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लघु फिल्‍मों का आकर्षक मेला

भोपाल में नुमायां दुनिया की 66 लघु फिल्मों में से कुछेक फिल्मों ने छोड़ा गहरा असर. कुछ नितांत ढीली-पनीली साबित हुईं. भारत की कुल 27 फिल्मों में से कुछ तो बेहद दिलचस्प थीं.

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रवांडा में नरसंहार पर बनी डॉक्युमेंट्री के एक शुरुआती दृश्य में कुछ लोग टूथब्रश से खोपड़ी और हड्डियां साफ कर रहे हैं. बाद के दृश्यों में ऐसी हजारों खोपड़ियों का संग्रहालय नजर आता है. 24 मिनट की इस लघु फिल्म में 1994 के उस नरसंहार के  फुटेज भी हैं, जिसमें आठ लाख से ज्‍यादा लोग मारे गए थे. इसमें वहां के लोगों को बाद में यह कहते सुनकर बड़ा सुकून मिलता है कि हत्यारों को माफ करके हमें एक नई नींव रखनी होगी.
 
हिंदी फिल्‍मों का भी उल्‍लेख
रवांडा में हिंदी फिल्मों का भी इसमें उल्लेख आता है. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में पिछले हफ्ते हुए दूसरे अंतरराष्ट्रीय जनजातीय फिल्म महोत्सव (आइएफएफटीएसी) में फ्लावर्स आव रवांडा समेत, 40 देशों की कुल 66 छोटी-बड़ी फिल्में दिखाई गईं. इसमें उत्तराखंड के जौनसारी समाज की दीवाली पर 8.40 मिनट की फिल्म जौनसारीजः रिद्म ऐंड रेजोनेंस से लेकर कनाडा की 96 मिनट की आन नेटिव लैंड्स शामिल थीं.

भारत की कुछ फिल्‍में बेहद दिलचस्‍प
इसमें भारत की कुल 27 फिल्मों में से कुछ तो बेहद दिलचस्प थीं. मिसाल के तौर पर निर्मलचंद्र डंडरियाल की आल द वर्ल्ड इज अ स्टेज. एक घंटे के इस वृत्तचित्र में गुजरात में अफ्रीकी मूल के सिद्धि गोमा सूफी मुसलमान समुदाय के लोक कलाकारों को उनके घर चौबारे से लेकर दुनिया के कोने-कोने में रोमांचक नृत्य-गीत पेश करते शूट किया गया है. कैमरा जैसे उनके घरों में घुसकर बैठ जाता है और फिर उनकी जिंदगी का कच्चा-पक्का सामने आता जाता है. मलुंगा साज, मोरपंख, जिक्र-ए-इलाही, हवा में उछालकर सिर पर नारियल फोड़ना वगैरह-वगैरह. उनमें बहस भी चलती हैः ''कल को घर की लड़कियां भी स्टेज पर लानी पड़ेंगी.'' यह भी कि हमारी तहजीब का क्या होगा?''

जनजातीय जीवन पर कई फिल्‍में
दुनिया भर में चर्चित हुए मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के जनजातीय लोक चितेरे जनगढ़सिंह श्याम पर बनी अमित दत्ता की जनगढ़ (21.30 मिनट) नितांत इंप्रेशनिस्टिक फिल्म है. जनगढ़ के गांव, घर, परिजन, कार्यस्थल आदि को यह एक-एक अध्याय में बड़े रहस्यात्मक अंदाज में पेश करती है. प्रकाश, ध्वनि, आवाज, टेक्सचर यानी सिनेमा के हर पहलू का इसमें भरपूर प्रयोग हुआ है. खपरैल के सामने नीम धुंधलके में जनगढ़ के  पिता बताते हैं कि जनगणना के साल में पैदा होने से बेटे का नाम जनगढ़ रख दिया था. एक और खूबसूरत कलात्मक फिल्म पीथोरो छोटा उदयपुर (गुजरात) के राठवा आदिवासियों की पीथोरा पटिंग पर थी. इसके विजुअल्स और डीटेल्स में बड़ी सघनता थी. नारियल के ढक्कन में गाय का दूध मिलाकर बने रंगों से पीथोरा बाबा (लोकदेवता) के चित्रों का निर्माण.{mospagebreak}आधुनिकता का भी समावेश
घोड़े और पशु पक्षियों के साथ ही इस शैली के चित्रों में अब हवाई जहाज, ट्रेन और टीवी भी शुमार हो गए हैं. टीवी? इस सवाल पर फिल्म में एक राठवा जवाब देता है, ''क्या हमारे देवता टीवी नहीं देखना चाहते?'' इस उत्सव के आयोजकों में प्रमुख थी वन्या, जो कि मध्य प्रदेश सरकार के आदिम जाति कल्याण महकमे की एक इकाई है. 4-5 फिल्में इसकी ओर से या इसके सहयोग से बनी हैं. पर वे ही सबसे लचर दिखीं. चलें ओंकारेश्वरः वनों के बीच वृत्तचित्र में जैसे जंगल पर लिखे गए किसी ललित लेख को विजुअल्स में टेप कर दिया गया है. एक साहित्यिक प्रलाप-सा. भीलों में झाड़-फूंक करने वाले बड़वाओं की दुनिया पर तैयार अबूझ स्वर में सूत्रधार युवती की कर्कश, कच्ची आवाज और शायराना जुमले डॉक्युमेंट्री के मूल मजमून को सिरे ही नहीं चढ़ने देते.

रूपांतर ने भी छोड़ी छाप
विदेशी खंड में पुरस्कृत बांग्लादेश की 80 मिनट की, फिल्म के भीतर फिल्म शैली वाली रूपांतर का उल्लेख जरूरी है. अबू सईद निर्देशित इस फिल्म में एकलव्य पर फिल्म बनाते वक्त फिल्मकार आरिफ को पता चलता है कि संथाल लोग तो अंगूठे से तीर-धनुष पकड़ते ही नहीं. इसके बाद यह फिल्म उसी रहस्य को सुलझाने निकल पड़ती है कि अंगूठा जरूरी न होने पर भी द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उसे क्यों मांगा. फिल्म शुरू में ही एक सुखद घोषणा करती है कि महाभारत हिंदुओं का ग्रंथ होने के बावजूद उस पर उनका एकाधिकार नहीं. हैरत है कि एकलव्य प्रकरण के इस पहलू पर अभी तक किसी भारतीय की दृष्टि क्यों नहीं गई. महोत्सव की कई फिल्में जातीय समाजों के ऐसे ही रोचक पहलू उठाकर लाती हैं. कोलंबिया पैशन बताती है कि किस तरह वहां का भूमिगत माफिया एस्कोबार मां के जन्मदिन पर परंपरा के तहत उसे चुंबन देने आया और मारा गया.

कुछ पहलू ने गुदगुदाया
महोत्सव के कुछ पहलू खासे गुदगुदाने वाले थे. नृत्य स्पर्धाओं के लिए प्रदेश भर से आए भील-भीलनियां वगैरह चलते शो के दौरान अक्सर घुंघरुओं की छम्म-छम्म के साथ हॉल में घुसते तो एक नया अर्थ पैदा होता. उत्सव को सीमित पर अच्छे दर्शक मिले. भविष्य में यह नया दर्शक वर्ग तैयार करने में सफल रहेगा. ऐसी उम्मीद है.  -शिवकेश

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