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Terror training: आतंकियों की प्रयोगशाला बना अफगानिस्तान, ऐसे बनाए जाते हैं मानव बम

Terror training ट्रेनिंग के दौरान ही आतंकियों के दिलो-दिमाग में मजहब के नाम पर नफरत पैदा की जाती है. जो जेहादियों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है. इसके बाद जेहादी किसी को भी मारने के लिए तैयार हो जाते हैं.

अफगानिस्तान में कई आतंकी ट्रैनिंग कैंप चल रहे हैं (सांकेतिक चित्र) अफगानिस्तान में कई आतंकी ट्रैनिंग कैंप चल रहे हैं (सांकेतिक चित्र)

पिछले एक अर्से से अफगानिस्तान आतंकियों की प्रयोगशाला बना हुआ है. यहां एक नहीं बल्कि कई आतंकी संगठन काम कर रहे हैं. जो अपने-अपने दबदबे को कायम रखने के लिए ना सिर्फ बम बारूद से दहशत फैला रहे हैं बल्कि मानव बम भी तैयार कर रहे हैं. इसके लिए आतंकी संगठन बाकायदा ट्रेनिंग सेंटर बनाते हैं. जहां इसकी ट्रेनिंग होती है. अफगानिस्तान में ऐसी ही कई आतंक की फैक्ट्री तालिबान ने भी बना रखी हैं.

तालिबान जेहादी बनाने की फैक्ट्री चलाता है. जहां चलता है आतंक का कारखाना और बनते हैं सुसाइड बॉम्बर. तालिबान के नापाक आतंकी मंसूबों को अंजाम देते हैं, उसके जेहादी लड़ाके. जो तालिबान की सबसे बड़ी ताकत हैं. ये जेहादी लड़ाके अपने आका के फरमान पर कुछ भी कर सकते हैं. जान ले भी सकते हैं तो जान दे भी सकते हैं. जी हां, ये होते हैं जेहादी. लेकिन सब़से बड़ा सवाल ये है कि आखिर इन जेहादियों की नसों में नफरत का बारुद इस कदर कैसे भरा जाता हैं. आखिर किस तरह इन्हे मरने-मारने के लिए तैयार किया जाता है. हम आपको बताएंगे जेहादियों की ट्रेनिंग का पूरा सच.

जेहादी लेते हैं मौत की ट्रेनिंग

इन लड़ाकों को चार हिस्सो में आतंक का पाठ पढ़ाया जाता है. जेहादियों या आतंकियों को चार हिस्सों में ट्रेनिंग दी जाती है. ये चारों चरण बेहद खतरनाक होतें हैं.

पहला सबक- अल राद

जिसकी मियाद तीन महीने की होती है. इस दौरान सोलह से इक्कीस साल की उम्र के रंगरूटों को शारीरिक और मानसिक तौर पर तैयार किया जाता है. इस बीच लड़ाकों को शादी करने की इजाजत नहीं होती. इस ट्रेनिंग के लिये ये भी जरूरी है कि चुने गये लड़ाकों को किसी भी तरह की बीमारी ना हो. उन्हें पढ़ना लिखना आता हो और वो जिहाद के लिये पूरी तरह तैयार हों.

दूसरा सबक- गुरिल्ला प्रशिक्षण

ये ट्रेनिंग छह महीने लंबी होती है. इस दौरान जेहाद के लिये समर्पित लड़ाकों को हथियार चलाना सिखाया जाता है. इस ट्रेनिंग से पहले सभी लड़ाकों को अपने हाथों से वसीयतनामा तैयार कर अपने कमांडर को देना होता है. जिसमें वो अपनी जिंदगी जिहाद के नाम कर देते हैं.

तीसरा सबक- जिंदला

ये ट्रेनिंग तीन महीने तक चलती है. इसमें आतंकियों को खासतौर पर बम बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है. ट्रेनिंग के इसी हिस्से में आतंकियों को भारी हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है. उन्हें कई तरह के घातक छोटे और बड़े बम बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है.

चौथा सबक- दोश्का

ये प्रशिक्षण एक हफ्ते से लेकर दस दिन तक चलता है. इस दौरान लड़ाकों को हाथ से चलने वाले छोटे हथियारों, जैसे पिस्तौल और चाकू चलाने की खास ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें कई तरह के गुप्त और छोटे हथियारों को चलाने में महारात दी जाती है.

वैसे तो ये चारों सबक सीखने के बाद ही जिहादी ट्रेनिंग पूरी हो जाती है. इस ट्रेनिंग के दौरान ही आतंकियों के दिलो-दिमाग में मजहब के नाम पर नफरत पैदा करने का गंदा खेल भी चलता रहता हैं. जो जेहादियों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है. इसके बाद जेहादी किसी को भी मारने के लिए तैयार हो जाते हैं. पर असली ट्रेनिंग तो अभी बाकी ही रहती है.

ऐसे बनाए जाते हैं मानव बम

दरअसल, इन आतंकियों को किसी भी वक्त जान देने के लिए तैयार किया जाता है. और वो बन जाते हैं मानव बम. जी हां मानव बम, जेहादियों का सबसे खतरनाक हथियार. जिसमें खुद तो उनकी जान जाती ही है, साथ ही वो अपने साथ कई जिंदगियों को हमेशा के लिए खामोश कर देते हैं. इस ट्रेनिंग के लिए बकायदा खास क्लास लगाई जाती है. जिसमें मानव बम कैसे और किन हालत में बनना है, इस पर खास जोर दिया जाता है. इन सारी ट्रेनिंग के बाद अब सभी लड़ाके जेहादी बन जाते हैं ओर शुरु हो जाता है दुनियाभर में आतंक फैलाने का कारोबार.

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