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Kursi assembly seat: बाराबंकी की वो सीट जहां 2017 में पहली बार खिला कमल

कुर्सी विधानसभा सीट बाराबंकी लोकसभा क्षेत्र के तहत आती है और इंडस्ट्रियल एरिया होने के साथ-साथ इस क्षेत्र में जमीन काफी उपजाऊ और कृषि योग्य है. यहां पर एशिया का सबसे बड़ा पावर ग्रिड प्लांट और अमरून मीट फैक्ट्री भी लगी है.

Kursi assembly seat Kursi assembly seat
स्टोरी हाइलाइट्स
  • फतेहपुर विधानसभा परिसीमन के बाद बनी कुर्सी विधानसभा सीट
  • इंडस्ट्रियल एरिया है बाराबंकी मुख्यालय से 30 km दूर कुर्सी क्षेत्र
  • 2017 में बीजेपी के प्रत्याशी सकेंद्र वर्मा को कुर्सी सीट से मिली जीत

राजनीति में कुर्सी शब्द का बड़ा महत्व है जो इस कुर्सी को हासिल कर लेता है. वह देश और प्रदेश की सत्ता में राज करता है. खुद कभी आसानी से कुर्सी से उतरने का नाम नहीं लेता है. जब तक जनता खुद न उतारे. अब 2022 के चुनाव नजदीक है और कौन इस कुर्सी पर बैठेगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन क्या आप जानते हैं  कि यूपी के बाराबंकी जिले में भी एक कुर्सी सीट है जो विधानसभा के रूप में जानी जाती है.

कुर्मी और मुस्लिम बाहुल्य होने के नाते इस सीट को समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता था. लेकिन 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भगवा लहरा कर कुर्सी विधानसभा की कुर्सी पर कब्जा कर लिया.

सामाजिक तानाबाना  
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी की कुर्सी विधानसभा सीट बाराबंकी लोकसभा क्षेत्र में आती है और यहां इंडस्ट्रियल एरिया होने के साथ-साथ इस क्षेत्र में जमीन काफी उपजाऊ और कृषि योग्य है. यहां पर एशिया का सबसे बड़ा पावर ग्रिड प्लांट और अमरून मीट फैक्ट्री भी लगी है. यह क्षेत्र राजधानी लखनऊ से भी बहुत नजदीक है.

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फिलहाल कुर्सी विधानसभा सीट पर इस समय कुल 3,73,090 मतदाता हैं, जिसमें 2,01,554 पुरुष तो 1,71,533 महिला मतदाता हैं. यहां जातीय समीकरण के लिहाज से देंखे तो सबसे ज्यादा संख्या ओबीसी और दलित मतदाताओं की है. कुर्मी वोटर्स की  बड़ी संख्या है और इसके बाद मुस्लिम वोटर्स की तादाद है. ब्राह्मण और ठाकुर वोटर्स की संख्या भी निर्णायक स्थिति में है.

राजनीतिक पृष्ठभूमि
2011 में बदले परिसीमन में कुर्सी गांव को विधानसभा का दर्जा मिला था. पहली बार कुर्सी विधानसभा के लिए चुनाव 2012 में हुआ. कुर्सी विधानसभा पहले फतेहपुर विधानसभा के रूप में जानी थी. फतेहपुर में तहसील, ब्लॉक व नगर पंचायत है. जबकि कुर्सी में एक ग्राम पंचायत है लेकिन कुर्सी ग्राम पंचायत की अपनी एक अलग पहचान रही है.

ग्राम पंचायत होते हुए भी कुर्सी का नाम किसी तहसील और विधानसभा से कम नहीं है. कुर्सी विधानसभा में अब तक 2 बार चुनाव हुए हैं. 2012 में समाजवादी पार्टी का कब्जा हुआ फिर 2017 में  मोदी लहर में सभी राजनीतिक दलों के झंडे उखड़ गए और भगवा लहराते हुए बीजेपी के सकेंद्र वर्मा ने कुर्सी विधानसभा की कुर्सी पर कब्जा कर लिया. 

बाराबंकी मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर कुर्सी विधानसभा क्षेत्र को इंडस्ट्रियल एरिया के रूप में जाना जाता है. इस क्षेत्र में उद्योग लगाने के लिए सरकार द्वारा उद्योगपतियों को काफी सहूलियत प्रदान की गई है. इस इलाके की जमीन भी बहुत उपजाऊ है जो कृषि योग्य है.

