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बच्चों के हक में कानून का डंडा

बच्चों के खिलाफ अपराध से संबंधित विधेयक 'अगेंस्ट चाइल्ड बिल 2009'-जिसे जल्दी ही कैबिनेट के सामने रखा जाने वाला है-कानून बन गया तो बच्चों को शारीरिक दंड देने पर माता-पिता दंडनीय अपराध के भागीदार होंगे.

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भारतीय परिवारों के बारे में अगर यह कहा जाए कि वे खामख्वाह बातों को दबाने-छिपाने के गढ़ हैं तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी. अब इसे अच्छा कहें या बुरा या बदतर, हकीकत यह है कि उस पर शायद ही कभी सार्वजनिक टीका-टिप्पणी की जाती है. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. अगर बच्चों के खिलाफ अपराध से संबंधित विधेयक 'अगेंस्ट चाइल्ड बिल 2009'-जिसे जल्दी ही कैबिनेट के सामने रखा जाने वाला है-कानून बन गया तो बच्चों को शारीरिक दंड देने पर माता-पिता दंडनीय अपराध के भागीदार होंगे.

इस मसौदा विधेयक में कहा गया है कि 'किसी भी तरह से निरंतर पिटाई, कुटाई, शरीर के किसी अंग को ऐंठना और (यहां तक कि) चिकोटी काटना' भी 'हिंसा, क्रूरता, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार' माना जाएगा और इसके लिए तीन साल तक कैद की सजा या आर्थिक दंड या दोनों हो सकता है. जब बच्चे इस हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे तो वे माता-पिता के खिलाफ पुलिस से हस्तक्षेप करने के लिए कहने को स्वतंत्र होंगे. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसकी सख्त जरूरत थी, जबकि अभिभावकों का कहना है कि जरूरत से ज्यादा चिंता करने वाली सरकार की ओर से यह बेजा हस्तक्षेप है.

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लेकिन सरकार के पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि देश के परिवारों में करन जौहर की फिल्मों जैसा खुशगवार माहौल नहीं है. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2007 में देशव्यापी सर्वेक्षण कराया था जिसमें 13 राज्यों के 5-18 साल के 12,447 बच्चों को शामिल किया गया था. सर्वेक्षण से चौंकाने वाली तस्वीर उभरी है- चार में से तीन बच्चों के साथ मारपीट या शारीरिक दुर्व्यवहार किया जाता है. परेशान करने वाली बात यह है कि 88.6 फीसदी बच्चों को परिवार में उनके माता-पिता ही मारते-पीटते हैं.

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष शांता सिन्हा पूछती हैं, 'परिवारों में अशांति और हिंसा है. अगर किसी वयस्क को मारना अवैध है तो क्या बच्चों के मामले में भी ऐसा नहीं होना चाहिए, जो सबसे कमजोर नागरिक हैं?'

{mospagebreak}सरकार ने बच्चों को छुईमुई बनाने के प्रयास में शायद यह सामाजिक यथार्थ भुला दिया कि उसके पास जिला स्तरों पर हेल्पलाइन या काउंसेलिंग सेंटर जैसी सुधारात्मक व्यवस्थाएं नहीं हैं. लेकिन संवैधानिक प्रावधान हैं, जिनमें नागरिक अधिकारों की गारंटी दी गई है, और बाल मजदूरी (निषेध एवं नियमन) कानून 1986, बाल अधिकार संरक्षण आयोग कानून 2005, जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून 2000 जैसे प्रावधान हैं जिनके तहत बाल मजदूरी, बाल वेश्यावृत्ति प्रतिबंधित है और शिक्षा की गारंटी दी गई है.

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लेकिन जन जागरूकता के अभाव में ये समस्याएं बनी हुई हैं और वक्त के साथ वे दानवाकार बनकर देश के सामाजिक क्षेत्र को रौंद रही हैं. 1 अप्रैल को प्रभावी हुए शिक्षा के अधिकार कानून की धारा 17 में कहा गया है कि 'किसी भी बच्चे को शारीरिक दंड नहीं दिया जाएगा और उसे मानसिक यातना नहीं दी जाएगी.' स्कूलों में मानसिक यातना को शारीरिक दंड के दायरे में ला दिया गया.

प्रस्तावित विधेयक में परिवार को भी इस दायरे में शामिल करके प्रावधान को और व्यापक बना दिया गया है. हाल में कोलकाता के ला मार्टिनियर फॉर ब्वॉएज के प्रिंसिपल और चार शिक्षकों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने रूवनजीत रावला नामक बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार किया कि वह आत्महत्या के लिए मजबूर हो गया. ऐसे मामले देश में बच्चों के अधिकारों की दुर्दशा की ओर इशारा करते हैं.

