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बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना का भारत से है खास कनेक्शन, पिता की हत्या के बाद दिल्ली में बिताए थे 6 साल

भारत और बांग्लादेश के बीच बड़े भाई और छोटे भाई वाली केमिस्ट्री रही है. इस रिश्ते में विरासत है, एक दूसरे का सम्मान है और ये रिश्ता एक पड़ोसी के रिश्ते से थोड़ा ज़्यादा गहरा है. वहीं आप शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के लिए भारत एक दूसरे घर जैसा है.

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बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना
24:11
बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत के चार दिवसीय दौरे हैं. इस दौरान मंगलवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में स्थित हैदराबाद हाउस में मुलाकात की. दोनों की मुलाकात के दौरान कई मुद्दों पर चर्चा हुई और कई महत्वपूर्ण समझौते भी हुए. दरअसल, भारत और बांग्लादेश के बीच बड़े भाई और छोटे भाई वाली केमिस्ट्री रही है. इस रिश्ते में विरासत है, एक दूसरे का सम्मान है और ये रिश्ता एक पड़ोसी के रिश्ते से थोड़ा ज़्यादा गहरा है. वहीं आप शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के लिए भारत एक दूसरे घर जैसा है. दिल्ली वो जगह है जहां अपने जीवन की सबसे बड़ी मुसीबत के दौरान उन्होंने शरण ली थी. 

बता दें कि जिस तरह हमारे देश में महात्मा गांधी को लोग राष्ट्रपिता मानते हैं. ठीक उसी तरह शेख मुजीब उर रहमान को बांग्लादेश में जातिर पिता यानी राष्ट्रपिता के तौर पर देखा जाता है. शेख मुजीब उर रहमान शेख हसीना के पिता हैं. भारत उन्हें हमेशा से बंग-बंधु के तौर पर याद करता आया है, जिसका मतलब होता है, बंगाल का सच्चा मित्र और यही वजह है कि जब शेख हसीना का विमान दिल्ली के इस एयरपोर्ट पर उतरा तो उस पर मौजूद उनके पिता की तस्वीर ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. हालांकि इस दौरान एयरपोर्ट पहुंचने पर शेख हसीना का ज़बरदस्त स्वागत भी हुआ.

7 समझौतों पर हुए हस्ताक्षर

इसके बाद दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच दिल्ली में एक अहम बैठक हुई. जिसमें कुल सात समझौतों पर सहमति बनी है. इसमें नदी, रेल, रिसर्च, स्पेस और दोनों देशों के सरकारी मीडिया के बीच महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं. भारत और बांग्लादेश के बीच नदियों का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों देशों के बीच 54 नदियां बहती हैं और इसके लिए दोनों देशों ने Joint River Commission बना रखा है. जिसकी अब तक 38 बैठकें हुई हैं और इसमें भी आखिरी बैठक 12 साल बाद पिछले महीने ही 25 अगस्त को हुई थी. यानी नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद है. और इसी विवाद को समाप्त करने के लिए एक अहम समझौता हुआ है.

बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर

भारत और बांग्लादेश की सिर्फ़ सीमाएं आपस मे नहीं मिलती हैं, बल्कि दोनों देश दिल से भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. इस रिश्तों को आप कुछ बातों से समझ सकते हैं. दरअसल, भारत और बांग्लादेश के बीच 4 हज़ार 96 किलोमीटर लम्बी सीमा लगती है और भारत के 5 राज्य असम, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए हैं. इसके अलावा दोनों देश 54 नदियां का पानी शेयर करते हैं और दोनों देशों के बीच बहने वाली नदियों की ये संख्या पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा है. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हमारे देश का राष्ट्रगान जन मन गण और बांग्लादेश का आमार सोनार बांग्ला मशहूक लेखक रबीद्र नाथ टैगोर ने ही लिखा है. बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा Trade Partner भी है. पिछले पांच वर्षों में दोनों देशों के बीच होने वाला व्यापार 72 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग एक लाख 45 हज़ार करोड़ रुपये हो चुका है.

राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने वाला पहला देश था भारत

यहां एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत दुनिया का पहला ऐसा देश था, जिसने बांग्लादेश को एक राष्ट्र के तौर मान्यता दी थी और पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश का रूप देने के लिए पाकिस्तान से युद्ध भी लड़ा था. इस युद्ध को भारत ने सिर्फ 13 दिनों में जीत लिया था. आज 17 करोड़ की आबादी वाले बांग्लादेश की कुल अर्थव्यस्था 33 लाख करोड़ रुपये की है. जबकि 140 करोड़ की आबादी वाले भारत की अर्थव्यवस्था करीब 280 लाख करोड़ रुपये की है.

