क्या डेक्सामेथासोन कोविड-19 की मैजिक दवा है? सस्ते-सुलभ हल्के स्टेरॉयड डेक्सामेथासोन को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ड्रग ट्रायल की सफल खोज माना जा रहा है. साथ ही इसे ‘बड़ी उपलब्धि’ कहा जा रहा है. इससे कोविड-19 मौतों को 30% तक कम किया जा सकता है. हालांकि ये पूरा इलाज नहीं है. ब्रिटेन ने इसके निर्यात पर बैन लगा दिया है.
क्लिनिकल ट्रायल करने वाले यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने बधाई दी है. जॉनसन ने कहा, 'ठीक यहां ब्रिटेन में हमारे वैज्ञानिकों की शानदार टीम ने पहले ठोस क्लिनिकल ट्रायल को अंजाम दिया, जो दुनिया में कहीं भी अपनी तरह का पहला है. हमने धारा को पलटा है, लेकिन अभी इसे मात नहीं दी है.'
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ट्रायल अस्पतालों के 2,000 मरीजों पर किया गया. ट्रायल के प्रमुख शोधकर्ता प्रो मार्टिन लैंड्रे ने बताया, 'वेंटिलेटर्स पर मौजूद हर 8 में से एक मरीज को बचाया जा सकता था. जबकि ऑक्सीजन सपोर्ट वाले 25 में से एक मरीज ने रिकवरी के पॉजिटिव संकेत दिए.'
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स के नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट के क्लिनिकल प्रमुख डॉ अमित गुप्ता ने डेक्सामेथासोन को ‘अहम उपलब्धि’ कहा. उन्होंने कहा कि 'अगर मेडिकल जगत को इसका पहले पता चल जाता तो कई जानों को बचाया जा सकता था.'
डॉ गुप्ता ने साथ ही कहा, 'यह ध्यान रखना अहम है कि अगर रोगी को ऑक्सीजन की जरूरत नहीं है तो डेक्सामेथासोन का कोई फायदा नहीं है. ऐसे ग्रुप में इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.'
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यह विशेष तौर पर समझने वाली बात है. डेक्सामेथासोन की पहचान सूजन घटाने के तौर पर है. इसलिए इसे रयूमेटायड अर्थराइटिस (गठिया), आंत की सूजन (अल्सरेटिव कोलाइटिस) और एलर्जी में उपयोगी माना जाता है. हालांकि इसके साइट इफेक्ट भी हैं.
डॉ गुप्ता ने कहा, 'साइड इफेक्ट्स में ब्लड शुगर में वृद्धि (मधुमेह का बिगड़ना), वजन बढ़ना और घाव भरने में देर लगना शामिल है. इसलिए, डेक्सामेथासोन का सख्त सुपरविजन में विशिष्ट परिस्थितियों में ही इस्तेमाल होना चाहिए.'
कैसे काम करती है दवा?
जब कोई भी वायरस मनुष्यों में संक्रमण का कारण बनता है तो शरीर का इम्यून सिस्टम उससे लड़ता है. कभी-कभी ये इम्यून सिस्टम ओवर एक्टिव होकर अपनी ही सेल्स (कोशिकाओं) को मारना शुरू कर देता है. इससे टिश्यूज (उतकों) को व्यापक नुकसान पहुंचता है. मेडिकली इसे ‘साइटोकिन स्ट्रॉम’ कहा जाता है.
ऐसा ही कोरोना वायरस की ओर से शरीर को संक्रमित करने पर भी होता है. बॉडी टिश्यूज के संक्रमित होने पर वायरस साधारण तौर पर फेफड़ों में संक्रमण (निमोनिया) करता है. इसके बाद, इम्यून सिस्टम ओवर ड्राइव होता है. कोविड-19 में मौतों के लिए इन्हीं दोनों प्रक्रियाओं को जिम्मेदार माना जाता है. डेक्सामेथासोन इन दोनों ही प्रक्रियाओं में उपयोगी हो सकती है. लेकिन मुख्य तौर पर ‘साइटोकिन स्ट्रॉम’ में ये अधिक कारगर है.
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कैसे दी जाती है दवा?
अगर रोगी वेंटिलेटर पर है तो डेक्सामेथासोन को नसों के जरिए दिया जाता है. लेकिन कम गंभीर रोगियों को इसे टेबलेट के तौर पर भी दिया जा सकता है.
