कोरोना वायरस ने शहरों और देशों को जब लॉकडाउन में भेजा तो अचानक हुए बदलाव ने मदर नेचर (प्रकृति) को खुल कर सांस लेने का मौका दिया. पंजाब के मैदानी इलाकों से हिमालय पर्वत माला दिखाई देने लगीं. नई दिल्ली के कुख्यात स्मॉग के छंटने से नीला आसमान फिर दिखाई देने लगा.
शटडाउन्स के निराशाजनक माहौल में सिर्फ साफ पर्यावरण ही अकेली वजह था जो आनंद दे सके. लेकिन जिस तरह उत्सव थोड़े समय के लिए ही होते हैं वैसे ही ये महामारी इकोलॉजी (पारिस्थितिकी) के लिए खुद भी खतरा पेश कर रही है.
वर्ल्ड वाइड फंड (WWF) फॉर नेचर की एक रिपोर्ट में ये अनुमान लगाया गया है कि मास्क और ग्लव्स जैसा कितना कचरा आखिरकार समुद्र में जगह पाएगा. WWF की रिपोर्ट में कहा गया है, "अगर सिर्फ 1 प्रतिशत मास्क भी गलत तरीके से डिस्पोज़ किए गए और कुदरती स्रोतों में फेंके गए तो नतीजन एक करोड़ (10 मिलियन) मास्क हर महीने पर्यावरण में खप जाएंगे.”
WWF ने चेताया, “मिसाल के लिए इटली ने अपने लॉकडाउन फेज को हटाने के तुरंत बाद मई के महीने के लिए 1 अरब मास्क और 50 करोड़ ग्लव्स की जरूरत का अनुमान जताया.”
यह समझते हुए कि हर मास्क का वजन लगभग 4 ग्राम है, इससे प्रकृति में करीब 40,000 किलो से अधिक प्लास्टिक फैलेगा. रिपोर्ट के मुताबिक ये एक खतरनाक स्थिति है और ऐसा होने से रोका जाना चाहिए.
असर पहले से ही दिखने लगे
गैरी स्टोक्स एक पेशेवर फ़ोटोग्राफ़र, डाइविंग इंस्ट्रक्टर और OceansAsia नाम के NGO के सह-संस्थापक हैं, ये NGO वन्यजीव अपराधों पर शोध और जांच करता है. 29 फरवरी को गैरी ने हांगकांग के समुद्र तटों पर प्लास्टिक कचरे की स्थिति को डॉक्यूमेंट करते हुए एक फेसबुक पोस्ट लिखी.

उन्होंने खुलासा किया "टीम ने समुद्र तट पर एक नई बात देखी और वो थी सर्जिकल मास्क का आगमन. हाइजिन को लेकर जागरूकता के स्पष्ट अभाव के अलावा हमारे लिए दिलचस्प बात टाइमिंग को देखना रहा. इतने बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव (हर कोई मास्क पहन रहा है) के साथ, इसका असर समुद्र तटों तक पहुंचने में छह हफ्ते लगे."
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उन्होंने आगे कहा, "Covid-19 वायरस के आने से पहले भी सर्जिकल मास्क थे, लेकिन अब की तुलना में बहुत कम संख्या में. इतने बड़े पैमाने पर नहीं जितने कि हमने अब देखे. हम पांच महीने से हर महीने में दो बार इस समुद्र तट पर आते रहे हैं."
यूरोप में भी स्थिति यही है. फ्रांस के एक्टिविस्ट लॉरेंट लोम्बार्ड ने फ्रेंच रिवेरा पर कान्स के पास एंटिबेस के पानी में नीचे वीडियो शूट किया.
उन्होंने भी फेसबुक पोस्ट पर पानी में गोताखोरी के दौरान जो देखा, उसे डॉक्यूमेंट किया. उन्होंने कई जोड़ी लेटेक्स दस्ताने, सर्जिकल मास्क और अन्य फेस कवरिंग्स को कैप्चर किया.
लॉरेंट ने लिखा "यह जानते हुए कि 2 अरब से अधिक डिस्पोजेबल मास्क का ऑर्डर दिया गया है, जल्द ही भूमध्य सागर के पानी में जेलीफ़िश की तुलना में अधिक मास्क होंगे."

जब से Covid-19 वायरस ने चीन से निकल कर और सभी महाद्वीपों में तबाही मचाना शुरू किया, सरकारों ने अपने फ्रंटलाइन वर्कर्स, डॉक्टरों और अन्य अहम स्टाफ को सुरक्षित रखने के लिए लाखों की संख्या में पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट्स (PPEs) हासिल करने के लिए हाथ पैर मारना शुरू कर दिया.
