नेपाल में हिन्दू राष्ट्र की 'लहर' से 'लाल' क्यों हो रहीं कम्युनिस्ट पार्टियां? ओली-प्रचंड को दिख रहा 'बाहरी हाथ'

नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के पक्ष में लोगों का भावनात्मक जुड़ाव देखकर नेपाल की सत्ता और विपक्ष में मौजूद कम्युनिस्ट पार्टियां सतर्क हो गई हैं और सहम गई हैं. नेपाल की मुख्य विपक्षी पार्टी सीपीएन (माओवादी सेंटर) ने काठमांडू में हुए राजशाही के समर्थन में प्रदर्शन के बाद तराई-मधेश जिलों में महीने भर से चल रहे ‘जागृति अभियान’ को अचानक रोक दिया. वही पीएम ओली ने इस प्रदर्शन का बाहरी कनेक्शन बताया.

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नेपाल में क्या राजशाही की होगी वापसी? (फोटो- आजतक) नेपाल में क्या राजशाही की होगी वापसी? (फोटो- आजतक)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 11 मार्च 2025,
  • अपडेटेड 11:24 AM IST

नेपाल में हिन्दू राष्ट्र की मांग और राजशाही के पक्ष में उमड़े जनज्वार से राजनीति में उबाल आ गया है. नेपाल के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी, CPN-UML) केपी शर्मा ओली ने इस प्रदर्शन के पीछे 'बाहरी' शक्तियों की ओर इशारा किया है. नेपाल के अंग्रेजी समाचारपत्र 'द काठमांडू पोस्ट' ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ओली ने इस प्रदर्शन के लिए 'बाहरी शक्तियों' को जिम्मेदार ठहराया है. 

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प्रदर्शन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर दिखने पर ओली ने कहा कि हमारी स्थिति अभी ऐसी नहीं हुई है कि एक रैली आयोजित करने के लिए हमें विदेशी नेताओं की तस्वीर इस्तेमाल करनी पड़े. ओली ने कहा कि इन प्रदर्शनों को 'अलोकतांत्रिक' और व्यवस्था 'विरोधी' बताया है. उन्होंने कहा कि "हमारे पास अलोकतांत्रिक, व्यवस्था-विरोधी और असंवैधानिक गतिविधियों के लिए समय नहीं है."

बता दें कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी, CPN-UML) यह पार्टी सरकार का नेतृत्व कर रही है, और वर्तमान प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली इसी पार्टी से हैं. इसके अलावा नेपाली कांग्रेस  भी सरकार में शामिल है. 

रविवार को पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के पक्ष में लोगों का भावनात्मक जुड़ाव देखकर नेपाल की सत्ता और विपक्ष में मौजूद कम्युनिस्ट पार्टियां सतर्क और सहम गई हैं. 

नेपाल की मुख्य विपक्षी पार्टी सीपीएन (माओवादी सेंटर) ने काठमांडू में हुए राजशाही के समर्थन में प्रदर्शन के बाद तराई-मधेश जिलों में महीने भर से चल रहे ‘जागृति अभियान’ को अचानक रोक दिया. गौरतलब है कि नेपाल के पूर्व पीएम पुष्प कमल दहल प्रचंड इस पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं. इस प्रदर्शन से पहले अध्यक्ष पुष्प कमल दहल और पार्टी के अन्य शीर्ष नेता काठमांडू लौट आए. 

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पार्टी ने कहा कि मौजूदा हालात में पार्टी को जिलों से ज्यादा केंद्र यानी की काठमांडू की राजनीति में सक्रिय होने की जरूरत है. 

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सीपीएन (माओवादी सेंटर) की बैठक में शीर्ष नेताओं ने कहा कि देश में राजशाही की वापसी की कोई संभावना नहीं है. लेकिन पूर्व राजा के स्वागत में प्रदर्शनों में आम जनता की भागीदारी वर्तमान सरकार की विफलता से उपजी निराशा की अभिव्यक्ति थी. 

बता दें कि रविवार को जब नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह पोखरा से काठमांडू लौटे तो उनके स्वागत के लिए काठमांडू एयरपोर्ट हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी. नेपाल की राजनीति में अभी ये चर्चा है कि 77 वर्ष के ज्ञानेंद्र शाह पॉलिटिक्स में वापसी कर सकते हैं. इस दौरान भीड़ ने राजमहल खाली करो, राजा आओ, देश बचाओ और हिन्दू राष्ट्र की वापसी की मांग को लेकर नारेबाजी की. 

नेपाल की एक पार्टी राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी ज्ञानेंद्र शाह की राजनीति में वापसी का समर्थन कर रही है. 

