'हमने भी भारत की जमीन हड़प ली...', PM बालेन शाह के बयान से नेपाल में हंगामा, क्या कह रहे वहां के लोग

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में कहा कि नेपाल ने भी भारत की जमीन पर अतिक्रमण किया है, जिससे संसद में हंगामा मच गया. उनके बयान पर विपक्ष ने आपत्ति जताई और इसे संसदीय रिकॉर्ड से हटाने की मांग की. नेपाल-भारत के बीच लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर सीमा विवाद लंबे समय से जारी है.

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बालेन शाह ने भारत-नेपाल विवादित सीमा पर बयान दिया जिसके बाद हंगामा मचा है (Photo: AFP) बालेन शाह ने भारत-नेपाल विवादित सीमा पर बयान दिया जिसके बाद हंगामा मचा है (Photo: AFP)

आजतक इंटरनेशनल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 01 जून 2026,
  • अपडेटेड 3:18 PM IST

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के एक बयान से हंगामा मच गया है. रविवार को नेपाल की संसद में शाह ने सांसदों के सवालों का जवाब में कह दिया कि 'सिर्फ भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगह भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है.' उनके इस बयान की नेपाल में भारी आलोचना हो रही है जिसके बाद उनकी सरकार बैकफुट पर आती दिख रही है.

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नेपाल के अखबार- द काठमांडू पोस्ट में इस पूरे विवाद पर एक लेख छपा है जिसमें लिखा गया है- प्रधानमंत्री बालेन शाह पहले इस बात को लेकर ट्रोल हो रहे थे कि वो बोल नहीं रहे हैं. लेकिन जब उन्होंने संसद में अपनी बात रखी, तो उनके बयान ने और बड़ा विवाद खड़ा कर दिया.

नेपाली संसद में दरअसल, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी विवाद पर सवाल किया गया था. जवाब में शाह ने संसद में कहा, 'आपको यह अजीब लग सकता है, लेकिन मुझे भी प्रधानमंत्री बनने के बाद ही पता चला कि केवल भारत ने ही नहीं, नेपाल ने भी कई जगह भारत की जमीन पर अतिक्रमण किया है.'

प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद संसद में हंगामा मच गया. विपक्षी सांसदों ने मांग की कि उनके बयान को संसदीय रिकॉर्ड से हटाया जाए.

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नेपाल में बालेन शाह निशाने पर

नेपाल में पीएम शाह के इस बयान की खूब आलोचना हो रही है. नेपाल के सीमा मामलों के जानकारों और पूर्व राजनयिकों ने शाह के बयान पर सवाल उठाए हैं. 

भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर लंबे समय से सीमा विवाद चल रहा है. दोनों देश इस पर अपना दावा करते हैं.

शाह ने कहा कि नेपाल सरकार इस मुद्दे पर पहले ही भारत और चीन को कूटनीतिक संदेश भेज चुकी है.

उन्होंने कहा, 'हमने केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार से भी बात की है. हमारा मानना है कि इंग्लैंड को भी इस मामले में रुचि लेनी चाहिए, क्योंकि यह विवाद उस दौर से जुड़ा है जब भारत पर ब्रिटिश शासन था. इसलिए इन सभी मुद्दों का समाधान बातचीत और कूटनीतिक बातचीत के जरिए होना चाहिए.'

नेपाल के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता ब्रिटेन

प्रधानमंत्री के एक सहयोगी ने नेपाल के अखबार ‘काठमांडू पोस्ट’ को बताया कि कुछ हफ्ते पहले प्रधानमंत्री के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यांजंकर ने नेपाल में ब्रिटेन के राजदूत रॉब फेन से मुलाकात की थी.

इस बातचीत में कालापानी क्षेत्र के सीमा विवाद के समाधान में ब्रिटेन की संभावित भूमिका पर चर्चा हुई थी. नेपाल का मानना है कि यह विवाद 1816 की सुगौली संधि के बाद शुरू हुआ था, जो ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी.

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नेपाल के सीमा विशेषज्ञों का दावा है कि 210 साल पुरानी सुगौली संधि और ब्रिटिश इंडिया सर्वे के 1819, 1827, 1834, 1835, 1837, 1846, 1850, 1856, 1860 और 1879 में तैयार किए गए नक्शों के आधार पर 372 वर्ग किलोमीटर का लिपुलेख-लिम्पियाधुरा-कालापानी क्षेत्र नेपाल का हिस्सा है.

नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, ब्रिटेन को इसलिए शामिल करने की कोशिश की गई क्योंकि वो सुगौली संधि का ऐतिहासिक पक्षकार रहा है और उसके पास ऐसे डॉक्यूमेंट्स या नक्शे हो सकते हैं जो विवाद सुलझाने में मददगार साबित हों.

हालांकि, राजदूत रॉब फेन ने संकेत दिया कि यह मुद्दा भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला है और ब्रिटेन इसमें दखल नहीं देना चाहता. नेपाली पीएमओ के मुताबिक, प्रधानमंत्री बनने के बाद शाह को नेपाल-भारत सीमा कार्य समूह (Boundary Working Group, BWG)  के काम की जानकारी दी गई थी.

