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अटल की विरासत पर राजनाथ की सियासत, आज भी है लखनऊ में 'अटल स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स' की रंगत

राजधानी लखनऊ में आज भी अटल की विरासत पर सियासत में 'अटल स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स' की झलक मिल जाती है, जिसमें सबको साधने के हुनर के साथ सीधे वार या आक्रामकता की जगह चुटीले अंदाज में विरोधियों पर सियासी तंज ही सुनाई पड़ते हैं.

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राजनाथ सिंह और अटल बिहारी वाजपेई (Photo: Facebook/Rajnath Singh)
राजनाथ सिंह और अटल बिहारी वाजपेई (Photo: Facebook/Rajnath Singh)

केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) ने सोमवार को लखनऊ में बीजेपी प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल किया. खास बात यह है कि देश भर में 'अबकी बार 400 पार' का नारा देने वाली बीजेपी लखनऊ में 'अबकी बार 5 लाख पार' का नारा दे रही है. यानी राजनाथ सिंह के इस बार 5 लाख की मार्जिन से जीत दर्ज करने की उम्मीद जताते हुए कार्यकर्ता इसे सबसे बड़ी जीत का दावा कर रहे हैं. राजनाथ के साथ ही इस चुनाव में अटल की 'विरासत पर सियासत' के वो रंग भी दिख रहे हैं, जिसकी शुरुआत तीन दशक पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी.

आज भी लखनऊ में अटल की विरासत पर सियासत में 'अटल स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स' की झलक मिल जाती है, जिसमें सबको साधने के हुनर के साथ सीधे वार या आक्रामकता की जगह चुटीले अंदाज में विरोधियों पर सियासी तंज ही सुनाई पड़ते हैं.

अटल की सियासी विरासत पर अटल स्टाइल में सियासत

लखनऊ से तीसरी बार सांसद बनने के लिए राजनाथ सिंह ने नामांकन किया तो गुजरे जमाने की सियासत और सियासत के 'अटल स्टाइल' की याद भी ताजा हो गई. सबको साथ लेकर चलने की परंपरा में और राजनाथ सिंह के सियासी कद को देखते हुए नामांकन जुलूस में यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी तो शामिल हुए ही, हर वर्ग के नेता और पार्टी के पदाधिकारी शामिल हुए. नामांकन जुलूस का लखनऊ में हर धर्म और हर वर्ग के लोगों ने स्वागत किया. जुलूस में लोग गुजरे जमाने के उन चुनाव को याद करते रहे थे, जिसकी वजह से लखनऊ एक अलग तरह की राजनीति के लिए जाना जाता है.

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लखनऊ के सांसद का चुनाव दरअसल 'विरासत पर सियासत' का भी एक उदाहरण है लेकिन ये विरासत किसी परिवार की नहीं बल्कि बीजेपी की राजनीति के शिखर पुरुष की है, जिन्होंने लखनऊ लोकसभा सीट का पांच बार प्रतिनिधित्व किया और यहीं के सांसद रहते हुए देश का प्रतिनिधित्व भी किया है. अटल के बाद भी 'अटल' की विरासत सम्भालने के नाम पर ही यहां चुनाव होता रहा. अटल स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स ने न सिर्फ लखनऊ सीट के चुनाव को रोचक बनाया बल्कि आज भी राजनाथ सिंह उसे फॉलो करते हुए देखे जाते हैं.

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क्या थी अलट की स्टाइल?

दरअसल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अपने सियासी विरोधियों पर आक्रामक वार की जगह चुटीले अंदाज में निशाना और सियासी तंज के लिए भी जाना जाता है. अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ के गली-गली में वोट मांगने के दौरान और चौक चौराहा, कपूरथला चौराहा, आलमनगर गेट जैसी जगहों पर नुक्कड़ सभा के दौरान अपने विरोधियों पर हमले तो खूब किए पर उनकी बातों में आक्रामकता की जगह सियासी तंज और चुटीले वाक्य ही होते थे. जिनकी काट विपक्षी दलों के नेताओं और उनके खिलाफ चुनावी मैदान में उतारे गए फिल्मी सितारों के पास नहीं होती थीं.

