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Mangalore Assembly Seat: कांग्रेस से विधायक हैं काजी साहब, बचा पाएंगे कुर्सी?

मंगलोर विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर काजी साहब विधायक हैं. मंगलौर विधानसभा सीट की गिनती मुस्लिम बाहुल्य सीटों में होती है.

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काज़ी मोहम्मद निजामुद्दीन. काज़ी मोहम्मद निजामुद्दीन.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • हरिद्वार जिले में स्थित है मंगलौर विधानसभा क्षेत्र
  • 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने दर्ज की थी जीत

उत्तराखंड (Uttarakhand) में मंगलौर (Mangalore) उत्तर भारत का एक पुराना स्थान है, जिसकी अपनी एक पहचान है. एक ओर तो यह ऐतिहासिक स्थान होने के कारण गौरव की बात है और दूसरी ओर असीमित संपत्ति के स्वामी तमाम अच्छे लोग हैं. इतिहास गवाह है कि इसका नाम इसके वाहक के आधार पर पड़ा, जिसका नाम मंगल सेन था. लंबे समय तक यह राजा मंगल सेन की राजधानी थी, जिसका प्रतीक आज भी इस शहर में मौजूद है. आइने अकबरी (लेखक अबुल फजल) से भी इस बात का प्रमाण मिलता है कि यह एक ऐतिहासिक स्थान था.

ब्रिटिश शासन तक मंगलौर एक तहसील थी 

मंगलौर ऐतिहासिक शहर है, जहां ईंट से बना एक किला मौजूद है. कहा जाता है कि इसे राजा विक्रमादित्य के समय में बनाया गया था. मध्ययुगीन भारतीय काल के दौरान मंगलौर मुख्य रूप से ब्राह्मणों और गूजरों के नियंत्रण में था. राजा विक्रमादित्य (380-415 ई.) के समय मंगल सेन ने इस किले का निर्माण करवाया था. उस किले की दीवार का एक हिस्सा शाह विलायत के दरगाह के कोने में सुरक्षित है. इस दीवार की चौड़ाई 12 फीट है. इसके अंदर ग्यासुद्दीन बलबन द्वारा निर्मित एक मस्जिद मौजूद है, जिसका कुतबा मस्जिद की दीवार में लगा है. मंगल सेन से लेकर ब्रिटिश शासन तक मंगलौर एक तहसील थी.

ब्रिटिश शासन ने वापस ले लिया था जिले का दर्जा

अधिकांश समय मंगलौर स्वतंत्र रहा. इसने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान थोड़े समय के लिए यह पंजाब का एक सुदूर-पूर्वी क्षेत्र बन गया. बाद में इसे भारत के संयुक्त प्रांत को दे दिया गया. एक समय ऐसा भी आया, जब इसे जिला घोषित किया गया, लेकिन ब्रिटिश शासन ने जिले का दर्जा वापस ले लिया और इसे एक तहसील में बदल दिया. बाद में तहसील को भी वापस ले लिया और रुड़की को तहसील बना दिया.

'आइने अकबरी' में भी दर्ज है मंगलौर का इतिहास

मंगलौर को आइने अकबरी में सहारनपुर की सरकार के तहत एक परगना के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, जो शाही खजाने के लिए 2,350,311 बांधों का राजस्व पैदा करता है. 300 पैदल सेना और 40 घुड़सवार सेना की आपूर्ति करता है. इसके ईंट के किले का भी उल्लेख है. उस समय जो भवन तहसील का कार्यालय था, उसे 'मिडिल ओरिएंटल स्कूल' में बदल दिया गया. आजादी के बाद यह भवन मध्य विद्यालय के नाम से प्रसिद्ध था.

वर्तमान में इस स्कूल के पास एक मस्जिद है, जिसे 'तहसील वाली मस्जिद' के नाम से जाना जाता है. शासन का मुख्य केंद्र कहां था, इसे किला के नाम से जाना जाता है, जो सड़कों और बाजारों से घिरा हुआ है. इस संरचना को देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि इस किले के चारों ओर दुश्मनों के लिए खाई बनी थी, ताकि दुश्मन किला के अंदर न पहुंच सकें.