6 साल दिल्ली में रह चुकी हैं शेख हसीना

शेख हसीना 6 साल दिल्ली में भी रह चुकी हैं. ये बात वर्ष 1975 से 1981 की है. उसम समय दिल्ली में उनका पता था, 56 Ring Road Lajpat Nagar-3. हालांकि बाद में वो दिल्ली के पंडारा पार्क के एक घर में शिफ्ट हो गई थीं. हालां कि लाजपत नगर में जहां वो रहती थीं, अब उस जगह पर एक Commercial Complex बन गया है. इससे पहले ये जगह बांग्लादेश की Embassy को दी गई थी. जो वर्ष 2003 तक रही. शेख हसीना 28 साल की उम्र में उस समय भारत आई थीं, जब 1975 में बांग्लादेश में तख्तापलट के दौरान उनके पिता शेख मुजीब उर रहमान और उनके परिवार के दूसरे सदस्यों की सेना ने हत्या कर दी थी. इस ऐतिहासिक घटना के दौरान शेख हसीना अपने पति के साथ जर्मनी में थीं. क्योंकि उनके पति एक Nuclear physicist थे, जो जर्मनी में ही रहते थे. इस वजह से उस दिन शेख हसीना और उनकी छोटी बहन शेख रेहाना इस हमले में बच गई. लेकिन उनके पिता और परिवार के बाकी सदस्यों को बेरहमी से मार दिया गया था. 

शेख हसीना के परिवार का कत्लेआम

ये बात वर्ष 1975 की है. उस समय शेख मुजीब उर रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री थे. और सेना में उनके ख़िलाफ़ काफ़ी असंतोष था. जिसका नतीजा ये हुआ कि 15 अगस्त 1975 को सेना की कुछ टुकड़ियों ने ढाका में उनके ख़िलाफ़ ऑपरेशन चलाया. और ये तय हुआ कि उन्हें पकड़ कर उस दिन जान से मार दिया जाएगा. उस समय शेख मुजीब उर रहमान के ढाका में तीन घर थे और तीनों घरों पर सेना ने तब कार्रवाई की थी. सबसे पहले शेख मुजीब उर रहमान के रिश्तेदार, जिनका नाम अब्दुर रब सेरानिबात था, ने उनके घर पर हमला किया गया. वो शेख मुजीब उर रहमान की सरकार में मंत्री भी थे और बांग्लादेश की सेना ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी. इसके बाद सेना की दूसरी टुकड़ी ने शेख मुजीब उर रहमान के घर पर हमला किया. उस समय उनके जो Personal Assistant थे. उन्होंने पुलिस को कई बार फोन किया लेकिन उन्हें कोई मदद नहीं मिली. इस दौरान सेना उनके घर में घुस गई और सबसे पहले उनके बेटे शेख कमाल को गोली मारी गई, जो सीढ़ियों पर खड़े थे. इसके बाद शेख कमाल की पत्नी, उनके छोटे बेटे शेख जमाल, उनकी पत्नी और बाद में शेख मुजीब को भी मार दिया गया. 

हमले में शेख हसीना और उनकी बहन की ऐसे बची जान

इस दौरान शेख मुजीब उर रहमान के छोटे बेटे नासीर ने सेना से गुहार लगाई और कहा कि वो राजनीति में नहीं हैं. लेकिन इसके बावजूद उन्हें भी मार दिया गया. शेख मुजीब के सबसे छोटे बेटे रसल उस समय सिर्फ़ 10 साल के थे, लेकिन सेना ने उन्हें भी गोलियों से भून कर मार डाला और जब ये सब हो रहा था तब सेना की एक और टुकड़ी फजलुल हक़ मोनी के घर पहुंची. जो शेख मुजीब उर रहमान के भतीजे थे. सेना ने उन्हें और उनके परिवार को भी बड़ी बेरहमी से मार दिया. मारे गए लोगों में फजलुल हक़ मोनी की पत्नी भी थीं, जो उस समय गर्भवती थीं. लेकिन उन्हें भी सेना नहीं छोड़ा. इस तरह उस रात को शेख मुजीब उर रहमान और उनके परिवार के दूसरे लोगों की हत्या कर दी गई. हालांकि इस हमले में उनकी बेटी शेख हसीना और छोटी बेटी शेख रेहाना की जान बच गईं. क्योंकि वो उस समय जर्मनी में थीं. हालांकि इसके बाद भारत की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें दिल्ली में शरण दी और वो 6 वर्षों तक यहीं रहीं. 

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