ईसाइयों के धर्म गुरु और वेटिकन के पोप लियो चौदहवें ने सैकड़ों वर्षों के इतिहास में सोमवार को ऐतिहासिक माफी मांगी. ये माफी उन्होंने इस बात के लिए मांगी कि वेटिकन चर्च ने खुद दास प्रथा और गुलामी को जायज ठहराने में भूमिका निभाई थी. यही नहीं वेटिकन सदियों तक इसकी निंदा करने में नाकाम रहा. पोप लियो XIV ने वेटिकन के इस इतिहास को "ईसाई यादों का एक ज़ख्म" बताया.
पहले के पोप भी अटलांटिक के पास से दास व्यापार में ईसाइयों की भागीदारी के लिए माफी मांग चुके हैं. लेकिन माफी मांगने की बात तो छोड़िए किसी भी पोप ने कभी भी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार नहीं किया कि पिछले पोप ने खुद यूरोपीय शासकों को ईसाइयत न मानने वाले लोगों को गुलाम बनाने और जीतने की पूरी छूट दी थी.
लेकिन इतिहास में पहली बार अमेरिका में पैदा हुए एक पोप ने इस कठिन चुनौती को पार करते हुए माफी मांगी है.
दिलचस्प बात यह है कि पोप लियो के पारिवारिक इतिहास में गुलाम और गुलामों के मालिक दोनों ही शामिल रहे हैं. उन्होंने एक पत्र लिखकर मैग्निफिका ह्यूमनितास यह माफी मांगी है. यह पत्र सोमवार को जारी किया गया.
यह व्यापक घोषणापत्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बढ़ती निर्भरता के इस दौर में मानवता की रक्षा करने के बारे में है. लियो ने अटलांटिक पार होने वाले गुलाम व्यापार का ज़िक्र करते हुए उन 'गुलामी और उपनिवेशवाद के नए रूपों' की ओर ध्यान दिलाया जिन्हें डिजिटल क्रांति बढ़ावा दे रही है.
अमेरिकी अश्वेत लगातार माफी की मांग कर रहे थे
दरअसल अश्वेत अमेरिकी कैथोलिकों, एक्टिविस्ट और विद्वान दशकों से मांग कर रहे हैं कि चर्च को अपनी करतूतों के लिए माफी मांगनी चाहिए. इनकी मांग थी कि चर्च औपनिवेशिक काल में इंसानों के व्यापार में अपनी भूमिका के लिए प्रायश्चित करे.
लियो ने लिखा, "जब हम उन असीम कष्टों और अपमान के बारे में सोचते हैं, जिन्हें इतने सारे लोगों ने सहा और जो उनकी उस असीम गरिमा के बिल्कुल विपरीत थे, जो उन्हें प्रभु के द्वारा असीम रूप से प्रेम किए जाने वाले व्यक्तियों के रूप में प्राप्त थी तो गहरा दुख महसूस किए बिना रहना असंभव है." "इसके लिए चर्च की ओर से मैं पूरी ईमानदारी से क्षमा मांगता हूं."
वेटिकन ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि उसने सभी इंसानों की गरिमा को हमेशा बनाए रखा है और उन्हें ईश्वर की संतान के रूप में माना है.
15वीं सदी में वेटिकन से आया था विवादित आदेश
लेकिन 15वीं सदी में वेटिकन से जारी निर्देशों की एक सीरीज काफी आलोचना के घेरे में रही है. इस निर्देश में पुर्तगाली शासकों को अफ्रीका और अमेरिका को जीतने तथा गैर-ईसाइयों को गुलाम बनाने का अधिकार दे दिया था.
उदाहरण के लिए 1452 में पोप निकोलस V ने 'डम डाइवर्सस' नाम का एक पोप-आदेश जारी किया. इस आदेश ने पुर्तगाली राजा और उनके उत्तराधिकारियों को यह अधिकार दिया कि वे कहीं भी मौजूद "सारासेन्स (मुसलमानों), मूर्तिपूजकों अन्य विधर्मियों और मसीह के नाम के शत्रुओं पर आक्रमण करें, उन्हें जीतें, उनसे युद्ध करें और उन्हें अपने अधीन कर लें तथा उनकी सभी संपत्तियां छीन लें.
इस आदेश ने पुर्तगालियों को अपने लोगों को हमेशा के लिए गुलाम बनाने की भी इजाजत दी.
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