अभी भी कई देशों में PPEs की किल्लत है और एजेंसियां उनके दोबारा इस्तेमाल के लिए अपना बेहतर कर रही हैं. साथ ही जो भी उनके पास संसाधन हैं, उन्हीं से काम चला रहे हैं.
PPEs का निस्तारण
बाजार में उपलब्ध सिंगल-यूज़ फेस मास्क अधिकतर नॉन-बायोडिग्रेडेबल हैं. इसका मतलब है कि वे पर्यावरण के अनुकूल नहीं हैं. सर्जिकल फेस मास्क गैर-बुने हुए कपड़े से बनाए जाते हैं. उन्हें बनाने के लिए सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली सामग्री पॉलीप्रोपाइलीन (प्लास्टिक की एक फॉर्म) है. क्योंकि इससे बेहतर बैक्टीरिया फिल्ट्रेशन और हवा की भेद्यता होती है. साथ ही ये बुने हुए कपड़े की तुलना में कम फिसलन वाला होता है.
हमारे महासागरों और भराव क्षेत्रों (लैंडफिल्स) को लाखों-लाखों सिंगल यूज़ मास्क और ग्लव्स से चोक होने का गंभीर खतरा है.
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भारत में तमिलनाडु जैसे कई राज्यों ने सिंगल यूज प्लास्टिक्स (प्लास्टिक बैग्स) का इस्तेमाल बंद करने के लिए सख्त उपाय किए हुए हैं. ये प्रतिबंध रेस्तरां, किराना दुकानों से लेकर शॉपिंग मॉल्स तक पर लागू है.
अमेरिका और ब्रिटेन, जैसे देश पहले से ही देख रहे हैं कि लोग इस्तेमाल किए गए ग्लव्स और मास्क को सड़कों और पार्कों में कैसे छोड़ रहे हैं. अक्सर, बारिश इन्हें सीवर्स तक ले जाती है, वहां से ये नदियों जैसे पानी के स्रोतों और आखिरकार समुद्र में पहुंचते हैं और जीवनकाल की समस्या बन जाते हैं.
दुनियाभर के लैंडफिल्स में पड़े बिना रिसाइकिल प्लास्टिक पर की गई एक स्टडी के मुताबिक 2015 में इसका स्तर 4,977 मीट्रिक टन आंका गया. वर्ष 2050 तक यह मात्रा 12,000 मीट्रिक टन तक पहुंच जाने का अनुमान है.
एक अन्य स्टडी में भविष्यवाणी की गई है कि प्लास्टिक के प्रोसेसिंग और निर्माण की प्रक्रिया से जो उत्सर्जन होगा वो कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की 15 प्रतिशत हिस्सेदारी ले लेगा.
अन्य प्लास्टिक कचरे के उलट मास्क और ग्लव्स का आकार और बनावट उन्हें समुद्र के नीचे मछलियों और समुद्री कछुओं के लिए संभावित खाद्य कणों जैसा बना सकता है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि हर साल लगभग 13 मिलियन टन प्लास्टिक कचरे को समुद्र में फेंक दिया जाता है.
दो दशक पहले एक पनडुब्बी मारियाना ट्रेंच में उतरी थी. ये समुद्र में सबसे गहरा हिस्सा था. पश्चिमी प्रशांत महासागर के मध्य में, 10,988 मीटर की गहराई पर वहां उसने एक प्लास्टिक बैग को पाया. वैज्ञानिक आज तक मानते हैं कि यह दुनिया का सबसे गहरा ज्ञात प्लास्टिक कचरा है और इसे विघटित होने में 400 से 1,000 साल तक लगेंगे.
मेडिकल कचरे की हैंडलिंग
वुहान में महामारी के शिखर के दौरान मेडिकल कचरे का फ्लो बहुत बढ़ गया, जिसमें खास तौर पर PPEs का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है. अस्पतालों के अलावा इस मेडिकल कचरे को डिस्पोज करने के लिए अलग से प्लांट बनाए गए.
ऐसा कहा जाता है कि शिखर पर हर दिन निकलने वाला मेडिकल कचरा लगभग 225 मीट्रिक टन था. अहम मुद्दा है कि सामान्य दिनों के मेडिकल कचरे की तुलना में इस महामारी के दौरान PPEs सिर्फ अस्पतालों के आसपास ही नहीं जगह-जगह फैले हुए हैं.
मेडिकल कचरे की हैंडलिंग कुछ क्षेत्रों के बाहर निर्धारित नहीं की जाती है, यह उन नागरिक प्रशासन कर्मचारियों के लिए एक बड़ी समस्या है, जो शहरों और गांवों में कचरा प्रबंधन को संभालते हैं.
