नाटो देशों की No-No से नाराज हुए ट्रंप, ईरान युद्ध में साथ न मिलने पर बोले- हमें किसी की जरूरत नहीं

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ युद्ध में साथ न देने पर नाटो सहयोगियों तीखी आलोचना की है. उन्होंने कहा कि अमेरिका दूसरों की सुरक्षा पर अरबों डॉलर खर्च करता है और जरूरत के समय सहयोगी उसका साथ नहीं देते.

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डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए अमेरिका को किसी की मदद की जरूरत नहीं है. (Photo: AP) डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए अमेरिका को किसी की मदद की जरूरत नहीं है. (Photo: AP)

aajtak.in

  • ​वाशिंगटन,
  • 17 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:38 PM IST

ईरान युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं देने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने नाटो सहयोगियों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं और उनकी तीखी आलोचना कर रहे हैं. वहीं अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश ईरान युद्ध में सैन्य हस्तक्षेप से बचते हुए कूटनीति और शांति पर जोर दे रहे हैं. ब्रिटेन के बाद नाटो के दो अन्य सदस्य देशों फ्रांस और कनाडा ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं देने का फैसला किया है. 

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फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा हालात में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए उनका देश किसी सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लेगा. उन्होंने यह बयान पेरिस में नेशनल सिक्योरिटी एंड डिफेंस काउंसिल की बैठक के दौरान दिया. ट्रंप ने इमैनुएल मैक्रों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह जल्द ही सत्ता से बाहर हो सकते हैं. ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को गलत बताते हुए अपने पद से इस्तीफा देने वाले अमेरिकन नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के डायरेक्टर जो केंट पर ट्रंप ने कहा कि यह अच्छा हुआ. केंट ने आरोप लगाया है कि ईरान से अमेरिका को कई खतरा नहीं था और ट्रंप ने इजरायल के दबाव में आकर सैन्य कार्रवाई शुरू की.

डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी साफ किया कि अमेरिका फिलहाल ईरान युद्ध से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है. उन्होंने यूरोपीय देशों पर निशाना साधते हुए कहा, 'अमेरिका को किसी की मदद की जरूरत नहीं है. वह अपने दम पर स्थिति संभाल सकता है. उसने अकेले ही ईरान की सैन्य ताकत को तबाह कर दिया है.' ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की सैन्य ताकत काफी कमजोर हो चुकी है. उनके मुताबिक, ईरान की न एयर फोर्स बची है और न ही नौसेना. ईरान के शीर्ष नेतृत्व को भी बड़ा झटका लगा है. उन्होंने नाटो को 'एकतरफा व्यवस्था' बताते हुए आरोप लगाया कि अमेरिका दूसरों की सुरक्षा पर अरबों डॉलर खर्च करता है, लेकिन जरूरत के समय सहयोगी उसका साथ नहीं देते. उन्होंने इसे नाटो की बहुत बड़ी गलती करार दिया. 

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फ्रांस-कनाडा का युद्ध में शामिल होने से इनकार

इससे पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ईरान युद्ध में शामिल होने से इनकार करते हुए कहा, 'हम इस संघर्ष का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में फ्रांस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने या मुक्त कराने के किसी भी सैन्य अभियान में भाग नहीं लेगा.' उन्होंने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि जैसे ही क्षेत्र में तनाव कम होगा और बमबारी रुक जाएगी, फ्रांस अन्य देशों के साथ मिलकर समुद्री जहाजों की सुरक्षा के लिए एस्कॉर्ट सिस्टम की जिम्मेदारी निभाने को तैयार है. इमैनुएल मैक्रों के इस बयान से साफ है कि फ्रांस फिलहाल ईरान युद्ध में सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखते हुए कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहा है.

दूसरी ओर कनाडा ने भी साफ कर दिया है कि वह इस युद्ध में शामिल नहीं होगा. कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद ने कहा कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू करने से पहले उनके देश के साथ कोई बातचीत नहीं की गई थी. उन्होंने कहा कि कनाडा की प्राथमिकता पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. तुर्किये में अपने समकक्ष हाकान फिदान के साथ बातचीत के दौरान अनीता आनंद ने कहा कि मौजूदा संकट का समाधान केवल कूटनीतिक प्रयासों से ही संभव है.

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उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी नाटो देश पर हमला होता है, तो कनाडा गठबंधन सदस्यों के साथ मिलकर आगे की रणनीति पर निर्णय लेगा, लेकिन फिलहाल वह किसी आक्रामक कार्रवाई का हिस्सा नहीं बनेगा. बता दें कि ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी किए जाने से ग्लोबल सप्लाई चेन और ऑयल मार्केट पर काफी बुरा असर पड़ा है. नाटो के कई सदस्य देशों ने इस संघर्ष को और बढ़ाने के बजाय तनाव कम करने की दिशा में काम करने पर जोर दिया है. इससे पहले ब्रिटेन भी ईरान युद्ध में अमेरिका का साथ देने से मना कर चुका है. 

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नाटो क्या है?

नाटो का पूरा नाम नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) है, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन है. इसमें यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देश शामिल हैं. तत्कालीन सोवियत संघ (USSR) के बढ़ते प्रभाव और संभावित हमले से पश्चिमी देशों की रक्षा करने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1949 में इसकी स्थापना हुई थी. अमेरिका और सोवियत संघ के बीच कोल्ड वॉर के दौरान यह पश्चिमी यूरोप का मुख्य रक्षा कवच रहा. वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद भी नाटो बना रहा और पूर्वी यूरोप के कई अन्य देश इस सैन्य गठबंधन में शामिल हो गए. नाटो के किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है. 

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वर्तमान में इसके सदस्य देशों की संख्या 32 है, जिनमें अमेरिका के साथ ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, पोलैंड, तुर्की, नॉर्वे, डेनमार्क, कनाडा, पोलैंड, तुर्की जैसे अधिकांश पश्चिमी, उत्तरी और पूर्वी यूरोपीय देश शामिल हैं. फिनलैंड (2023) और स्वीडन (2024) नाटो के सबसे नए सदस्य देश हैं. यूक्रेन भी नाटो में शामिल होना चाहता है, जिस पर रूस आपत्ति जताता रहा है. रूस का मानना है कि यूक्रेन के नाटो में शामिल होने से, अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों की पहुंच उसकी सीमा तक हो जाएगी. इसी कारण रूस ने यूक्रेन पर फरवरी, 2022 में हमला किया था. चार साल बाद भी दोनों देशों के बीच युद्ध जारी है.

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