श्रीलंका ने दिखाए तेवर, नहीं दी अमेरिकी फाइटर जेट को लैंडिंग की इजाजत, राष्ट्रपति बोले- हम तटस्थ...

ईरान युद्ध के बीच श्रीलंका ने तटस्थता की नीति अपनाते हुए कहा है कि अमेरिका ने दो-दो बार उनसे अपने जंगी जहाजों को लैंड करने की इजाजत मांगी. लेकिन राष्ट्रपति ने साफ मना कर दिया. श्रीलंका ने कहा है कि वो इस जंग में तटस्थ रहेगा.

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श्रीलंका ने ईरान जंग में तटस्थ रहने का फैसला किया है. (File Photo: ITG) श्रीलंका ने ईरान जंग में तटस्थ रहने का फैसला किया है. (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 20 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 4:52 PM IST

श्रीलंका ने अमेरिका को अपनी जमीन पर जंगी जहाजों को उतारने की अनुमति नहीं दी है. ईरान जंग के दौरान अमेरिका अपने दो युद्धक विमानों को श्रीलंका के दक्षिणपूर्व मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर लैंड करना चाहता था. लेकिन राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने अमेरिका को इसकी अनुमति नहीं दी. 

शुक्रवार को श्रीलंका के राष्ट्रपति ने संसद में इस बात की घोषणा की है. संसद में इस फैसले की घोषणा करते हुए राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने  कहा कि जिबूती से अमेरिका के दो युद्धक विमानों ने 4 और 8 मार्च को श्रीलंका में  लैंड करने की अनुमति मांगी थी. लेकिन अमेरिका के ये दोनों अनुरोध अस्वीकार कर दिए गए.

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राष्ट्रपति ने कहा, "कई दबावों के बावजूद हम अपनी तटस्थता बनाए रखना चाहते हैं. हम झुकेंगे नहीं. मध्य-पूर्व का युद्ध चुनौतियां खड़ी करता है, लेकिन तटस्थ बने रहने के लिए हम हर संभव प्रयास करेंगे."

"वे जिबूती के एक बेस से आठ एंटी-शिप मिसाइलों से लैस दो लड़ाकू विमान मट्टाला इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लाना चाहते थे, और हमने साफ मना कर दिया," श्रीलंकाई राष्ट्रपति ने कहा. 

दिसानायके का यह बयान दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर के साथ उनकी मुलाकात के एक दिन बाद आया है.

एक बयान में कहा गया है कि राष्ट्रपति दिसानायके और सर्जियो गोर ने महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा और बंदरगाहों को सुरक्षित बनाने, आपसी लाभकारी व्यापार और वाणिज्यिक संबंधों को मजबूत करने, तथा एक स्वतंत्र, खुला और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देने के अमेरिकी प्रयासों पर चर्चा की. 

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4 मार्च को, अमेरिका ने गाले के पास ईरानी फ्रिगेट 'आइरिस डेना' पर टॉरपीडो से हमला कर दिया। गाले इस द्वीप का दक्षिणी तटीय शहर है। इस हमले में 84 नाविक मारे गए, जबकि 32 को बचा लिया गया।

यह जहाज़ भारत के विशाखापत्तनम से एक नौसैनिक बेड़े की समीक्षा अभ्यास के बाद अपने वतन लौट रहा था।

दो दिन बाद, एक दूसरा ईरानी जहाज़, 'आइरिस बुशेहर', 219 नाविकों के साथ कोलंबो बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति मांगने लगा.

श्रीलंका ने इस जहाज़ को, जो यहाँ बंदरगाह के बाहर लंगर डाले खड़ा था, वहाँ से हटाकर पूर्वी बंदरगाह 'त्रिंकोमाली' भेजने का निर्देश दिया। इन नाविकों में से कुल 204 नाविकों को अब कोलंबो के पास स्थित नौसैनिक सुविधा केंद्र में ठहराया गया है।

ईरान शिप को दी थी पनाह

4 मार्च 2026 को अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के दक्षिणी तट से लगभग 80 किमी दूर अंतरराष्ट्रीय जल में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena पर टॉरपीडो हमला किया. इस हमले में जहाज डूब गया. इस हमले में कम से कम 87 ईरानी नौसैनिक मारे गए, कई लापता हुए और जहाज पर सवार लगभग 180 लोगों में से 32 घायल बचाए गए. 

इस दौरान श्रीलंका ने ईरानी जहाज से मिले डिस्ट्रेस सिग्नल पर तुरंत प्रतिक्रिया दी. श्रीलंकाई नौसेना और वायुसेना ने बड़े पैमाने पर खोज-बचाव अभियान चलाया. वे घटनास्थल पर पहुंचे. इस दौरान श्रीलंका ने 87 शव बरामद किए और 32 घायल ईरानी नौसैनिकों को बचाकर गाले में इलाज करवाया. 

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इसके अलावा श्रीलंका ने ईरानी सैनिकों के शव को ससम्मान ईरान भेजा. इसके अलावा हमले के एक दिन बाद एक अन्य ईरानी सहायक जहाज IRIS Bushehr ने इंजन खराबी का हवाला देकर श्रीलंका से मदद मांगी. श्रीलंका ने मानवीय आधार पर इसे अनुमति दी.

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