मोहल्लों में आज भी पुरानी इमारतें मौजूद

वर्तमान में किला मोहल्ला किला में परिवर्तित हो गया है, जो नगर पालिका चौक से सर्राफा बाजार रोड, मुख्य बाजार से हैदरी चौक रोड, फिर मोहल्ला मलकपुरा से नगर पालिका परिषद रोड नाम से मशहूर सड़कों से घिरा है. उस समय शहर के बाहर बहुत कम आबादी थी. इसे अलग-अलग मोहल्लों के नाम से जाना जाता है. इन मोहल्लों में आज भी पुरानी इमारतें मौजूद हैं. मोहल्ला लाल बाग (लाल बाड़ा), जैन गली, कथैरा में कुछ पुरानी इमारतें हैं, जो ऐतिहासिक गवाह हैं.

अनारक्षित है मंगलौर निर्वाचन क्षेत्र

उत्तराखंड का मंगलौर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र 70 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है. हरिद्वार जिले में स्थित यह निर्वाचन क्षेत्र अनारक्षित है. 2012 में इस क्षेत्र में कुल 91,769 मतदाता थे. उत्तराखंड की मंगलौर विधानसभा सीट हरिद्वार जिले में पड़ती है. यह सीट हरिद्वार संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आती है. इस विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी की पकड़ काफी मजबूत मानी जाती है, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार काजी मोहम्मद निजामुद्दीन विधायक चुने गए थे.

मुस्लिम बाहुल्य विधानसभा क्षेत्र है मंगलौर

मंगलौर विधानसभा (Mangalore Assembly) एक मुस्लिम बाहुल्य विधानसभा है, यहां पर जाति समीकरण के हिसाब से मुस्लिम अंसारी, तेली जाति का दबदबा है. मंगलौर विधानसभा सीट पर जाट, गुर्जर, अंसारी, तेली और दलित निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं. पिछले चुनाव जहां पूरी तरह जातीय गोलबंदी पर लड़े जाते रहे, वहीं इस बार जातीय समीकरण के साथ-साथ विकास का फैक्टर भी काम कर रहा है. शिक्षा, स्वास्थ्य, सीवर, सड़क, किसान समस्या, बिजली, मूल निवास प्रमाण पत्र जैसे मुद्दे मंगलौर में हैं.

2012 के चुनाव में BSP ने दर्ज की थी जीत

2012 के विधानसभा चुनाव में मंगलौर सीट पर बहुजन समाज पार्टी (BSP) के उम्मीदवार सरवत करीम अंसारी विधायक चुने गए थे. उन्होंने कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार काजी मोहम्मद निजामुद्दीन को हराया था. इस चुनाव में बसपा उम्मीदवार सरवत करीम अंसारी को 24,706 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के काजी मोहम्मद निजामुद्दीन को 24,008 वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर राष्ट्रीय लोक दल के उम्मीदवार गौरव चौधरी थे, जिन्हें 19,354 वोट मिले थे. 2012 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी का वोट शेयर 34.3 प्रतिशत, कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर 33.7 प्रतिशत, राष्ट्रीय लोक दल का वोट शेयर 26.66 प्रतिशत था.

2017 में बसपा को हराकर चुनाव जीते थे काज़ी मोहम्मद

2017 के विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और बसपा (Congress-BSP) के बीच रहा था. कांग्रेस उम्मीदवार काज़ी मोहम्मद निजामुद्दीन 2017 में विधायक चुने गए. उन्होंने बसपा के विधायक रहे सरवत करीम अंसारी को हराया था. इस चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार काज़ी मोहम्मद निजामुद्दीन को 31,352 वोट मिले थे, जबकि बसपा के सरवत करीम अंसारी को 28,684 वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार ऋषि पाल बालियान थे, जिन्हें 16,964 वोट मिले थे. 2017 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर सबसे अधिक 38.75 प्रतिशत था. बसपा का वोट शेयर 33.45 प्रतिशत और भाजपा का वोट शेयर 20.97 प्रतिशत था.

