ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव में पाकिस्तान की भूमिका अब खुद उसके लिए मुश्किल बनती दिखाई दे रही है. इस्लामाबाद एक तरफ दोनों देशों के बीच मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ उस पर ईरान को "सीक्रेट सपोर्ट" देने के आरोप लग रहे हैं. यही वजह है कि अब पाकिस्तान चीन और अमेरिका की डिप्लोमेसी के बीच फंसता नजर आ रहा है.
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने ईरानी सैन्य विमानों को अपने एयरबेस इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी. दावा किया गया कि ईरान के कुछ सैन्य विमान रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस पर पार्क थे, ताकि उन्हें संभावित अमेरिकी हमलों से बचाया जा सके. हालांकि पाकिस्तान पहले ही इन दावों को "भ्रामक" और "सनसनीखेज" बता चुका है.
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लेकिन इस मुद्दे ने अब अमेरिकी राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है. अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने खुले तौर पर पाकिस्तान पर अविश्वास जताया है. उन्होंने अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से सवाल किया कि अगर पाकिस्तान सच में ईरानी विमानों को अपने एयरबेस पर जगह दे रहा है, तो क्या उसे निष्पक्ष मध्यस्थ माना जा सकता है?
अमेरिकी सांसद को पाकिस्तान पर भरोसा नहीं!
सीनेट की सुनवाई के दौरान सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा, "मैं पाकिस्तान पर बिल्कुल भरोसा नहीं करता. अगर वे ईरानी सैन्य संपत्तियों को बचाने के लिए अपने एयरबेस इस्तेमाल करने दे रहे हैं, तो हमें किसी और को मध्यस्थ तलाशना चाहिए." उन्होंने यहां तक कह दिया कि शायद इसी वजह से शांति वार्ता आगे नहीं बढ़ पा रही.
रक्षा मंत्री हेगसेथ ने इस पर सीधा जवाब देने से बचने की कोशिश की और कहा कि वह बातचीत की प्रक्रिया के बीच में नहीं पड़ना चाहते. लेकिन सीनेटर ग्राहम ने साफ कर दिया कि वॉशिंगटन में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर गंभीर संदेह पैदा हो चुके हैं.
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चीन ने किया पाकिस्तान की मध्यस्थ की कोशिश का समर्थन
दूसरी तरफ चीन लगातार पाकिस्तान का समर्थन करता दिख रहा है. चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार से फोन पर बातचीत की. इस दौरान चीन ने पाकिस्तान की "मध्यस्थता की कोशिशों" की तारीफ की और कहा कि वह ईरान-अमेरिका वार्ता को आगे बढ़ाने में रचनात्मक भूमिका निभा रहा है.
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी जिन्हुआ के मुताबिक, वांग यी ने पाकिस्तान से कहा कि वह क्षेत्रीय शांति बहाल करने की कोशिशें जारी रखे. उन्होंने यह भी कहा कि चीन पाकिस्तान के कूटनीतिक कोशिशों का समर्थन करता रहेगा.
दरअसल, चीन की दिलचस्पी सिर्फ डिप्लोमेसी तक सीमित नहीं है. होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव का सीधा असर चीन की ऊर्जा सप्लाई पर पड़ रहा है, क्योंकि चीन ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है. ऐसे में बीजिंग चाहता है कि किसी तरह हालात काबू में रहें और तेल सप्लाई सामान्य हो सके.
पाकिस्तान का क्या कहना है?
उधर पाकिस्तान खुद को एक जिम्मेदार मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान का कहना है कि उसने सिर्फ कूटनीतिक और प्रशासनिक सहयोग दिया था, ताकि वार्ता प्रक्रिया चल सके. लेकिन अमेरिका में उठते सवालों ने उसकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
अब पाकिस्तान ऐसे हालात में फंस गया है, जहां उसे एक तरफ चीन का समर्थन मिल रहा है, जबकि दूसरी तरफ अमेरिका उसकी नीयत पर शक जता रहा है. यही वजह है कि ईरान संकट में मध्यस्थ बनने की उसकी कोशिश अब उसके लिए बड़ा कूटनीतिक जोखिम बनती जा रही है.
आजतक इंटरनेशनल डेस्क