एक महिला के जीवन में आने वाला पीरियड्स का वो समय जब शरीर में हलचल, मन में बेचैनी और मिजाज में बदलाव महसूस होता है. वो उसे अक्सर नॉर्मल कहकर नजरअंदाज कर देती हैं. कई बार कोई दवा खा लेने से आराम मिल जाता है तो कोई खानपान में बदलाव करके हर महीने आने वाला वो समय टाल देती हैं.
ये वो समय होता है जब ज्यादातर महिलाएं प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS) फेस करती हैं. ये समय हर महिला के लिए एक जैसा नहीं होता. किसी को सिरदर्द, पेट में ऐंठन और थकावट होती है तो किसी को चिड़चिड़ापन, चिंता और डिप्रेशन जैसा अनुभव होता है. सवाल ये है कि क्या PMS के लक्षणों से निपटने के लिए दवा ही इकलौता इलाज है? या फिर इसका कोई और दूसरा हल भी है? आइए जानते हैं विशेषज्ञों की राय और पूरी दुनिया में पीएमएस की समस्या का हल खोजने की क्या कवायदें चल रही हैं.
क्यों होता है PMS
गाइनोकोलॉजिस्ट डॉ. शिखा दीक्षित कहती हैं कि PMS हॉर्मोनल बदलावों की वजह से होता है. खासतौर पर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के लेवल में उतार-चढ़ाव से ये बदलाव दिमाग पर असर डालते हैं और शारीरिक-मानसिक लक्षण पैदा करते हैं. उनके मुताबिक इलाज पूरी तरह व्यक्ति की तकलीफ की तीव्रता पर निर्भर करता है.
कुछ बदलाव देते हैं राहत
डॉ. शिखा बताती हैं कि हल्के लक्षणों के लिए जीवनशैली में बदलाव जैसे रेगुलर एक्सरसाइज़, संतुलित डाइट या विटामिन B6, कैल्शियम और मैग्नीशियम सप्लीमेंट्स लेने से फायदा होता है. इस दौरान कम कैफीन और हाई-फाइबर फूड से भी राहत मिलती है. जब लक्षण moderate या severe हो जाएं तो पेनकिलर, हार्मोनल थेरेपी या जरूरत पड़ने पर हॉर्मोनल इमबैलेंस को संतुलित करने के लिए खास दवाएं दी जाती हैं.
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक
अगर PMS का असर मानसिक स्थिति पर ज्यादा हो जैसे डिप्रेशन, एंग्जाइटी, मूड स्विंग्स, इमोशनल आउटबर्स्ट तो इसे PMDD (Premenstrual Dysphoric Disorder) की श्रेणी में देखा जाता है. यह PMS का गंभीर रूप माना जाता है. साइकैट्रिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी बताते हैं कि ऐसे मामलों में SSRIs (Selective Serotonin Reuptake Inhibitors) काफी असरदार होते हैं. ये दवाएं ब्रेन के सेरोटोनिन लेवल को बैलेंस करके मूड को स्थिर करती हैं. दवाओं के साथ-साथ कुछ थैरेपीज भी फायदेमंद होती हैं.
ये तीन थेरेपी होती हैं कारगर
Cognitive Behavioural Therapy (CBT)
Mindfulness based stress reduction
Guided meditation और breathing techniques
क्या सिर्फ दवा ही काफी है?
शोध कहते हैं कि PMS का अनुभव हर महिला के लिए अलग होता है. कुछ के लिए ये थोड़े समय की असहजता है तो कुछ के लिए ये हर महीने आने वाला मानसिक और शारीरिक संकट है.इसलिए इलाज भी 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' नहीं हो सकता. डॉ. शिखा दीक्षित और डॉ. सत्यकांत दोनों मानते हैं कि PMS के गंभीर लक्षणों के इलाज में एक मल्टीडिसिप्लिनरी अप्रोच होनी चाहिए यानी गाइनो, साइकेट्रिस्ट और न्यूट्रिशन एक्सपर्ट की सलाह भी लेनी चाहिए.
दुनियाभर में PMS को लेकर क्या रिसर्च चल रही है?
Neurohormonal Targeting: अब PMS को सिर्फ हॉर्मोनल इश्यू नहीं, बल्कि न्यूरोलॉजिकल सेंसिटिविटी का मामला भी माना जा रहा है. रिसर्च में यह बात सामने आई है कि कुछ महिलाओं के दिमाग के हिस्से जैसे Amygdala, हॉर्मोनल बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं. इस पर आधारित कुछ experimental drugs पर अमेरिका और यूरोप में ट्रायल चल रहे हैं.
Digital Cognitive Therapy: कुछ मोबाइल ऐप्स और ऑनलाइन CBT प्लेटफॉर्म PMS और PMDD से जूझ रहीं महिलाओं को थेरेपी और मेंटल हेल्थ सपोर्ट दे रहे हैं. यूके और कनाडा में यह नया ट्रेंड बन रहा है.
Vagus Nerve Stimulation (VNS): यह एक non-invasive तकनीक है, जिसमें गर्दन के पास vagus nerve को हल्के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स से स्टिम्युलेट किया जाता है. इससे मूड स्विंग्स और एंग्जाइटी में राहत मिलने के संकेत मिले हैं.
Gut-Brain Axis Research: हाल की रिसर्च PMS में आंतों के बैक्टीरिया यानी gut microbiota की भूमिका को भी देख रही है. कुछ शोधकर्ता PMS को probiotics या gut-healing फूड्स से मैनेज करने की कोशिश कर रहे हैं.
क्या भारत में भी हो रहे हैं नये प्रयोग
भारत में अब टियर-1 शहरों में कुछ हेल्थ क्लिनिक्स PMS के लिए गाइनो-सायकैट्रिस्ट की टीम के साथ काम कर रहे हैं. वहीं, आयुर्वेद में PMS के लिए अश्वगंधा, शतावरी और ब्राह्मी जैसी हर्ब्स पर काम हो रहा हैं. इसके अलावा योग, प्राणायाम और ध्यान जैसी तकनीकों को भी PMS मैनेजमेंट का हिस्सा बनाया जा रहा है.