Report Card: पहली बार 2002 में उत्तराखंड विधानसभा के लिए चुने गए

मंगलौर के मौजूदा विधायक काजी मोहम्मद निजामुद्दीन का जन्म 10 अगस्त 1974 को उत्तराखंड के मंगलौर में हुआ था. इन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की है. इनका कृषि और व्यापार का व्यवसाय है. इनके कार्यकाल की बात करें तो काजी निजामुद्दीन को पहली बार 2002 में उत्तराखंड विधानसभा के लिए चुना गया था. काजी साहब एक राजनैतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं. इनके वालिद काजी मोहम्मद मोहियुद्दीन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 40 से अधिक वर्षों तक राजनीति में सक्रिय रहे. वह पहली बार 1974 में चौधरी चरण सिंह की दलित किसान मजदूर पार्टी के सदस्य के रूप में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए थे.

पिता पांच बार यूपी विधानसभा के सदस्य रहे

काजी मोहम्मद निजामुद्दीन के पिता पांच बार यूपी विधानसभा (UP Vidhan Sabha) के सदस्य चुने गए. वह राज्य के गठन के बाद उत्तराखंड की अंतरिम विधानसभा के सदस्य बने और सबसे वरिष्ठ सदस्य होने के नाते उन्होंने 2000 में राज्य की अंतरिम विधानसभा के प्रोटेम स्पीकर के रूप में भी काम किया. 10 नवम्बर 2015 को उनका निधन हो गया. इसके बाद बागडोर काजी मोहम्मद निजामुद्दीन ने संभाली.

पड़ोसी राज्यों में भी है काजी मोहम्मद निजामुद्दीन का प्रभाव

काजी मोहम्मद निजामुद्दीन उत्तराखंड के एक राजनेता हैं और उत्तराखंड विधानसभा के तीन बार के सदस्य रहे. निजामुद्दीन मंगलौर का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनके पिता काजी मोहम्मद मोहियुद्दीन राज्य के पहले प्रोटेम स्पीकर थे. उनका राजनीतिक प्रभाव न केवल उत्तराखंड में है, बल्कि पड़ोसी राज्यों पर भी है. निजामुद्दीन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव हैं और वर्तमान में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सह प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं. 2017 में उन्हें राष्ट्रीय निकाय की कोर टीम में शामिल किया गया था.

2017 में जीते चुनाव, कांग्रेस पार्टी के सचिव भी बने

काजी मोहम्मद निजामुद्दीन 2017 में फिर विधानसभा चुनाव में खड़े हुए और मंगलौर से 2668 मतों के अंतर के साथ जीत हासिल की. उन्हें विधानसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित किया गया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सचिव पद भी दिया गया. मई 2017 में उन्हें कांग्रेस सचिव के रूप में राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 की रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस पार्टी की कोर टीम में शामिल किया गया. 2007 में वह उसी सीट से विधानसभा के लिए दोबारा चुने गए थे. इस बार उन्होंने आरजेडी के चौधरी कुलवीर सिंह को हराया. 2012 का विधानसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और बसपा उम्मीदवार सरवत करीम अंसारी से हार गए. निजामुद्दीन विधायक के रूप में तीन बार चुने जा चुके है.

उन्हें 2002 से लेकर 2003 तक कमेटी ऑन गवर्नमेंट एस्योरेंस का सदस्य बनाया गया था. उसके बाद 2003 से लेकर 2004 तक कमेटी ऑन PSE एंड कॉर्पोरेट का सदस्य बनाया गया. वहीं 2004 से लेकर 2006 तक कमेटी ऑन गवर्नमेंट एस्योरेंस, कमिटी ऑन असेंबली रूल्स के सदस्य रहे. 

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