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अटल बिहारी वाजपेयी भरी सभा में ये बातें कहते थे और मौजूद लोग ठहाका मारकर हंस पड़ते थे. यहां चुनावी नारे में अटल का नाम हमेशा शामिल रहा. 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव लड़ने पर 'वोट अटल को वोट कमल को' नारा लगा, तो वहीं 'अब की बारी अटल बिहारी' नारा बाद के समय में सबसे ज्यादा सुनाई पड़ता रहा. 

प्रधानमंत्री बने अटल ने जब दोबारा चुनाव लड़ा, तो 'राजतिलक की करो तैयारी, आ रहे हैं अटल बिहारी' नारे ने जोर पकड़ा. अटल जहां नुक्कड़ सभाओं में जाते थे, वहीं अपने खास अंदाज और काव्यात्मक लहजे की वजह से लोग उनको सुनना पसंद करते थे.

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अटल बिहारी वाजपेयी का अंदाज बिल्कुल अलग था. 2006 में मेयर चुनाव के दौरान अटल बिहारी कपूरथला में चुनाव सभा को संबोधित करने पहुंचे. डॉ दिनेश शर्मा बीजेपी के प्रत्याशी थे. अटल ने मंच से जनता से पैजामा मांग लिया. उन्होंने कहा कि आपने मुझे सांसद बनाकर कुर्ता दिया है, अब मेयर चुन कर पैजामा भी दीजिए. ये सुनते ही सभा में लोग ठहाका लगाकर हंस पड़े. अटल के व्यक्तित्व का प्रभाव था कि उनके बाद जब लालजी टंडन को प्रत्याशी बनाया गया, तो उन्होंने कहा कि वो दिल्ली जा कर अटल जी का आशीर्वाद लाए हैं.

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अटल बिहारी वाजपेयी के सामने जब राज बब्बर को चुनावी मैदान में उतारा गया तो उनकी सभाओं में भीड़ जुटने लगी. लालजी टंडन अटल के चुनाव का प्रबंधन देखते थे. दरअसल पहली बार स्थानीय निकाय के चुनाव में डॉ शम्सुद्दीन खड़े हुए. उनके सामने लोगों ने दिलरुबा नाम की तवायफ को चुनाव में खड़ा कर दिया. दिलरुबा की सभाओं में भीड़ जुटने लगी, तब नारा दिया गया 'दिल दीजिए दिलरुबा को वोट शम्सुद्दीन को...' इसी तर्ज पर कहा गया कि अभिनेता राज बब्बर की सभा के भले जाएं पर वोट तो लोकप्रिय नेता अटल को ही दें.

अटल के आने के बाद से बदली सियासी फजाएं

लखनऊ लोकसभा सीट शुरुआत में कांग्रेस के खाते में रही लेकिन 1991 के बाद से इस पर बीजेपी का ही कब्जा रहा. विपक्षी दलों ने अटल बिहारी वाजपेयी के सामने 1991 में रंजीत सिंह, 1996 में राज बब्बर, 1998 में मुज़फ़्फ़र अली, 1999 में कर्ण सिंह और 2004 में डॉ मधु गुप्ता को उमम्मीदवर बनाया लेकिन अटल की शख्सियत के आगे सितारों का जादू भी नहीं चला. अटल स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स लखनऊ के लोगों को इतनी पसंद आयी कि अटल को ही लगातार लखनऊ के लोग चुनते रहे. 

अटल बिहारी वाजपेयी के बाद 2009 में लालजी टंडन और 2014 से अब तक राजनाथ सिंह भी अपने सियासी विरोधियों पर इसी तरह से चुटकी लेते रहे और चुनाव से इतर राजनीति में सबके साथ उनके रिश्ते अच्छे रहे. राजनाथ सिंह आक्रामकता नहीं अपने अन्दाज में सियासी विरोधियों पर वार के लिए जाने जाते हैं.

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