मध्य पूर्व की जंग भले ही फिलहाल रुकी हुई दिख रही हो, लेकिन असली लड़ाई अब टेबल पर होने वाली है. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद इस समय हॉटस्पॉट बना हुआ है, जहां अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर को स्थायी बनाने के लिए अहम बातचीत होने जा रही है. लेकिन यह बातचीत जितनी अहम है, उतना ही जोखिम भरा भी है. पाकिस्तान के लिए यह किसी "मिशन इम्पॉसिबल" से कम नहीं है.
इस पूरी घटना में पाकिस्तान ने खुद को एक बड़े मध्यस्थ के तौर पर पेश किया है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर लगातार इस बातचीत को सफल बनाने की कोशिश में जुटे हैं. लेकिन समस्या यह है कि पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया में अपना राजनीतिक दांव बहुत बड़ा लगा दिया है. अगर यह बातचीत सफल होती है, तो पाकिस्तान की वैश्विक छवि मजबूत होगी. लेकिन अगर बातचीत फेल होती है, तो उसकी साख को और भी बड़ा झटका लग सकता है.
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एक पाकिस्तानी एक्सपर्ट की मानें तो पाकिस्तान ने इस मध्यस्थता में अपनी राजनीतिक पूंजी लगा दी है, और अगर बातचीत विफल होती है तो पाकिस्तानियों के लिए यह खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसा हाल होगा. बातचीत को लेकर पाकिस्तान में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं. इस्लामाबाद के कई हिस्सों को पूरी तरह सील कर दिया गया है. जिस होटल में बातचीत होनी है, उसे खाली कराकर सरकार के कंट्रोल में ले लिया गया है.
सड़कों पर बैरिकेड्स, चेकपॉइंट्स और भारी सुरक्षा बल तैनात हैं. एयरस्पेस की निगरानी बढ़ा दी गई है और इमरजेंसी सेवाओं को अलर्ट पर रखा गया है. इसका कारण सिर्फ बाहरी खतरा नहीं, बल्कि आंतरिक चुनौतियां भी हैं. पाकिस्तान में बम विस्फोट और आतंकी हमले आम बात है. यह बातचीत बहुत सीमित समय में तय की गई है. मसलन, तीन दिनों के सुरक्षा इंतजाम के बीच इतनी बड़ी बैठक आयोजित करना एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है.
पाकिस्तान क्यों चाहता है यह समझौता?
पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ एक कूटनीतिक भूमिका नहीं है, बल्कि उसकी अपनी सुरक्षा से भी जुड़ा मामला है. रॉयटर्स के मुताबिक एक पाकिस्तानी एक्सपर्ट ने बताया, "पाकिस्तान नहीं चाहता कि लगातार लड़ाई की वजह से ईरान में अराजकता फैले, जिससे उसके पश्चिमी हिस्से में पहले से मौजूद गंभीर सुरक्षा स्थिति और खराब हो जाएगी." यानी अगर ईरान में अराजकता बढ़ती है, तो उसका सीधा असर पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर पड़ेगा, जहां पहले से ही हालात संवेदनशील हैं.
क्या पाकिस्तान के पास असली ताकत है?
पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान दोनों को बातचीत की टेबल पर लाने में अहम भूमिका निभाई है. लेकिन सवाल यह है कि क्या उसके पास इतना प्रभाव है कि वह दोनों देशों को समझौते के लिए मजबूर कर सके? विशेषज्ञों का मानना है कि यही पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी है. मसलन, अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस समझौता नहीं होता है तो पाकिस्तान के पास इतनी ताकत नहीं है कि वे अमेरिका-ईरान को समझौते के लिए मजबूर कर सके. ऐसे में पाकिस्तान को इसका कोई फायदा नहीं होगा.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ लेबनान सीजफायर को लेकर पहले से ही बैकफुट पर हैं. उनके दावे को अमेरिका और इजरायल दोनों ने ही आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया. अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने शहबाज शरीफ के दावे को सिरे से खारिज कर दिया, जो अमेरिका की तरफ से बातचीत करने वाले प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई कर रहे हैं. जबकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शहबाज के बयान को खारिज करते हुए दावा किया कि लेबनान सीजफायर का हिस्सा नहीं है.
विश्लेषकों की मानें तो पाकिस्तान इस बातचीत के दौरान खाड़ी देशों की चिंताओं को भी उठाएगा, जिन पर ईरान के हमलों का असर पड़ा है. साथ ही, वह यह भी कोशिश करेगा कि सीजफायर को लेबनान तक बढ़ाया जाए, जहां इजरायल के हमले अभी भी जारी हैं.
अगर बातचीत फेल हुई तो क्या होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर यह बातचीत विफल होती है तो पाकिस्तान पर क्या असर पड़ेगा? सबसे पहले तो इसका गंभीर असर उसकी अंतरराष्ट्रीय साख पर पड़ेगा. जो देश अभी उसे एक बड़े मध्यस्थ के रूप में देख रहे हैं, वही उसकी क्षमता पर सवाल उठाने लगेंगे. दूसरा, पाकिस्तान के लिए सुरक्षा खतरे बढ़ सकते हैं. अगर जंग फिर से तेज होती है, तो उसका असर उसकी सीमाओं और आंतरिक हालात पर पड़ सकता है. तीसरा ये कि पाकिस्तान की हाल ही में बनी "कूटनीतिक वापसी" को झटका लग सकता है. जो देश कुछ समय पहले तक वैश्विक मंच से लगभग बाहर था, वह फिर से हाशिए पर जा सकता है.
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