2008 तक नेपाल दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था. यहां पर माओवादी 'क्रांति' के बाद लोकतांत्रिक सरकार की बहाली हुई और राजशाही को खत्म कर दिया गया. इसके साथ ही नेपाल हिन्दू राष्ट्र भी नहीं रहा. अब 16 साल बाद नेपाल में एक बार फिर से राजशाही और हिन्दू किंगडम की बहाली के लिए आंदोलन हो रहा है. 

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नेपाल की रैली में सीएम योगी की तस्वीर.

हिन्दू राष्ट्र की मांग और राजशाही की वापसी सुगबुगाहट नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए खतरे की घंटी हैं. क्योंकि सीपीएन (माओवादी सेंटर), CPN-UMLजैसी पार्टियां इसी का विरोधकर सत्ता में आईं है. इस विचारधारा की वापसी की मांग उनकी राजनीतिक विचारधारा, शासन प्रणाली और जनसमर्थन को प्रभावित कर सकती है. इसलिए ये पार्टियां इसे बतौर खतरा देख रही हैं.

इन मांगों पर सीपीएन (माओवादी सेंटर)  के उपाध्यक्ष और पार्टी प्रवक्ता अग्नि प्रसाद सपकोटा ने कहा कि, "हाल के दिनों में प्रतिगामी ताकतें सक्रिय हो गई हैं और इसका कारण वर्तमान सरकार की पूरी तरह से विफलता है.लोग चारों ओर खराब शासन देखकर निराश हैं."

नेपाल की स्थिति को देखते हुए देश की कम्युनिस्ट पार्टियों ने एक मीटिंग की इस दौरान आगे की परिस्थितियों से निपटने पर चर्चा हुई.  

माओवादी सेंटर का मानना है कि पूर्व राजा की बढ़ती सक्रियता के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोध की आवश्यकता है. 

द काठमांडू पोस्ट के अनुसार सपकोटा ने कहा कि पार्टी सोशलिस्ट फ्रंट के नेताओं के साथ एक बड़े विरोध प्रदर्शन पर चर्चा कर रही है. इससे पहले, फ्रंट ने 6 अप्रैल को एक सामूहिक रैली आयोजित करने का फैसला किया था. ये वही तारीख है जब 1990 में नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र को बहाल करने वाले पहले जन आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था.  लेकिन अब बदले हालात को देखते हुए प्रचंड की पार्टी एक बड़ी रैली करने की तैयारी में है ताकि राजशाही समर्थकों को जवाब दिया जा सके. 

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पुष्प कमल दहल ने सोमवार को एक दूसरे कम्युनिस्ट नेता CPN-Unified Socialist के चीफ माधव कुमार नेपाल से मुलाकात की. 

इस मीटिंग के बाद प्रचंड ने इस मामले को मामूली बताने की कोशिश की और कहा कि वे राजशाही समर्थक ताकतों की गतिविधियों से बिल्कुल भी भयभीत नहीं हैं. दहल ने पत्रकारों से कहा, "लोग मौजूदा सरकार के कामकाज से नाराज़ और निराश हैं, सरकार को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए."

CPN-Unified Socialist के अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल ने कहा कि देश में ऐसी ताकतों के उभरने के पीछे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सरकार की अक्षमता और खराब शासन को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि कि व्यवस्था की रक्षा करना गणतंत्रवादी राजनीतिक ताकतों की प्राथमिक जिम्मेदारी है.

सोमवार को पार्टी की सचिवालय बैठक में उन्होंने कहा, "प्रतिक्रियावादी और बदलाव न चाहने वाले लोगों ने अपना सिर उठाना शुरू कर दिया है. हमने इस मामले को गंभीरता से लिया है. उन्होंने पार्टी सदस्यों को गणतंत्र व्यवस्था के पक्ष में सतर्क और एकजुट रहने का निर्देश दिया. 

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि सरकार और राजनीतिक दलों को इस प्रदर्शन को गंभीरता से लेना चाहिए. 

राजनीतिक विश्लेषक गेजा शर्मा वागले कहते हैं कि यह प्रदर्शन राजनीतिक दलों, उनके नेतृत्व वाली सरकारों और उनके नेतृत्व की सामूहिक विफलता का नतीजा है.

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वागले कहते हैं, "नई और पुरानी राजनीतिक ताकतों की पूरी तरह से विफलता ने लोगों में निराशा को जन्म दिया है." "यह मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था की विफलता से ज़्यादा राजनीतिक नेतृत्व की विफलता का नतीजा है."

वागले ने कहा कि प्रमुख दलों के शीर्ष नेताओं को एक-दूसरे पर आरोप लगाने में अपना समय बर्बाद करने के बजाय आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और अपने-अपने संगठनों को सुधारने के लिए काम करना चाहिए.

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