लेकिन इस विधेयक के मसौदे से माता-पिता नाराज हैं और बच्चे भ्रमित हैं. एक किशोरी के पिता अतुल जैन पूछते हैं, 'हमारे परिवार के मामलों में सरकार का क्या काम है?' दिल्ली में रहने वाले जैन एक आइटी कंपनी के सीईओ हैं. वे कहते हैं, 'मेरे माता-पिता ने मुझे मारा-पीटा था, मैं उनकी हरकत से खुश हूं. अगर जरूरत पड़ी तो मैं ताकत का इस्तेमाल करूंगा.'

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डीपीएस, इंदिरापुरम (गाजियाबाद) में 11वीं की छात्रा सृष्टि नारायण कुछ हैरान है, 'भले ही कोई बच्चा अपने साथ होने वाले व्यवहार से खुश न हो पर वह पुलिस से अपने माता-पिता की शिकायत नहीं करना चाहेगा.'

लेकिन बच्चों की आजादी की वकालत करने वाले इस विधेयक से खुश हैं. चिल्ड्रन फर्स्ट में मनोवैज्ञानिक एवं फेमिली थेरेपिस्ट डॉ. शैलजा सेन का कहना है, 'यह सही दिशा में पहला कदम है.' बच्चे तेजी से हो रहे बदलाव और पढ़ाई-लिखाई के दबाव से जूझ रहे हैं. सेन कहती हैं, 'ऐसे में उन्हें बरबाद बच्चे समझने की जगह उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार ज्यादा महत्वपूर्ण है.'

{mospagebreak}दरअसल, लालन-पालन को नए ढंग से परिभाषित करने की जरूरत है. दिल्ली स्थित मूलचंद मेडिसिटी में मनोचिकित्सा विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. जितेंद्र नागपाल के मुताबिक, यह कोई सामान्य समस्या नहीं रह गई है. वे ऐसा सकारात्मक रवैया अपनाने पर जोर देते हैं जिसमें फर्ज, जिम्मेदारी और इनाम के बीच संतुलन हो. चूंकि बच्चों में बर्दाश्त करने का माद्दा कम हो गया है लिहाजा उनसे निबटने का यही सबसे बढ़िया तरीका है.

पश्चिमोत्तर दिल्ली के कक्षा 12 के एक 17 वर्षीय छात्र ने अपनी गर्लफ्रेंड के पिता से डांट खाने के बाद 18 जुलाई को कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. उसने घर पर जहर खाने से पहले अपनी गर्लफ्रेंड को ई-मेल भेजा और एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर दोस्तों को अलविदा कहा. आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया है कि 53 फीसदी बच्चों के साथ किसी-न-किसी तरह का यौन दुर्व्यवहार किया जाता है, और उनमें 70 फीसदी बच्चे डर के मारे अपने माता-पिता या शिक्षकों को यह बात नहीं बताते.

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लेकिन इस तरह के कानूनों से शिक्षकों को ज्यादा परेशानी है. दिल्ली स्थित वसंत वैली स्कूल के निदेशक अरुण कपूर किसी भी तरह के शारीरिक दंड के खिलाफ हैं लेकिन उनका मानना है कि माता-पिता का बच्चों के साथ निबटने का अपना तरीका है. उनका मानना है कि 'बच्चे को अनुशासित करना और ताकत का इस्तेमाल करना, दो अलग-अलग बातें हैं.' उनके मुताबिक, बच्चों को अलग-थलग करके, उन्हें फटकार कर, परिणाम भुगतने का डर दिखाकर और विशेषाधिकार छीनकर अनुशासित किया जा सकता है. उनका कहना है, 'बच्चों में जागरूकता का स्तर अधिक होने की वजह से इस तरह के कानून का दुरुपयोग हो सकता है और इससे माता-पिता एवं बच्चों के बीच परस्पर विश्वास कम हो सकता है.'

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ जोर देकर कहती हैं कि नया प्रावधान कामकाजी माता-पिता के लिए एक समाधान है क्योंकि 'वे अपने बच्चों के साथ ज्यादा वक्त नहीं बिता पाते.' वे कहती हैं, 'वे परिवार के दूसरे सदस्यों और नौकरों पर निर्भर रहते हैं. बच्चों के साथ कभी-कभी सख्त व्यवहार किया जाता है. इस कानून के जरिए ऐसा व्यवहार करने वालों को ही निशाना बनाया जाना है.'

लेकिन हकीकत इन सबके बीच में है और कानूनी तौर पर हमेशा उसे सिद्ध नहीं किया जा सकता. दिल्ली के मनोवैज्ञानिक रजत मित्र कहते हैं, 'शारीरिक दंड बच्चों के लिए और हिंसक एवं सदमा भरा भविष्य तैयार करता है. इससे कोई सीखता नहीं है.' और कम-से-कम प्यार का भाव तो इससे कतई नहीं पैदा होता.

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