एक ऐसी महिला जिसे पढ़ना-लिखना न आता हो. 17 साल की उम्र में शादी हो जाती है. शादी के बाद वह एक ऐसे परिवार में जाती है, जहां महिलाओं का घर से बाहर निकलना या दहलीज को पार करना अच्छा नहीं माना जाता है. महिलाओं को घुंघट में रहने की हिदायत देने के साथ ही उन्हें ये सिखाया जाता है कि घूंघट के बाहर उनका कोई संसार नहीं है. ऐसी स्थितियों में न सिर्फ खुद के पैरों पर खड़ा होना बल्कि हजारों महिलाओं को रोजगार देना काबिले तारीफ है. हम बात कर रहे हैं गुजरात के पाटन जिले के सांतलपुर के छोटे से गांव बकुत्रा की रहने वाली गौरीबेन की.
गौरीबेन ने 17 साल की उम्र में जो बदलाल लाने का सपना देखा था आज उसे सच करके दिखाया है. सपना एक बदलाव लाने का, सपना अपने पैरों पर खड़े होने का और सपना सभी महिलाओं के लिए कुछ करने का. तमाम चुनौतियों के बाद वो सपना पूरा हुआ और हस्तकला के क्षेत्र में योगदान के लिए 2012 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला.
महज 17 साल की उम्र में हुई थी शादी
भुज जिले के छोटे से गांव माखेल में साल 1963 में जन्म लेने वाली गौरीबेन अपनी शादी के बाद पाटन जिले के बकुत्रा गांव में आईं. इस छोटे से गांव में हर साल पीने की पानी की समस्या के कारण कई परिवार गांव को छोड़कर शहरों की और पलायन करने लगे. भुज जिले के छोटे से गांव माखेल में साल 1963 में जन्म लेने वाली गौरीबेन अपनी शादी के बाद पाटन जिले के बकुत्रा गांव में आईं. जब गौरीबेन 17 साल की थी तभी उनकी शादी हो चुकी थी. उनकी शादी एक ऐसे समाज और परिवार में हुई थी जहां पर लड़कियों का बाहर जाना अच्छा नहीं माना जाता था. महिलाओं को गांव से बाहर जाने तक की इजाजत नहीं थी.
जब गांव छोड़कर जा रहे थे लोग...
इस छोटे से गांव में हर साल पीने की पानी की समस्या के कारण कई परिवार गांव को छोड़कर शहरों की और पलायन करने लगे. और तो और चूंकि पूरा गांव कच्छ में बसता इसीलिए गांवों में पानी की कमी के कारण खेती की बड़ी समस्याएं होती थी. इसलिए गांव में लोगों के पास कमाई का कोई जरिया नहीं था. गौरीबेन का भी परिवार इसी समस्या से जूझ रहा था. फिर उन्होंने तय किया कि वे इस गांव की तस्वीर बदलेगी और इसकी शुरुआत वे खुद से करेंगी. गौरीबेन ने हस्तकला को अपना रोजगार बनाया और धीरे धीरे महिलाओं को अपने साथ जोड़ती गई.
परिवार ही नहीं, पूरा गांव हो गया था खिलाफ
फिर अहमदाबाद की एक सेवा संस्थान से जुड़ गईं. जिसके माध्यम से महिलाओं को कुछ आमदनी भी हासिल होने लगी. गौरीबेन ने राज्य के अलग-अलग जगहों पर हस्तकला से बनाई गई चीजों का एक्जिबिशन में स्टॉल लगाना शुरू किया. लेकिन उनका यह सफर आसान नहीं था. गांव से बाहर शहर की ओर रुख करने के बाद उनका पूरा परिवार उनके खिलाफ हो गया था. उनके पति ने उन्हें जाने से मना कर दिया. उनकी मां ने उन्हें यह तक कह दिया कि यदि वे गांव से बाहर दिल्ली जाती है तो उनके लिए घर के दरवाजे हमेशा हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे. गौरीबेन बताती है कि वह एक ऐसा समय था जब परिवार ही नहीं बल्कि पूरा गांव उनके खिलाफ हो चुका था.

17000 महिलाओं को दिया रोजगार
बावजूद इसके गौरीबेन रुकी नहीं और उन्होंने अपना सफर जारी रखा. वे कहती हैं कि कई लोगों ने उन्हें डराने और धमकाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने अपने काम पर भरोसा किया और आज इसलिए वे इस मुकाम तक पहुंच पाई हैं. गौरीबेन ने केवल 10 महिलाओं के साथ शुरुआत की थी लेकिन आज उनके साथ लगभग 17000 से भी ज्यादा महिलाएं जुड़ चुकी हैं.
22 देशों में फैला व्यापार, मिल चुका है राष्ट्रपति पुरस्कार
साल 2012 में गौरीबेन को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने बेस्ट हस्तकला के अवॉर्ड से सम्मानित किया. धीरे-धीरे उनके प्रॉडक्ट्स ने विदेशों में भी जगह बना ली. उन्हें अलग-अलग जगह बुलाया जाने लगा. गौरीबेन कई बार अमेरिका का दौरा भी कर चुकी हैं. उसके बाद सिडनी , साऊथ अफ्रीका और इटली जैसे देशो में भी अपनी हस्तकला को प्रचलित किया है. गौरीबेन ने कहा कि अमेरिका में हमारी हर प्रकार की बनाई गई चीजें लोग पसंद करते हैं. वहीं, साऊथ अफ्रीका में ज्यादातर लोग काले रंग और लाल रंग से बनी चीजे पसंद करते हैं.

अहमदाबाद और मुंबई की कई कंपनियां उनके प्रॉडक्ट्स की देश-विदेशो में ऑनलाइन बिक्री कर रही हैं. गौरीबेन के फैन विदेशों में भी हैं. कई बड़े लोग गौरीबेन से मिले हैं जिनमें यूएन के प्रेजिडेंट के कोर्डिनेटर शोम्बी शार्प, यूएन की चीफ राधिका कॉल बत्रा और उनके स्टाफ, UNEP भारत के मुखिया अतुल बगई और UNEP के एडवाइजर राहुल अग्निहोत्री आदि शामिल हैं. पाटन की हस्तकला की डिमांड बॉलीवुड में भी है. यही नहीं इनकी बनाई गई चीजें ऑनलाइन भी बिकती हैं.