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हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति पद के लिए लॉबिंग तेज

महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय एक बार फिर राजनीति का अखाड़ा बन सकता है. मौजूदा कुलपति और पूर्व आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय का कार्यकाल इसी महीने पूरा हो रहा है, लेकिन उन्होंने दोबारा इस पद पर काबिज होने के लिए लॉबिंग तेज कर दी है.

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हिंदी विश्वविद्यालय
हिंदी विश्वविद्यालय

महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय एक बार फिर राजनीति का अखाड़ा बन सकता है. मौजूदा कुलपति और पूर्व आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय का कार्यकाल इसी महीने पूरा हो रहा है, लेकिन उन्होंने दोबारा इस पद पर काबिज होने के लिए लॉबिंग तेज कर दी है.

उनकी लॉबिंग का ही नतीजा है कि सर्च कमेटी के चेयरमैन अशोक वाजपेयी के कड़े विरोध और अपने विवादास्पद कार्यकाल के बावजूद राष्ट्रपति को भेजे जाने वाले पैनल में राय का नाम शामिल हो चुका है. सर्च कमेटी ने नए कुलपति के लिए पांच नामों के पैनल को हरी झंडी दी है, जिसमें सबसे पहला नाम संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य पुरुषोत्तम अग्रवाल का है, जबकि दूसरा नाम प्रसिद्ध भाषाविद और विश्व भारती के प्रो वाइस चांसलर उदय नारायण सिंह का है. पैनल में तीसरा नाम संस्कृत के सबसे वरिष्ठतम प्रोफेसर माने जाने वाले और फिलहाल राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (डीम्ड यूनिवर्सिटी) के कुलपति राधावल्लभ त्रिपाठी का है. जबकि दूसरे कार्यकाल के लिए हर जतन में जुटे विभूति नारायण राय का नाम चौथे स्थान पर है. पांचवे नाम के तौर पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र शामिल किए गए हैं.

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सर्च कमेटी के चेयरमैन अशोक वाजपेयी ने इंडिया टुडे से बातचीत में गोपनीयता की वजह से किसी नाम का खुलासा करने से इनकार किया, लेकिन पूछे जाने पर उन्होंने पांच नामों का पैनल होने और इनमें से एक नाम पर ‘डिसेंट नोट’ (असहमति पत्र) की पुष्टि की. सूत्रों के मुताबिक वाजपेयी ने अव्वल तो विभूति नारायण राय का नाम पैनल में शामिल किए जाने का विरोध किया, लेकिन सर्च कमेटी की सदस्य कपिला वात्सयायन के अड़ जाने पर वाजपेयी ने डिसेंट नोट के साथ पैनल में नाम जाने दिया.

सूत्रों के मुताबिक, राय ने अपना नाम पैनल में शामिल करवाने के लिए पिछले महीने दो बार कोलकाता का दौरा किया और वात्सयायन के भाई केशव मलिक से मुलाकात की थी और केशव मलिक को वर्धा बुलाकर भी उनकी खुब आवभगत की गई. राय की दोबारा नियुक्ति के प्रति आश्वस्त विश्वविद्यालय में उनके ही एक समर्थक बताते हैं कि विभूति नारायण ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सांसद पुत्र अभिजीत मुखर्जी से भी पैरवी के लिए गुहार लगाई है.

जहां उन्हें कहा गया था कि पहले पैनल में अपना नाम शामिल करवा लें. सूत्र बताते हैं कि इस भरोसे के बाद राय ने पैनल में अपना नाम शामिल कराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी. सर्च कमेटी के अध्यक्ष वाजपेयी राष्ट्रपति के नॉमिनी थे, जबकि सदस्य के तौर पर कपिला वात्सयायन और
मैनेजमेंट गुरु प्रीतम सिंह शामिल थे.

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क्या राष्ट्रपति अपने नॉमिनी की असहमति खारिज करेंगे?
अब सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सर्च कमेटी के चेयरमैन अशोक वाजपेयी के डिसेंट नोट को खारिज करेंगे. वाजपेयी राष्ट्रपति के नॉमिनी के तौर पर सर्च कमेटी की अध्यक्षता कर रहे थे. वाजपेयी ने राय के नाम पर अपनी असहमति जाहिर कर विस्तृत नोट लगाया है. फिलहाल नए कुलपति के लिए पांच नामों के पैनल वाला गोपनीय लिफाफा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास है और वाजपेयी के डिसेंट नोट पर मंत्रालय अपनी क्या राय देता है, वह भी राष्ट्रपति के निर्णय में महत्वपूर्ण होगा. हालांकि हिंदी विश्वविद्यालय की अनियमितताओं के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे छात्र संघर्ष समिति को आशंका है कि हो सकता है कि मंत्रालय इस डिसेंट नोट को राष्ट्रपति के पास ही नहीं भेजे, क्योंकि पूर्व में एक बार प्रोफेसर की नियुक्ति के मामले में डिसेंट नोट फाड़ा जा चुका है.

राजनैतिक दबाब बनाने की कोशिश
देश का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अपने मकसद में अभी तक कामयाब नहीं हो सका है. कुछ समय पहले राय ने इंडिया टुडे से बातचीत में अपने पूर्व के कुलपतियों अशोक वाजपेयी और गोपीनाथन को विश्वविद्यालय के पिछडऩे का जिम्मेदार ठहराया था. उन्होंने तो यहां तक कहा था कि साहित्य जगत में इस बात की बहस होनी चाहिए कि क्यों न इस विश्वविद्यालय को बंद कर दिया जाए. यहां नियुक्तियों से लेकर हर मामले में विवाद उठता रहा है. महिला लेखिकाओं के लिए ‘छिनाल’ शब्द का इस्तेमाल कर बवाल खड़ा कर चुके राय हालांकि इंडिया टुडे से बातचीत में उसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल करार दे चुके हैं.

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लेकिन विवादों के बावजूद राय कुलपति की कुर्सी आसानी से छोड़ते नहीं दिख रहे. सूत्रों के मुताबिक इस ङ्क्षहदी विश्वविद्यालय के कुलपति राय ने दोबारा कुर्सी हासिल करने के लिए उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेताओं से लेकर सर्च कमेटी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय में अपनी पहुंच का इस्तेमाल किया है. सर्च कमेटी ने 7 अक्टूबर को पैनल तय करते हुए लिफाफे को सीलबंद कर दिया, लेकिन अगले दिन ही 8 अक्टूबर को बांबे हाईकोर्ट की नागपुर बैंच ने फर्जी माइग्रेशन सर्टिफिकेट के मामले में राय और विश्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों के साथ-साथ महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों नहीं इस मामले में सीबीआई जांच कराई जाए. इसी मामले में वर्धा के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के आदेश पर उनके खिलाफ पहले से ही एफआईआर दर्ज है.

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