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नालंदा के बाद लौटेगा विक्रमशिला विश्वविद्यालय का गौरव, कमेटी गठित

शिक्षा जगत में प्राचीन काल में अपनी वैश्विक पहचान रखने वाले नालंदा विश्वविद्यालय को एक बार फिर जीवंत करने में मिली सफलता के बाद बिहार सरकार ने राज्य में ही अस्तित्व में रहे विक्रमशिला विश्वविद्यालय के भी पुनर्निमाण की तैयारी शुरू कर दी है.

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विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अवशेष
विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अवशेष

शिक्षा जगत में प्राचीन काल में अपनी वैश्विक पहचान रखने वाले नालंदा विश्वविद्यालय को एक बार फिर जीवंत करने में मिली सफलता के बाद बिहार सरकार ने राज्य में ही अस्तित्व में रहे विक्रमशिला विश्वविद्यालय के भी पुनर्निमाण की तैयारी शुरू कर दी है.

बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने शुक्रवार को विक्रमशिला विश्वविद्यालय को भी जीवित करने की घोषणा की. मुख्यमंत्री ने भागलपुर में कहा, 'नालंदा की तर्ज पर विक्रमशिला को भी विकसित किया जाएगा. विक्रमशिला प्राचीन काल में मशहूर विश्वविद्यालय था. इसका गौरव फिर से वापस लाया जाएगा'. मुख्यमंत्री ने इसके लिए एक समिति बनाने की बात कही है जिसकी रिपोर्ट मिलने के बाद काम शुरू किया जाएगा.

इससे पहले भी ऐसी कोशिश हो चुकी है. साल 2009 में राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) द्वारा दी गई राशि राष्ट्रीय संस्कृति निधि (एनसीएफ) के तहत विक्रमशिला के संवर्धन और संरक्षण के लिए कभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ समझौता हुआ था. तब कई चरणों तक काम भी हुए थे.

भागलपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पालवंश के राजा धर्मपाल ने 775-800 ईस्वी में की थी. इस विश्वविद्यालय के प्रतिभाशाली छात्रों की सूची काफी लंबी है. इतिहास के अनुसार विक्रमशिला से अनेक विद्वान तिब्बत गए थे और वहां उन्होंने कई ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया था.

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इस विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या की पूरी जानकारी तो नहीं मिलती है लेकिन यहां 3000 अध्यापक थे. यहां सभागार के जो खंडहर मिले हैं उनसे पता चलता है कि सभागार में 8000 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी. विदेशी छात्रों में तिब्बती छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा थी. एक छात्रावास केवल तिब्बती छात्रों के लिया था. इस विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिभाशाली भिक्षु दीपांकर को माना जाता है जिन्होंने करीब 200 पुस्तकों की रचना की.

विक्रमशिला के छात्रावास में 208 कमरे थे. इनमें से 62 कमरों को खोजा गया है. यह विश्वविद्यालय अपने समय में व्याकरण, तर्कशास्त्र, औषधि, मानव शरीर रचना विज्ञान, शब्द ज्ञान, चित्रकला समेत अनेक विधाओं का एक अंतर्राष्ट्रीय केंद्र था. यहां तंत्र की शिक्षा भी दी जाती थी जिस कारण इसका महत्व और ज्यादा था.

इतिहास की पुस्तक 'तबकाते नासिरी' के मुताबिक 12वीं सदी में मुगलकाल में बख्तियार खिलजी ने इस महाविहार को दुर्ग समझकर हमला किया जिसमें महाविहार पूरी तरह तहस-नहस हो गया था.

उल्लेखनीय है कि पांचवीं सदी में पूरे विश्व में शिक्षा और ज्ञान के केंद्र के रूप में परचम लहराने वाले बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में करीब 800 साल बाद एक बार फिर पढ़ाई शुरू हुई है. साल 2006 में इस प्राचीन विश्वविद्यालय के पुनर्निमाण की परिकल्पना की गई थी.

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