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एजुकेशन

पिता भाई को खोकर भी नहीं टूटा हौसला, पहली कोशिश में IAS बना ये शख्स

पिता भाई को खोकर भी नहीं टूटा हौसला, पहली कोशिश में IAS बना ये शख्स
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UPSC में 26वीं रैंक हासिल करके आईएएस बने हिमांशु नागपाल की कहानी हर किसी के लिए एक सीख है. कैसे पिता और जवान भाई की मौत का सदमा झेलने के बावजूद हिमांशु का हौसला नहीं टूटा और वो तैयारी करते रहे. हरियाणा के एक छोटे से गांव के इस लड़के ने एक दुखी पल में तय किया कि अब उसके सामने आईएएस के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा. अपने चाचा से मिले हौसले से एक ही अटेंप्ट में 26वीं रैंक हासिल कर ली. आइए जानें, उनके इस सफर के बारे में.

( अपने चाचा पंकज नागपाल के साथ हिमांशु, फोटो फेसबुक से)
पिता भाई को खोकर भी नहीं टूटा हौसला, पहली कोशिश में IAS बना ये शख्स
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एक मोटिवेशनल वीडियो इंटरव्यू में हिमांशु ने बताया कि कैसे उनके पिता उनका हंसराज कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन कराने आए थे. वहां के हॉस्टल इंटरव्यू बोर्ड में लगे नाम देखकर कहा था कि हिमांशु एक दिन मैं तुम्हारा नाम यहां देखना चाहता हूं. लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था. उसी दिन घर लौटते वक्त पिता की मौत हो गई.
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हिमांशु कहते हैं कि मुश्क‍िलें हर किसी के लाइफ में है. लेकिन, इन मुश्किलों से सीखना बहुत जरूरी है. वो आगे बताते हैं कि पिता का मेरी लाइफ से जाना बहुत बड़ा चैलेंज था. उधर दूसरी तरफ कॉलेज में एक नया माहौल था. कॉलेज के फ्रेंड्स और टीचर्स ने पर्सनली बुलाकर समझाया कि तुम्हारे लिए मेहनत बहुत जरूरी है. उस समय टीचर्स, मम्मी, बड़े भाई और अंकल ने मुझे समझाया कि जिंदगी खत्म नहीं हुई है. आपको अपने अंदर ज्यादा कॉन्फीडेंस लाना पड़ेगा.
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कोई गांव का लड़का न कह दे

हिमांशु बताते हैं कि मैं हरियाणा के एक गांव भूना में पैदा हुआ. गांव से ही उन्होंने पांचवीं तक हिंदी मीडियम से पढ़ाई की, उन्हें अंग्रेजी का जरा भी ज्ञान नहीं था. फिर हांसी शहर से 12वीं की पढ़ाई की. अब गांव से कॉलेज आया था तो कई मिथ्स थे. मुझे अच्छे से अंग्रजी शब्दों का उच्चारण नहीं आता था. कोई बात बोलते हुए भी डरता था कि कोई गांव का बच्चा न कह दे.
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ऐसा रहा सफर

वो कहते हैं कि कॉलेज के पहले दो साल मैंने अपने कैंपस में ये सीखा कि सिविल सर्वेंट कैसे बना जाता है. कई बार खुद को शर्म भी आती थी, लेकिन कभी सीखना नहीं छोड़ा. वो एक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि मैंने जब क्लास में पूछ दिया कि सर एमपी और एमएलए में क्या फर्क है तो लोग हंसने लगे थे. लेकिन, इंग्लिश सीखी और सीखने का क्रम जारी रखा. दो साल में लगने लगा था कि वो हिंमाशु नहीं है जो गांव से आया था.
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मुझे लगा था कि ग्रेजुएशन छोड़नी पड़गी

लेकिन, उसी दौर में लाइफ ने दूसरा मोड़ ले लिया. जब मेरे भाई की अचानक मौत की खबर मिली. उस वक्त तो जैसे मैं खत्म हो चुका था, मैंने सोच लिया था कि अब शायद घर लौटना पड़ सकता है. मुझे मां के पास जाना होगा, मेरी पढ़ाई अब छूट जाएगी.

Photo: via Facebook
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फिर चाचा बने सहारा

उस दौरान उनके चाचा पंकज नागपाल ने उन्हें सहारा दिया. हिमांशु ने फेसबुक पर उनके साथ अपनी फोटो साझा करते हुए लिखा है कि कौन कहता है कि जो बच्चे को जन्म देता है सिर्फ वही पिता होता है. मेरे चाचा मेरे लिए पिता से बढ़कर हैं. कैसे भी हालात रहे हों, वो एक मजबूत पिलर की तरह मेरे साथ खड़े रहे. वो आगे लिखते हैं कि इस जन्म में मेरे दो पिता थे, एक ने मुझे जन्म दिया तो दूसरे ने जीवन.

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