भौगोलिक विविधता वाले शहडोल संभाग के अनूपपुर जिले में हरी मिर्च की प्रचुर पैदावार ने दूरदराज क्षेत्र में बसे तमाम आदिवासियों की जिंदगी में मिठास भर दी है. तीन साल पहले आदिवासी बहुल गांवों में मिर्च का उत्पादन शुरू हुआ. इस अल्प अवधि में ही मिर्च के उत्पादन ने आदिवासियों के आर्थिक स्तर में उल्लेखनीय सुधार ला दिया है.
धुरवासिन गांव में रहने वाले मानसिंह गोंड़ और उनके जैसे तमाम लोग पहले रोजी-रोटी के लिए दूसरों के यहां दिहाड़ी पर काम करते थे और परेशानी में जीवनयापन करते थे, लेकिन आज हाईब्रीड मिर्च की बदौलत ये इस मौसम में अच्छी रकम कमा रहे हैं.
मानसिंह आज अपने खेत में दूसरों को मजदूरी दे रहे हैं. कल तक पैदल ही घूमने वाले मानसिंह के पास अब मोटर साइकिल और मोबाइल नजर आने लगा है. यह बदलाव राज्य सरकार की मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना द्वारा मुहैया कराए गए मिर्च के हाईब्रीड बीज और ड्रिप एरिगेशन से संभव हुआ है.
इस मदद ने इलाके के लोगों की जिंदगी बदल दी है. महज कुछ रकबे वाले काश्तकार हरी मिर्च की भरपूर पैदावार कर खुशहाल हो रहे हैं. नतीजतन यहां मिर्च के रकबे में तीन साल में तीन गुना बढ़ोत्तरी हो चुकी है.
वास्तव में यहां के अधिकतर किसान पारंपरिक रूप से बारिश के पानी के भरोसे मुश्किल से मक्का ही पैदा कर पाते हैं. राज्य सरकार की पहल पर यहां के काश्तकारों का रुझान हरी मिर्च की ओर बढ़ा है.{mospagebreak}
मान सिंह ने जब पहली बार मिर्च की फसल ली तो मानो चमत्कार हो गया. आज वे अपने 20 डिसमिल खेत में हरी मिर्च की जबरदस्त पैदावार ले रहे हैं और सालाना 60 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं. वे मोबाइल से मंडी के भाव पता करते हैं.
फूल सिंह गोंड़ की बहू लीलावती बताती हैं कि पहले घर के सभी सदस्य मजदूरी के लिए बाहर जाते थे, लेकिन जब से मिर्च की फसल लेना शुरू किया, तब से दूसरों को काम देने की हमारी हैसियत हो गई है. उनके ससुर ने मिर्च की फसल से हुए मुनाफे से दूसरों से लिया सारा कर्ज अदा कर दिया है.
गांव के सुखदीन भी हरी मिर्च की खेती से हुए लाभ से बहुत खुश हैं. वह कहते हैं कि मैं पहले मजदूरी के लिए यहां-वहां भटकता था. मक्का की खेती करता था, पर कोई फायदा नहीं होता लेकिन आज ऐसा नहीं है. वह कहते हैं कि मिर्च की पहली फसल से ही हमारा जीवन संवर गया. इससे होने वाली कमाई से मकान भी बना लिया है.