राजधानी लखनऊ और सीतापुर मार्ग पर स्थित होने की वजह से प्रदेश के सभी बड़े नेताओं की नजरें इस सोना उगलती जमीन पर लगी रहती है. इसके अंतर्गत फतेहपुर तहसील भी आती है. यहां 2 नगर पंचायत फतेहपुर और बेलहरा भी है. यहां पर अवधी, हिंदी और उर्दू भाषा बोली जाती है. फतेहपुर में रेलवे स्टेशन भी है जो राजधानी लखनऊ, दिल्ली समेत कई शहरों को जोड़ता है. इतना ही नहीं यहां मझगवां शरीफ में प्रसिद्ध सूफी संत सुल्तान आरिफ अली शाह साहब और हजरत मखदूम शेख सारंग साहब की मजार और इसी विधानसभा क्षेत्र के बाबा साहब मंदिर बेलहरा में प्रसिद्ध है.

2017 का जनादेश

कुर्सी विधानसभा में संकेद्र प्रताप वर्मा ने 2017 के चुनाव में जीत हासिल की थी. उन्होंने 28 हजार 679 वोटों से समाजवादी पार्टी के फरीद महफूज किदवई को हराया था. संकेद्र प्रताप को एक लाख 8 हजार 403 वोट मिले और फरीद को 79 हजार 724 वोट मिले.

इस कुर्सी को झपटने के लिए बसपा ने भी कोशिश की, लेकिन उनके नेता वीपी सिंह वर्मा 51 हजार 91 वोट ही हासिल कर पाए. इस चुनाव में पीस पार्टी ने भी पूर्व विधायक सरवर अली मैदान में उतारा था. लेकिन सिर्फ 8 हजार 329 वोटों पर ही सिमट गए.

इस सीट पर उपविजेता रहे समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता हाजी फरीद महफूज किदवाई बाराबंकी के प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं. हाजी स्वंतत्रता संग्राम सेनानी और केंद्र तथा प्रदेश सरकार में कई बार कैबिनेट मंत्री रहे स्वर्गीय रफी अहमद किदवाई के भतीजे हैं.

जब कुर्सी विधानसभा का परिसीमन के बाद उदय हुआ तो हाजी फरीद महफूज ने भारी मतों से जीत हासिल कर सपा का परचम लहराया था और वह इसी कुर्सी सीट पर सपा का झंडा लहराया और अखिलेश सरकार ने राज्यमंत्री बने थे. लेकिन 2017 के चुनाव में वे अपने निकटम प्रतिद्वंदी बीजेपी के साकेंद्र वर्मा से 28 हजार वोटो से हार गए. 

रिपोर्ट कार्ड

कुर्सी विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक सकेंद्र प्रताप वर्मा 60 साल के हैं. उन्होंने बीएससी-एमए (तीन विषय) की डिग्री कानपुर विश्वविद्यालय से पास की है. परिवार में 1 बेटी और पत्नी है. राजनीति में पहले से इनके परिवार से कभी कोई नहीं रहा है.

सकेंद्र के राजनीतिक सफर की शुरुआत 1980 में छात्र जीवन से हुई. लखीमपुर खीरी के वायडी कॉलेज में बीएससी की पढ़ाई के दौरान उन्होंने राजनीति शुरू की. अपनी मेहनत से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का पहली बार कॉलेज में चुनाव जीत कर अध्यक्ष बने. ये सीतापुर के महमूदाबाद शहर के रहने वाले हैं.

पहली बार बीजेपी के बैनर तले बाराबंकी की कुर्सी विधानसभा से चुनाव लड़े और भारी बहुमत से जीत हासिल की. विधायक बनने से पहले वह आरएसएस और पार्टी संगठन से जुड़े हुए थे. विधायक सकेंद्र यूपी गन्ना विभाग के अध्यक्ष और महमूदाबाद चीनी मिल संगठन के डायरेक्टर रहे हैं.

हालांकि लगातार क्षेत्र में नहीं रहने की वजह विधायक सकेंद्र की जनता के बीच लोकप्रियता का ग्राफ कम हुआ है क्योंकि ये सीतापुर जिले के महमूदाबाद रहते हैं. 

अब 2022 के चुनावी संग्राम में सपा कुर्सी सीट पर नजर जमाए हुए है. अभी से सपा के टिकट के लिए 28 प्रत्यशियों ने दावा ठोक दिया है. सभी कुर्सी पर काबिज होने को बेताब हैं. जबकि बीजेपी यहां से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज करने की कवायद में है. साथ ही बसपा, कांग्रेस, पीस पार्टी, ओवैसी की पार्टी भी इस कुर्सी सीट पर नजर लगाए हुए है.

 

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