करीब छह हफ्तों तक चली विनाशकारी जंग के बाद अब दुनिया की नजरें पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर टिक गई हैं. वही इस्लामाबाद, जो अचानक से दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक जंग का केंद्र बन गया है. अमेरिका और ईरान, जो पिछले कई सालों से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े रहे, अब पहली बार सीधे बातचीत की टेबल पर आमने-सामने बैठे हैं. लेकिन यह मुलाकात जितनी उम्मीदें लेकर आई थी, उसमें उतनी मुश्किलें भी आ रही हैं.
शनिवार को शुरू हुई दोनों देशों की बातचीत देर रात तक जारी रही. शुरुआत राजनीतिक स्तर से हुई, लेकिन जल्दी ही यह बातचीत तकनीकी स्तर तक पहुंच गई, जहां दोनों देशों के विशेषज्ञों ने अलग-अलग मुद्दों पर गहराई से चर्चा की. करीब चार घंटे तक चली आमने-सामने बातचीत के बाद भी साफ हो गया कि रास्ता आसान नहीं है. बातचीत खत्म होने के बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को लिखित प्रस्ताव सौंपे, जो इस बात का संकेत है कि मामला अभी लंबा चलने वाला है.
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इस बातचीत में ईरान की तरफ से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस मौजूद हैं. इनके साथ दोनों देशों के आर्थिक, सैन्य, कानूनी और परमाणु विशेषज्ञ भी शामिल हैं, जो हर मुद्दे को तकनीकी नजर से देख रहे हैं. इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान एक मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, जिसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर शामिल हैं.
होर्मुज स्ट्रेट और जहाजों से टोल टैक्स का मामला
वार्ता तो शुरू हो गई है, लेकिन सबसे बड़ा विवाद अभी भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है. यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है. ईरान चाहता है कि इस रास्ते पर उसका पूरा नियंत्रण बना रहे और वह यहां से गुजरने वाले जहाजों पर अपने नियम लागू कर सके.
इसमें टोल टैक्स भी शामिल है, जिससे ईरान चाहता है कि उसे जंग में हुए नुकसान की भरपाई करने में आसानी होगी. दूसरी तरफ अमेरिका चाहता है कि यह रास्ता पूरी तरह खुला और स्वतंत्र रहे, ताकि वैश्विक व्यापार और तेल सप्लाई बिना किसी रुकावट के जारी रह सके. यही टकराव इस बातचीत की सबसे बड़ी रुकावट बन गया है.
इस्लामाबाद में ईरान के सरकारी टीवी के एक रिपोर्टर ने कहा कि अमेरिका के बातचीत करने वालों ने वार्ता के इस दौर में "मैक्सिमलिस्ट" यानी ज्यादा से ज्यादा हासिल करने जैसा रवैया बनाए रखा, और अविश्वास और निराशा चर्चाओं पर हावी रहा. उन्होंने आगे कहा कि बातचीत का नया दौर यह तय करने की आखिरी कोशिश होगी कि क्या इस्लामाबाद बातचीत दोनों डेलीगेशन की बातों को करीब लाने में मदद कर सकती है.
बातचीत में ईरान की क्या शर्तें हैं?
इसके साथ ही लेबनान का मुद्दा भी कम गंभीर नहीं है. ईरान साफ कर चुका है कि अगर शांति की बात हो रही है, तो वह सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रह सकती. ईरान चाहता है कि लेबनान में भी हमले पूरी तरह बंद हों. उसने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर लेबनान में इजरायली हमले नहीं रुके, तो वह बातचीत में शामिल ही नहीं होगा. कुछ समय के लिए हमलों में कमी जरूर आई, लेकिन अमेरिका और इजरायल अब भी लेबनान को इस सीजफायर का हिस्सा मानने से बच रहे हैं. यही वजह है कि यह मुद्दा भी बातचीत को लगातार उलझा रहा है.
ईरान इस बातचीत में सिर्फ जंग रोकने की बात नहीं कर रहा, बल्कि वह लंबे समय के समाधान की मांग कर रहा है. वह चाहता है कि उस पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं, विदेशों में फंसी उसकी अरबों डॉलर की संपत्ति वापस मिले और उसके परमाणु कार्यक्रम को मान्यता दी जाए. इसके अलावा ईरान जंग में हुए नुकसान की भरपाई की भी मांग कर रहा है और चाहता है कि अमेरिका क्षेत्र से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करे. साफ शब्दों में कहें तो ईरान इस बार आधे-अधूरे समझौते के लिए तैयार नहीं है.
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अमेरिका ईरान से क्या चाहता है?
अमेरिका की अपनी शर्तें हैं. वह चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे, मिसाइल क्षमता कम करे और क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही यह साफ कर चुके हैं कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने की अनुमति किसी भी कीमत पर नहीं दी जाएगी.
इस पर ईरान स्पष्ट भी कर चुका है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और साथ ही अपने मिसाइल प्रोग्राम से समझौता नहीं करेगा. ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि मिसाइल प्रोग्राम पर समझौता उसके लिए सुसाइड से कम नहीं होगा. यही वजह है कि बातचीत में दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं.
इस बातचीत के जो हालात बने हैं उससे अब तक यह कुछ नतीजा नहीं निकला है. एक तरफ यह सकारात्मक संकेत है कि दोनों देश बातचीत जारी रखने को तैयार हैं और अगला दौर जल्द ही होने वाला है. दूसरी तरफ यह भी साफ है कि जिन मुद्दों पर टकराव है, वे इतने बड़े हैं कि उन्हें सुलझाना आसान नहीं होगा. खासकर होर्मुज स्ट्रेट और लेबनान जैसे मुद्दे किसी भी वक्त हालात को फिर से बिगाड़ सकते हैं.
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ईरान के राष्ट्रपति मसू्द पेज़ेश्कियन ने भी साफ कर दिया है कि उनकी टीम देश के हितों से समझौता नहीं करेगी. उन्होंने कहा कि बातचीत जारी रहेगी, लेकिन अगर जरूरी शर्तें पूरी नहीं होतीं तो ईरान पीछे हटने से भी नहीं हिचकेगा. यह बयान साफ दिखाता है कि ईरान इस बार दबाव में आने वाला नहीं है.
अमेरिका-ईरान की वार्ता से पाकिस्तान को क्या मिलेगा?
इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान के लिए भी दांव बहुत बड़ा है. अगर यह बातचीत सफल होती है, तो पाकिस्तान वैश्विक कूटनीति में एक अहम खिलाड़ी के रूप में उभर सकता है. लेकिन अगर बातचीत विफल होती है, तो उसकी छवि पर सवाल भी उठ सकते हैं. यही वजह है कि इस्लामाबाद में सुरक्षा से लेकर कूटनीतिक स्तर तक हर चीज को बेहद गंभीरता से संभाला जा रहा है.
आखिरकार, यह बातचीत सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ने वाला है. तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय सुरक्षा तक, सब कुछ इस पर निर्भर करता है. अब सबकी नजरें अगले दौर की बातचीत पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या दुनिया को राहत मिलेगी या फिर एक नई जंग का खतरा फिर से सिर उठाएगा. अगले दौर की बातचीत आज ही रात या अगले दिन हो सकती है.
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