ग्लव्स और मास्क की तरह PPEs भी डिस्पोज किए जाने के बाद Covid-19 संक्रमण को साथ ले जा सकते हैं. यही कारण है कि यह महामारी से जुड़ी एक बहुत ही अहम प्रक्रिया है. यह जरूरी है कि मेडिकल कचरे से संक्रमण की संभावना से बचने के लिए मेडिकल कचरा प्रबंधन कर्मचारी भी PPEs से लैस हों.
इंग्लैंड में, नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) ने PPEs को संक्रामक और आक्रामक के तौर पर वर्गीकृत किया है. इसलिए उन्हें नियमित रूप से प्लॉन्ट्स में भेजा जाता है जहां उन्हें बहुत ऊंचे तापमान पर जलाया जाता है जिससे कि वायरस का कोई भी हिस्सा हो तो वो नष्ट हो जाए.
दुनियाभर में मेडिकल कचरे को बहुत ऊंचे तापमान पर भस्म करना सबसे अच्छा तरीका है. न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन की एक स्टडी में कहा गया है कि प्लास्टिक पर अन्य सतहों की तुलना में वायरस लंबे वक्त तक बना रहता है. कभी-कभी 3 दिन तक.
सिंगापुर में, नेशनल एनवायरनमेंट एजेंसी का कहना है कि मेडिकल कचरा प्रबंधन कर्मचारियों की तरह ही घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में सार्वजनिक कचरे को डील करने वाले कर्मचारियों को भी PPEs और हैंड सैनिटाइजर्स से संरक्षित किया जाना चाहिए.
भारत में, सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने बायोमेडिकल कचरे को हैंडल करने की अपनी गाइडलाइंस का संशोधित संस्करण जारी किया है. यह मौजूदा महामारी को देखते हुए किया गया है. इनमें बायो कचरे की हैंडलिंग में लगे सभी कर्मचारियों को राज्य सरकारों की ओर से PPEs उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है.
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गाइडलाइंस में बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी उपलब्ध न होने पर कचरे को जमीन में गहराई में दबाने की हिदायत दी गई है. H1N1, स्वाइन फ्लू और निपाह के पिछले अनुभवों ने भारत को इस मुद्दे की गंभीरता को लेकर सजग किया है.
मुमकिन समाधान
सिंगल यूज मास्क के इस्तेमाल को घटाने के लिए दुनियाभर में कई सरकारें आम लोगों को कपड़े से बने दोबारा इस्तेमाल किए जाने वाले मास्क बांट रही हैं.
इस तरह के मास्क का इस्तेमाल बढ़ने से प्लास्टिक मास्क पर कम निर्भरता सुनिश्चित होगी. मौजूदा महामारी का प्रकोप कम होने पर भी दुनियाभर में फेस मास्क का प्रचलन 2022 तक जारी रहेगा. WHO और दुनिया की अन्य मेडिकल बॉडीज की ओर से कपड़े के मास्क को मान्यता देना वास्तव में एक अच्छा कदम है.
साथ ही डॉक्टरों और हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर को विभिन्न लॉजिस्टिक कारणों से सिंगल यूज मास्क का उपयोग जारी रखना होगा. ऐसे में उनके निस्तारण के कारगर उपाय और रिसाइक्लिंग पर उन कंपनियों को खास तौर पर ध्यान देना होगा जो PPEs के निर्माण और रिसाइक्लिंग में शामिल हैं.
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मौजूदा महामारी सिर्फ जीवन शैली और अर्थव्यवस्था में बाधा के लंबे निशान ही नहीं छोड़ सकती, बल्कि इकोलॉजिकल बैलेंस (पर्यावरणीय संतुलन) को भी बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है. अगर इससे उत्पन्न होने वाले मेडिकल कचरे को कारगर ढंग से हैंडल नहीं किया गया तो.WWF इटली अध्यक्ष डोनाटला बियांची का कहना है, "जिस तरह से नागरिकों ने घर पर रहकर संक्रमण रोकने के लिए सरकार के निर्देशों पर जिम्मेदाराना रवैया दिखाया है, वैसे ही अब यह जरूरी है कि वे निजी प्रोटेक्शन डिवाइसेस के प्रबंधन में भी उतनी ही जिम्मेदारी दिखाएं. उनका सही तरह से निस्तारण हो और उनसे प्रकृति को नुकसान न पहुंचने दिया जाए.”
(लेखक सिंगापुर स्थित ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस एनालिस्ट हैं)