ग्लोबल हेल्थ फाउंडेशन ‘वेलकम’ में थेरेप्यूटिक्स एक्सेलरेटर प्रमुख निक कैम्मेक ने कहा, 'डेक्सामेथासोन को अब रोल्ड आउट किया जाना चाहिए और दुनिया में हजारों गंभीर रोगियों तक इसकी पहुंच बनाई जानी चाहिए. यह बेहद सस्ती है, बनाने में आसान है. इसके उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है. इसकी केवल एक छोटी खुराक की जरूरत होती है. कोविड-19 के खिलाफ किसी भी सफल इलाज को दुनिया में हर किसी को उपलब्ध कराया जाना चाहिए, बिना ये देखे कि उसकी भुगतान क्षमता कितनी है.' वेलकम फाउंडेशन कोविड के इलाज के लिए मास्टरकार्ड और मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ मिल कर काम कर रही है.
डेक्सामेथासोन निर्यात पर ब्रिटेन ने लगाया बैन
नेशनल हेल्थ सर्विस के पास स्टॉक में दवा के 2,00,000 कोर्सेज हैं लेकिन ब्रिटेन से दूसरे देशों को इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा हुआ है. इस वर्ष अप्रैल में दवा के टैबलेट और कैप्सूल के रूप में निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और लिक्विड फॉर्म को 16 जून, 2020 से बैन कर दिया गया है.
प्रधानमंत्री जॉनसन से जब इस बैन पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि यह 'मुझे अजीब लगता है.' साथ ही ये भी कहा कि वह 'इस पर गौर' करेंगे. हालांकि बाद में स्वास्थ्य विभाग ने प्रतिबंध की पुष्टि की.
ब्रीफिंग के दौरान मेडिकल टीम ने पीएम के बचाव में आकर कहा. 'यह एक व्यापक रूप से उपलब्ध दवा है जिसे जटिल निर्माण की आवश्यकता नहीं है. यह सस्ती है और दुनिया भर के मेडिक्स इसे अपने कपबोर्ड्स में पहले से ही पा सकते हैं. आखिरी बात, इसे तुरंत इस्तेमाल में लिया जा सकता है.'
भारत जैसे देशों के लिए टाइमिंग अच्छी
ब्रिटेन में इस वक्त कोविड-19 से जुड़ी मौतों में गिरावट आ रही है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दवा के बारे में पहले सही से पता चल जाता तो 5,000 से अधिक जानें बचाई जा सकती थीं. ये घटनाक्रम भारत जैसे उन देशों के लिए अहम हो सकता है जहां महामारी का प्रकोप बढ़ रहा है.
डॉ गुप्ता ने कहा, 'यूरोप और अमेरिका में महामारी धीमी हो गई है, लेकिन लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया में केसों की संख्या बढ़ रही है. इन देशों के लिए ये स्टडी अहम मोड़ पर सामने आई है. क्योंकि ये देश सीमित संसाधनों के साथ अस्पतालों में बढ़ते एडमिशन के साथ जूझ रहे हैं.'
अन्य दवा विकल्प?
कोविड-19 के इलाज के कुछ क्षेत्रों और मेडिक्स की ओर से मलेरिया ड्रग हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन का इस्तेमाल किया गया. ट्रायल के लिए भी इसे देखा गया. लेकिन आखिर में इसे कोविड इलाज के लिए अयोग्य करार दिया गया क्योंकि इससे मौतें और दिल की समस्याएं बढ़ते देखी गईं.
अमेरिका के नेतृत्व वाले क्लिनिकल ट्रायल में रेमडेसिवीर ड्रग को रिकवरी टाइम को कम करने में कुछ उपयोगी पाया गया. इबोला के इलाज में काम आने वाली इस दवा का शुरू में 2009 में हेपेटाइटिस सी के इलाज के लिए विकसित किया गया था, ट्रायल में कोविड मरीजों में रिकवरी टाइम तो 15 से 11 दिन पर आया, लेकिन जान बचाने को लेकर इसकी प्रभावकारिता अभी साफ नहीं है.
डेक्सामेथासोन निश्चित रूप से कोविड-19 के गंभीर मरीजों का जीवन बचाने के लिए लिए एक रास्ता है. खास तौर पर उन देशों में जहां संक्रमण बढ़ रहा है, इस ट्रायल के नतीजों का और बढ़िया समय कोई नहीं हो सकता.