scorecardresearch
 

फेशियल रिकंस्ट्रक्शन, फेस रिकग्निशन सिस्टम...हाईटेक दिल्ली पुलिस ने ऐसे पकड़ा उपद्रवियों को

पुलिस ने लोकेशन के साथ-साथ आरोपियों के एक दूसरे से संपर्क साधने के टाइम और जगह का बाकायदा डेटा ग्राफिक्स के रूप में कोर्ट में पेश किया है. केस काफी संवेदनशील था, इसलिए जांचकर्ताओं ने कॉल डीटेल्‍स रिकॉर्ड जैसे परंपरागत टूल्‍स से इतर जाकर अन्य कई तकनीक इस्‍तेमाल किए.

Advertisement
X
दिल्ली हिंसा की फाइल फोटो
दिल्ली हिंसा की फाइल फोटो
स्टोरी हाइलाइट्स
  • हाईटेक तकनीक से उपद्रवियों की पहचान
  • दिल्ली पुलिस ने फेशियल रिकॉग्निशन का लिया सहारा
  • जियो लोकेशन के सहारे भी पकड़े गए आरोपी

दिल्ली दंगों को लेकर बेशक दिल्ली पुलिस पर सवाल खड़े हो रहे हैं लेकिन जांच का एक पहलू ये भी है कि इस बेहद नाजुक केस में दिल्‍ली पुलिस ने आम तकनीक से आगे जाकर फोरेंसिक इन्वेस्टिगेशन का भरपूर इस्तेमाल किया है. जियो लोकेशन, फेशियल रिकॉग्निशन, आईपी एनालिसिस, मोबाइल फोरेंसिक और डंप डेटा एनालिसिस जैसी ऐडवांस्‍ड टेक्‍निक से जांच में पुलिस को खासी मदद मिली है.

फरवरी में हुए दंगों की जांच के लिए दिल्‍ली पुलिस ने नई तकनीकों का इस्‍तेमाल किया. आरोपियों की हिंसाग्रस्त इलाके में मौजूदगी को मोबाइल लोकेशन एनालिसिस के जरिए पता किया गया है जिसका रिकॉर्ड पुलिस ने कई चार्जशीट के साथ संलग्न भी किया है. पुलिस ने लोकेशन के साथ-साथ आरोपियों के एक दूसरे से संपर्क साधने के टाइम और जगह का बाकायदा डेटा ग्राफिक्स के रूप में कोर्ट में पेश किया है.

केस काफी संवेदनशील था, इसलिए जांचकर्ताओं ने कॉल डिटेल्‍स रिकॉर्ड जैसे परंपरागत टूल्‍स से इतर जाकर अन्य कई तकनीक इस्‍तेमाल किए. मसलन, इंटरनेट प्रोटोकॉल डिटेल्‍स रिकॉर्ड एनालिसिस के साथ एक प्रयोग किया गया. आरोपियों के मूवमेंट्स का पता लगाने के लिए पुलिस ने उनके फोन में इंस्‍टॉल गूगल मैप्‍स की डिटेल्‍स निकाली. जियो-लोकेशन एनालिसिस से आरोपियों की दंगों के वक्त मौजूदगी का पता लगाया गया और चार्जशीट में शामिल किया गया.

Advertisement

पुलिस जांच अधिकारी ने जीपीएस के जरिए आरोपियों का लोकेशन और दंगों की जगह का रिकॉर्ड चार्जशीट में शामिल किया है. दंगों के दौरान पुलिस को 1000 सीसीटीवी फुटेज भी मिले जिनमें से आरोपियों और दंगाइयों के चेहरे की पहचान फेशियल आइडेंटिफिकेशन सॉफ्टवेयर के जरिए किया गया.

दंगे के दौरान कई ऐसी लाशें मिलीं जिनकी पहचान करना मुश्किल था. ऐसे में पुलिस ने फेशियल रिकंस्ट्रक्शन कर के इन लाशों को उनकी पहचान दी और जांच में शामिल किया. करावल नगर के शाहबाज की हत्‍या के मामले में खासतौर पर यह तकनीक इस्‍तेमाल हुई. आरोपियों के पास से सीज किए गए मोबाइल हैंडसेट्स से डेटा रिकवर किया गया. इन मोबाइल्‍स से कई कॉल रिकॉर्डिंग्‍स, वीडियो हासिल हुए जो डिजिटल सबूत बने.

पुलिस को ज्यादातर वाहन जले मिले थे जिनकी पहचान करना बेहद ज़रूरी था. लिहाज़ा वाहनों की जांच के लिए ई-वाहन को मैसेज भेजकर उनके मालिकों का पता लगाया गया और चार्जशीट में उनके बयानात दर्ज किए गए. इतना ही नहीं दिल्‍ली पुलिस ने फंड फ्लो एनालिसि‍स सॉफ्टवेयर का इस्‍तेमाल कर के आरोपियों के मनी ट्रांजेक्‍शन में पैटर्न्‍स का पता लगाया और फिर उस रकम के दिल्ली दंगों में इस्‍तेमाल का कनेक्‍शन जोड़कर चार्जशीट का हिस्सा बनाया.

Advertisement
Advertisement