यह कार्य समूह बाउंड्री पिलर्स के निर्माण, मरम्मत, फिर से उन्हें बनाने, नो-मैन्स-लैंड की सफाई और अन्य टेक्निकल कामों की जिम्मेदारी संभालता है. हालांकि, सुस्टा और कालापानी जैसे विवादित क्षेत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है.

पूर्व सर्वे महानिदेशक तोया बराल ने कहा कि सीमा के दोनों ओर भूमि कब्जे, खेती और उसके इस्तेमाल से जुड़े कुछ मुद्दे अभी भी लंबित हैं और BWG उन्हें सुलझाने पर काम कर रहा है.

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बराल ने अपने प्रधानमंत्री के दावों को खारिज करते हुए दावा किया, 'नेपाल ने भारत की जमीन भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया है. प्रधानमंत्री का बयान तकनीकी रूप से सही नहीं है.'

उन्होंने बताया कि BWG इस समय यह आकलन कर रहा है कि दोनों देशों के नागरिक सीमा पार कितनी भूमि पर खेती कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री शाह का यह बयान ऐसे समय आया है जब उनकी पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने भारत दौरे पर आने वाले हैं. वो नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ भारतीय नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं.

अपने पीएम से अतिक्रमण का सबूत मांग रहे नेपाली सांसद

नेपाली कांग्रेस की सांसद बसना थापा ने कहा, 'अगर प्रधानमंत्री को लगता है कि नेपाल ने वास्तव में भारत की जमीन पर अतिक्रमण किया है, तो उन्हें सबूतों के साथ सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि ऐसा कहां हुआ है.'

उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री को तुरंत अपनी गलती सुधारनी चाहिए. उनका बयान बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया और तथ्यात्मक रूप से गलत है.'

इस बीच विवाद बढ़ने के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने सफाई जारी की. मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी वास्तव में सीमा के 'दसगजा' (नो-मैन्स-लैंड) क्षेत्र में होने वाले अतिक्रमण और सीमा पार भूमि के इस्तेमाल से जुड़ी थी, न कि किसी आधिकारिक क्षेत्रीय दावे से.

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विदेश मंत्रालय के अनुसार, कुछ नदी आधारित सीमाओं के निर्धारण के कारण ऐसी स्थिति बनी है, जहां एक देश के नागरिक दूसरे देश की सीमा में आने वाली भूमि पर खेती या निवास करते हैं.

मंत्रालय ने यह भी कहा कि तकनीकी अध्ययनों में पाया गया है कि कुछ भूमि, जिसका उपयोग नेपाल की ओर से किया जा रहा है, वास्तव में भारतीय सीमा में आती है, जबकि कुछ भूमि, जिसका उपयोग भारत की ओर से किया जा रहा है, नेपाली क्षेत्र में स्थित है.

मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का बयान इसी तकनीकी वास्तविकता और सीमा पार भूमि उपयोग के संदर्भ में था.

इसके बावजूद प्रधानमंत्री के बयान ने नेपाल के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा पार की जमीन का इस्तेमाल और किसी देश का दूसरे की जमीन पर अतिक्रमण करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं और इन्हें एक नहीं माना जा सकता.

'माफी मांगें बालेन शाह'

नेपाल के जाने-माने पत्रकार युबराज घिमिरे ने अपने प्रधानमंत्री के बयान की कड़ी निंदा की है और कहा है कि बालेन शाह को माफी मांगनी चाहिए. उन्होंने कहा, 'बालेन शाह ने एक खतरनाक संकेत दिया है. अब उनके पास केवल माफी मांगने और फिर स्पष्ट सफाई देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है.'

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— Kanak Mani Dixit (@KanakManiDixit) May 31, 2026

विपक्षी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने प्रधानमंत्री शाह के बयान का विरोध किया है. पार्टी के प्रवक्ता खड्गप्रसाद विश्वकर्मा 'प्रकाण्ड' ने सोमवार को एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री शाह का बयान राष्ट्रीय संप्रभुता और भौगोलिक अखंडता के खिलाफ है.

माओवादी पार्टी ने दावा किया कि कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और सुस्ता सहित दर्जनों नेपाली क्षेत्रों पर भारत का कब्जा है. पार्टी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री का हालिया बयान भारत के विस्तारवाद को बढ़ावा देने वाला है.

बालेन शाह के बयान का समर्थन भी

हालांकि, नेपाल के बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो अपने पीएम के बयान की सराहना कर रहे हैं और इसे बेहतरीन कूटनीति बता रहे हैं.

— Neha Chapagain (@nehuchapagai) June 1, 2026

नेहा चपागाईं नाम की एक एक्स यूजर ने बालेन शाह के बयान का पक्ष लेते हुए लिखा है, 'परिपक्व नेता युद्ध नहीं करता, बल्कि बातचीत को बढ़ावा देता है. पूर्व प्रधानमंत्रियों के समय से उलझे सीमा विवाद पर प्रधानमंत्री बालेन का यह कहना कि- मैं इसे बातचीत के जरिए सुलझाऊंगा, बेहतरीन राजनीतिक संस्कृति का सर्वोत्तम उदाहरण है. अब कूटनीतिक पहलों को तेज करिए.'

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