भारत से कनाडा आए हुए मुझे आठ महीने से ज्यादा हो गए हैं. यहां रहते-रहते अब मैं भी उन चीजों की आदी होती जा रही हूं, जो भारत में रहते हुए मेरे लिए भी अटपटी सी थीं. किसी देश में कुछ दिन घूमकर उसे समझने और वहां बसकर उसे जीने में बहुत फर्क होता है. 10–12 दिन या एक-दो महीने की ट्रिप वह एहसास नहीं जगा सकती, जो किसी देश को सच में अपनाने पर होता है.
जब कोई इंसान इस सोच के साथ नए देश में आता है कि अब यहीं जिंदगी बसानी है, यहीं जीना है और शायद यहीं मरना है, तब वह उन चीजों को भी देखने लगता है जो एक टूरिस्ट कभी नहीं देख पाता. हम अपनी खुशियां तो अपने पीछे छूटे लोगों से बांट सकते हैं, लेकिन परेशानियां अब सिर्फ हमारी रह जाती हैं-उनसे लड़ना भी है और उन्हें सुलझाना भी अकेले ही.
यह सब उस समय महसूस नहीं होता जब हम मोटे बजट के साथ किसी देश में घूमने आते हैं. तब देखने का नजरिया अलग होता है लेकिन किसी अनजान दुनिया में जाकर बस जाना बिल्कुल अलग अनुभव है.
यह प्रक्रिया भी किसी नए रिश्ते जैसी लगती है-शुरुआत में सब अच्छा लगता है, फिर कुछ चीजें खटकने लगती हैं, दूरी का ख्याल आने लगता है लेकिन अगर वही जगह धीरे-धीरे अपनी लगने लगे, तो वह आदत बन जाती है, और फिर उससे अलग होने का ख्याल भी भारी लगने लगता है.
कनाडा की बहुत सारी अच्छाइयां और कमियां गिनाई जा सकती हैं, लेकिन यहां के लोगों के मिज़ाज में जो नरमी, सब्र और लिहाज़ है, वह सीखने लायक है. दिल्ली जैसे तेज़ रफ्तार शहर में पलने-बढ़ने से मेरे अंदर भी जल्दीबाज़ी आ गई थी लेकिन यहां आकर लगता है, आखिर भागना किसके लिए है?
यहां लंबी-लंबी लाइनों में लोग सुकून से खड़े रहते हैं. न किसी को जल्दी है, न किसी को दूसरों से आगे निकलने की होड़. अगर कोई आगे बढ़ भी जाए, तो सामने वाला खुद ही उसे जगह दे देता है. धीरे-धीरे यह समझ आने लगता है कि किसी की जगह ले लेना यहां उपलब्धि नहीं, बल्कि असहज कर देने वाली चीज़ है.
यहां सॉरी लफ्ज़ भी इंसान को छोटा नहीं करता बल्कि इसे भी जल्दी बोलने की एक होड़ लगी रहती है. सॉरी.... वो भी बेवजह. इंडिया के हिसाब से बेवजह लेकिन यहां हर बात पर सॉरी. ज़रा भी एहसास हो, कोई मेरी किसी बात से असहज हो सकता है तो सॉरी. रास्ते में चलते-चलते कोई नजदीक आ गया हो तो सॉरी. भले ही वो अपने रास्ते पर हो. भले ही वो आपसे लड़राया हो. हर बात पर सॉरी. सॉरी-सॉरी-सॉरी....
ये सॉरी सिर्फ माफी नहीं है बल्कि ये कनाडाई कल्चर वो अहम हिस्सा है, जो लहजे की नरमी और सामने वाले को सम्मान का एहसास कराता है. हालांकि वो लोग भी कम नहीं जो अभी तक इस कल्चर में घुल मिल नहीं पाए. बस यही सबसे बड़ा फर्क कराता है इमिग्रेंट और यहां के मूल निवासी में या यहां रचे-बसे लोगों में.
सॉरी जैसी कई चीज़ें हैं जो इस देश को हमारे भारत से अलग बनाती हैं. ऐसा लगता है, जो तेज़तररारी दिल्ली में चालाक लोगों के बीच रहकर खुद ब खुद आ गई थी, वो चालाकी यहां मुझे असभ्य बना रही है.
हुमरा असद