जंग के बीच ईरानी शासन में दरार... खामेनेई की मौत के बाद कौन ले रहा युद्ध के फैसले?

अमेरिका-इजरायल के हमलों के बीच ईरान की सत्ता में हलचल बढ़ गई है. सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद नेतृत्व को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. इसी बीच राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के पड़ोसी देशों से माफी वाले बयान पर विवाद खड़ा हो गया, जिससे सत्ता के भीतर मतभेद भी सामने आए. अब सवाल है कि युद्ध के दौर में ईरान में असली फैसले कौन ले रहा है.

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राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (बीच में), ज्यूडिशियरी चीफ गुलाम हुसैन मोहसेनी-एजेई (बाएं) और गार्डियन काउंसिल के सदस्य अलीरेजा आराफ़ी (दाएं) राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (बीच में), ज्यूडिशियरी चीफ गुलाम हुसैन मोहसेनी-एजेई (बाएं) और गार्डियन काउंसिल के सदस्य अलीरेजा आराफ़ी (दाएं)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:51 AM IST

अमेरिका और इजरायल के लगातार हमलों के बीच ईरान की सत्ता व्यवस्था गंभीर दबाव में है. इस बीच सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद देश के नेतृत्व को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. खामेनेई करीब 36 साल तक ईरान के सबसे ताकतवर नेता रहे और उनके रहते सत्ता के भीतर मतभेद खुलकर सामने नहीं आते थे. लेकिन उनकी मौत के बाद सत्ता के अंदर अलग-अलग ताकतों के बीच खींचतान दिखाई देने लगी है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि युद्ध के इस दौर में ईरान में असली फैसले कौन ले रहा है.

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अमेरिका-इजरायल की ओर से जंग शुरू किए जाने के बाद ईरान उन खाड़ी देशों को निशाने पर ले रहा है, जिन्होंने अमेरिका को समर्थन दिया है. ईरान वहां मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है. हालांकि इस दौरान कई मिसाइल और ड्रोन रिहायशी और रणनीतिक इलाकों की ओर भी दागे जा रहे हैं. सऊदी अरब से लेकर यूनाइटेड अरब अमीरात, कतर, बहरीन, कुवैत और जॉर्डन समेत कई खाड़ी देश हमलों का सामना कर रहे हैं. इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के एक बयान को लेकर सत्ता के भीतर दरार की चर्चा तेज हो गई.

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पेजेशकियान ने हमलों को लेकर पड़ोसी देशों से माफी मांगी और कहा था कि उनकी सेना तब तक पड़ोसी देशों पर हमला नहीं करेगी, जब तक उनकी जमीन से ईरान पर हमला नहीं होता. उनके इस बयान के बाद ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी से लेकर कई धार्मिक नेता भी उनके विरोध में सामने आ गए. अंदरूनी मतभेद का संकेत देते हुए धार्मिक नेता हामिद रसाई ने सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति के बयान का विरोध किया. उन्होंने कहा, “आपका रुख अनप्रोफेशनल, कमजोर और नामंजूर था.”

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सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी ने भी उनके बयान का विरोध किया और कहा, "जब दुश्मन इस इलाके में मौजूद बेस से हम पर हमला करता है, तो हम जवाब देते हैं, और हम जवाब देना जारी रखेंगे.

न्यायपालिका प्रमुख मोहसेनी-एजेई ने भी कहा कि अगर कोई देश अमेरिकी हमलों के लिए अपनी जमीन उपलब्ध कराता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई जारी रह सकती है. इससे यह संकेत मिलता है कि युद्ध के समय अलग-अलग संस्थाओं की राय में अंतर है. बाद में राष्ट्रपति पेजेशकियान को अपना रुख बदलना पड़ा और उन्होंने अपना माफी वाला बयान वापस ले लिया. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि खामेनेई की मौत के बाद आखिर युद्ध से जुड़े फैसले कौन ले रहा है.

ईरान में सत्ता का नया समीकरण

अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान के संविधान के मुताबिक एक तीन सदस्यीय अंतरिम नेतृत्व परिषद बनाई गई है. इस परिषद में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, न्यायपालिका प्रमुख गोलामहोसैन मोहसेनी-एजेई और गार्डियन काउंसिल द्वारा चुने गए धार्मिक विद्वान अलीरेजा अराफी शामिल हैं.

बताया जा रहा है कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक विशेषज्ञों की सभा यानी असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स नया सुप्रीम लीडर नहीं चुन लेती. हालांकि मौजूदा हालात में यह संवैधानिक ढांचा पूरी तरह प्रभावी नजर नहीं आ रहा है. युद्ध की स्थिति में कई अहम फैसले अन्य शक्तिशाली संस्थाओं के प्रभाव में लिए जा रहे हैं.

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खामेनेई की मौत के बाद असली ताकत किसके पास?

स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस समय ईरान में इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC का प्रभाव काफी बढ़ गया है. माना जा रहा है कि सैन्य रणनीति और सुरक्षा से जुड़े कई बड़े फैसलों में IRGC की भूमिका सबसे अहम हो गई है.

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इसके साथ ही सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी भी इस समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. वे सेना, IRGC और सरकार के अलग-अलग हिस्सों के बीच तालमेल बनाकर काम कर रहे हैं. माना जा रहा है कि युद्ध के समय राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई फैसलों में उनका प्रभाव बढ़ गया है.

ईरान को नए सुप्रीम लीडर की तलाश

इस बीच ईरान में नए सुप्रीम लीडर को लेकर चर्चा भी तेज हो गई है. हालांकि अंतिम फैसला असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स को करना है, लेकिन दो नामों की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है.

सुप्रीम लीडर की दौड़ में पहला नाम अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई का है. माना जाता है कि वे लंबे समय से सत्ता से जुड़े कई अहम मामलों में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं. दूसरा नाम अलीरेजा अराफी का है. वे एक वरिष्ठ धार्मिक नेता हैं और अंतरिम नेतृत्व परिषद के सदस्य भी हैं. धार्मिक संस्थानों में उनका अच्छा खासा प्रभाव माना जाता है.

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कुछ विश्लेषकों का मानना है कि जब तक युद्ध की स्थिति बनी रहती है, तब तक नए सुप्रीम लीडर के चुनाव में देरी भी हो सकती है. इसकी एक वजह यह भी मानी जा रही है कि मौजूदा हालात में नया नेता बनते ही उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. इसके अलावा इजरायल की ओर से यह चेतावनी भी दी गई है कि जो भी नया नेता होगा, वह भी निशाने पर हो सकता है.

मसलन, इस समय ईरान की सत्ता व्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. एक तरफ अंतरिम नेतृत्व परिषद और सरकार कूटनीतिक विकल्पों पर विचार कर रही है. वहीं दूसरी तरफ युद्ध की स्थिति के कारण सुरक्षा और सैन्य संस्थाओं की भूमिका और मजबूत होती दिखाई दे रही है. आने वाले समय में नया सुप्रीम लीडर कौन बनता है, इससे ईरान की राजनीति और उसकी रणनीति की दिशा काफी हद तक तय होगी.

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