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'गांधीजी के लिए गलत मंशा नहीं थी', भाषण पर बवाल के बाद बोले तमिलनाडु गवर्नर

तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 127वीं जयंती पर बोलते हुए था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद असहयोग आंदोलन 'निष्पक्ष' हो गया था और नेताजी के सैन्य प्रतिरोध की वजह से अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा. इस भाषण पर बवाल के बाद राज्यपाल ने स्पष्टीकरण जारी किया है.

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तमिलनाडु के गवर्नर ने गांधी-बोस पर दिए बयान पर दी सफाई
तमिलनाडु के गवर्नर ने गांधी-बोस पर दिए बयान पर दी सफाई

तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने 23 जनवरी को सुभाष चंद्र बोस और गांधीजी को लेकर दिए गए अपने भाषण पर स्पष्टीकरण दिया है. आरोप लगाया गया था कि उन्होंने भारत की आजादी के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तुलना में सुभाष चंद्र बोस को अधिक श्रेय दिया था.  

राज्यपाल आरएन रवि ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 127वीं जयंती पर बोलते हुए था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद असहयोग आंदोलन 'निष्पक्ष' हो गया था और नेताजी के सैन्य प्रतिरोध की वजह से अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा. उनके इस भाषण की तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और कांग्रेस के नेताओं ने आलोचना की. साथ ही चेन्नई में राजभवन से एक किलोमीटर दूर सैदापेट आर्च के पास उनका पुतला जलाया गया.  

शनिवार को एक बयान में राज्यपाल ने कहा कि उनके भाषण को 'तोड़ामरोड़ा' गया. गलत धारणा बनाने के लिए इसके कुछ हिस्से को चेरी-पिक किया गया कि उन्होंने महात्मा गांधी का अनादर किया है.  

आलोचना भी, सम्मान भी... कुछ ऐसे थे महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस के रिश्ते

महात्मा गांधी का सर्वोच्च सम्मान: राज्यपाल

तमिलनाडु के राज्यपाल ने कहा कि उनका इरादा राष्ट्रपिता का अपमान करने का नहीं था और उन्होंने कहा कि वह महात्मा गांधी का ''सर्वोच्च सम्मान'' करते हैं. राज्यपाल ने कहा कि उन्होंने जो कहा वह "प्राथमिक दस्तावेजों पर आधारित तथ्य" थे.  

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आरएन रवि ने कहा, "मैंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की थी कि अंग्रेजों ने फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी और एयरफोर्स के विद्रोह के बाद स्वतंत्रता की प्रक्रिया में तेजी की, ये दोनों ही विद्रोह नेताजी से प्रेरित थे. इन विद्रोहों की वजह से अंग्रेज घबरा गए क्योंकि वे भारत में अपनी सुरक्षा के लिए वर्दी पहने हुए सैनिकों पर भी भरोसा नहीं कर सकते थे." 

उन्होंने कहा, "विद्रोह फरवरी 1946 में हुआ और अगले ही महीने, मार्च 1946 में, अंग्रेजों ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि वे भारत छोड़ देंगे." 

'अगर सशस्त्र क्रांति न होती तो....' 

उन्होंने कहा कि अगर नेताजी ने सशस्त्र क्रांति न की होती और भारतीय सैन्य और सुरक्षा बलों पर इसका प्रभाव नहीं होता तो अंग्रेज कुछ और साल तक भारत पर शासन करते.  

आरएन रवि ने 23 जनवरी को कही गई बात को दोहराया और कहा, "अगस्त 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, प्रारंभिक सफलता के बाद गति खो चुका था. भारत के विभाजन को लेकर मुस्लिम लीग की तीव्र जिद के कारण राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में आंतरिक संघर्ष हुआ. जमीनी स्तर पर प्रतिक्रियाओं ने कांग्रेस नेताओं के अधिकांश प्रयासों और ऊर्जा को आंतरिक संघर्षों को प्रबंधित करने के तरीके पर रोक दिया, जिससे ब्रिटिश बहुत प्रसन्न हुए.''

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