अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग खत्म होने को लेकर लंबे समय से बातचीत का दौर जारी है. अमेरिका और इजरायल इस के जरिए ईरान को पूरी तरह तोड़ना चाहते थे. लेकिन अब दोनों पक्ष एक अंतरिम समझौते की तरफ बढ़ रहे हैं.
हालांकि ईरान और अमेरिका के बीच इस संभावित समझौते से युद्ध खत्म नहीं हो सकता. बल्कि इससे युद्ध पर कुछ समय के लिए रोक लग सकती है. इस समझौते को जंग को हमेशा के लिए सुलझाने के बजाय उसे कुछ समय के लिए टालने जैसा माना जा रहा है.
अगर जल्द ही युद्ध खत्म करने के किसी सहमति पत्र पर दस्तखत हो भी जाते हैं, तो भी इसे एक स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता. राजनयिकों, अधिकारियों और क्षेत्रीय विश्लेषकों का कहना है कि ये एक तरह से अस्थायी संघर्षविराम होगा.
होर्मुज खुलवाना असल मकसद
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते का असल मकसद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलना है. इससे वैश्विक वित्तीय बाजारों और खुद ईरान पर बना आर्थिक दबाव कम होगा. लेकिन, इस सौदे में दोनों देशों के बीच के सबसे मुश्किल मुद्दों को भविष्य के लिए टाल दिया जाएगा.
सैन्य कामयाबी मिली, पर रणनीतिक नतीजा शून्य
जानकारों का ये भी मानना है कि इस जंग से ईरान को भारी नुकसान तो हुआ है, लेकिन वो पूरी तरह झुका नहीं है. इस युद्ध में ईरान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है. उसका सैन्य और औद्योगिक ढांचा भी काफी कमजोर हो चुका है. इसके बावजूद, ईरान के भीतर कट्टरपंथी 'रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स' का दबदबा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गया है.
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अमेरिका के पूर्व वरिष्ठ राजनयिक डेनिस रॉस ने इसे लेकर कहा, इस युद्ध में असाधारण रणनीतिक सैन्य सफलताएं तो मिली हैं, लेकिन कोई बुनियादी रणनीतिक फायदा हासिल नहीं हुआ है. अभी तक ऐसी कोई भी फाइल नहीं है जो पूरी तरह बंद हुई हो.
आर्थिक दबाव बना कूटनीति की मुख्य वजह
ऐसे में ये तो साफ कि दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की सबसे बड़ी वजह आर्थिक दबाव है. ये समझौता सिर्फ इस भीषण टकराव को कुछ समय के लिए स्ए टाल सकता है, लेकिन उसे हमेशा के लिए खत्म नहीं कर सकता. अमेरिका और ईरान के बीच की गहरी कड़वाहट और मुख्य विवाद जस के तस बने हुए हैं.
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