ट्रंप का 'ट्रुथ', मुनीर की 'डील' और नोबेल की आस... जंग के बीच 'बिचौलिया' बना PAK, क्या है पूरा खेल?

पाकिस्तान, जिसकी कभी अमेरिका खुलकर आलोचना करता था, क्या अब वही देश वॉशिंगटन का भरोसेमंद साझेदार बनता जा रहा है? क्या पाकिस्तान अब अमेरिका–ईरान के बीच संभावित वार्ता में अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है?

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जानकारी के मुताबिक पाकिस्तान ने अमेरिका की 15-सूत्रीय शांति योजना ईरान तक पहुंचाने में मदद की है. (File Photo: ITG) जानकारी के मुताबिक पाकिस्तान ने अमेरिका की 15-सूत्रीय शांति योजना ईरान तक पहुंचाने में मदद की है. (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:27 PM IST

पाकिस्तान, एक ऐसा देश जिसे कभी ओसामा बिन लादेन को पनाह देने के कारण वाशिंगटन द्वारा अलग-थलग कर दिया गया था, अब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता में अहम भूमिका निभाता नजर आ रहा है. बता दें, पाकिस्तान ने संभावित शांति वार्ता की मेजबानी का प्रस्ताव रखा है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हफ्ते सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर प्रमुखता से उठाया.

जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान के अधिकारियों ने अमेरिका की 15-सूत्रीय शांति योजना ईरान तक पहुंचाने में मदद की. यह संदेश एक बैक-चैनल के जरिए भेजा गया. 

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यह उस देश के प्रति व्हाइट हाउस के भरोसे की एक उल्लेखनीय वापसी मानी जा रही है जिसे ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में एक बेईमान देश बताकर खारिज कर दिया था.

विशेषज्ञों के मुताबिक, इसमें पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की बड़ी भूमिका रही है. मुनीर ने इस साल एक विटकॉफ फर्म और पाकिस्तानी गवर्मेंट के बीच क्रिप्टो डील भी करवाई. ट्रंप ने मुनीर को अपना पसंदीदा पाकिस्तानी फील्ड मार्शल भी बताया है.

ईरान के भी पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध माने जाते हैं. ईरान ने पाकिस्तान के 20 जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी है.

हालांकि ईरान ने अमेरिकी शांति प्रस्ताव ठुकरा दिया है और अपना 5-सूत्रीय प्लान पेश किया. वहीं, पाकिस्तान ने कहा कि संघर्ष को कम करने के प्रयास में मध्यस्थ देशों का एक प्रारंभिक शिखर सम्मेलन इस आने वाले सप्ताह में इस्लामाबाद में होने वाला है.

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पाकिस्तान के लिए फायदे का सौदा

पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी के अनुसार, “पाकिस्तान के लिए यह हर हाल में फायदे का सौदा है. चाहे समझौता हो या न हो. अब पाकिस्तान की छवि केंद्र में रहने वाले देश की बन गई है”

पाकिस्तान के पास इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए हर संभव प्रयास करने का ठोस कारण है. अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद, पाकिस्तान में हिंसक अमेरिकी विरोधी प्रदर्शन भड़क उठे, जहां ईरान की तरह ही शिया मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है.

इसके अलावा, पाकिस्तान ने सितंबर में सऊदी अरब के साथ नाटो शैली का पारस्परिक रक्षा समझौता किया है. ऐसे में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर वह सऊदी दबाव से भी बचना चाहता है.

हालांकि यह संतुलन आसान नहीं है. पूर्व राजदूत इमरान अली के मुताबिक, पाकिस्तान को ईरान और सऊदी अरब के बीच बेहद सावधानी से कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना पड़ा है.

अमेरिका को लुभाने की पाकिस्तान की कोशिश

कोल्ड वॉर और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के दौरान अमेरिका और पाकिस्तान करीबी सहयोगी रहे. केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) ने 11 सितंबर, 2001 के हमलों के लिए जिम्मेदार अल-कायदा आतंकवादियों, जिनमें समूह का नेता बिन लादेन भी शामिल था, इनकी तलाश में पाकिस्तान की सेना और खुफिया सेवाओं के साथ मिलकर काम किया. जब बिन लादेन का पता एक पाकिस्तानी कस्बे में चला, जहां 2011 में एक गुप्त अमेरिकी अभियान में उसे मार गिराया गया.

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वहीं, बाइडेन प्रशासन ने 2024 में आरोप लगाया था कि पाकिस्तान एक ऐसी मिसाइल विकसित करने की कोशिश कर रहा है जो अमेरिका तक पहुंच सकती है.

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में अमेरिका ने पाकिस्तान से 2021 काबुल एयरपोर्ट हमले के आरोपी को पकड़ने में मदद मांगी. जिसका जवाब भी पाकिस्तान ने दिया. इसके बाद पाकिस्तान ने भारत के साथ तनाव कम करने का श्रेय भी ट्रंप को दिया, जिसका भारत ने खंडन किया. इसके अलावा कुछ लोगों का कहना है कि पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया.

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