैसे आंचलिक खूबियों से संपन्न  करता है. क्या यह सायास होता है या आपकी अस्थि मज्जा में लोक का स्वाभाविक प्रवाह है?
* मैंने अपनी ननिहाल के सामने वाले कुम्हार मामू को गौर से मूर्तिया बनाते हुए देखा था: विरुद्धों के सामंजस्य से ही मूर्ति गढ़ी जाती है- मिट्टी में आकाश, आग में पानी और हवा गूँथे बिना कोई आकृति प्रकट नहीं होती. सत्य जब प्रकट होता है, ध्रुवांतों में ही प्रकट होता है- जीवन मृत्यु, तांडव-लास्य, सुख-दुख, दिन-रात, आपबीती-जगबीती एक-दूसरे का सजग साक्ष्य ग्रहण करते हैं, तभी कोई मर्म प्रकट होता है. स्वीकार और निषेध भी एक दूसरे को संभालते हुए चलते हैं. स्वीकार एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें कई तरह के नकार अंतर्भुक्त हैं. 'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई'--मीरा जब कहती हैं तो एक के स्वीकार में पूरी पितृसत्ता का ही नकार नहीं, पूरी राज्यसत्ता का नकार भी शामिल है. छूटते- टते ही धब्बे छूटते हैं, पूर्वग्रह और मोह के लच्छे भी.

-आपकी कविताओं का स्थापत्य समकालीन कवयित्रियों की कविताओं से अलग है. कुछ में तो स्त्री दुख का एक प्रायोजित प्रवाह-सा दिखता है. पर आपके यहां दुख है तो सुख का उल्लास व कौंध भी. स्त्री समाज की जीवंत कस्बाई हलचलें भी हैं. आपने केवल हताशा का संसार व्यंजित नहीं किया है. इस तुलनीय कसौटी पर अपनी कविताओं को किस तरह देखती हैं?
* हम एक खेत की तरह हैं- एक साथ समरूप भाव में बीज पड़े हैं, मिट्टी भी एक समान ही उपजाऊ है -यह संयोग ही है कि किसी अँखुवे पर आज नजर पड़ी, किसी पर कल.
नज़र पड़ना महत्त्वपूर्ण भी नहीं है, ये भी कोई देखे तो बीज चटकेंगे कि कैसे झाड़ियों में छिप कर नरगिस खिलती है और अनूठे गौरव के साथ.

- परिवार की साहित्यिक विरासत आपने ली. आपके बाद की पीढ़ी में यह गुणसूत्र किसी में हैं क्या?
- दोनों बच्चे लिखते हैं. -उत्कर्ष की किताब तो पिछले साल 'सेज इंटरनेशनल' से छपी और नौ देशों की बेस्ट सेलर हुई- यही भाव, उसका आधारप्रमेय था कि 'अंधी स्पर्धा नहीं, हँसमुख सहकारिता है जीवन का मूल मंत्र.' उन्नयन अपने गिटार पर बजाने के लिए अंग्रेजी में बहुत मार्मिक गीत लिखता है जो विस्थापित युवकों में बहुत लोकप्रिय भी हैं. प्रकृति सहायक रही है, कृतज्ञ हूँ.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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