पश्चिम बंगाल की जिन 207 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की, उनमें से 95 सीटों पर चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों की संख्या, उम्मीदवार की जीत के अंतर से ज्यादा थी. यह इंडिया टुडे डेटा इंटेलिजेंस यूनिट के एक विश्लेषण में पता चला है. यह संख्या 4 मई को बीजेपी की कुल जीती हुई सीटों का लगभग 46 फीसदी है. इसी दिन पार्टी ने दो-तिहाई बहुमत के साथ तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन को खत्म किया था.
यही हिसाब टीएसी द्वारा जीती गई 80 सीटों पर लगाने पर पता चलता है कि उनमें से 44 सीटों पर हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी. यह बीजेपी के मुकाबले एक बड़ा हिस्सा है.
इस रिसर्च से यह साबित नहीं होता कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने की वजह से चुनाव के नतीजों में कोई बदलाव आया, लेकिन इससे यह ज़रूर साबित होता है कि हर सीट के हिसाब से देखें तो, वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों की संख्या इतनी ज़्यादा थी कि उसका असर पड़ सकता था.
'79 लाख नाम हटाए गए...'
चुनाव आयोग ने 2024 के लोकसभा चुनावों और मई 2026 के विधानसभा चुनावों के बीच, एसआईआर प्रक्रिया के तहत, पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से करीब 79 लाख नाम हटा दिए, जो कि कुल मतदाताओं का लगभग 10 फीसदी है. आयोग का कहना है कि इस कवायद का मकसद डुप्लीकेट, मृत और बिना दस्तावेज़ वाले मतदाताओं को सूची से हटाना था. ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि नामों को हटाने की यह कार्रवाई उनके जनाधार को कम करने की एक कोशिश थी.
'मार्जिन से ज्यादा' का क्या मतलब है?
बीजेपी की 95 जीतों में से जहां हटाए गए नामों की तादाद जीत के मार्जिन से ज़्यादा थी, वहीं 80 सीटें ऐसी थीं, जो पार्टी के पास पहले नहीं थीं. बीजेपी ने 2021 में जीती सभी 77 सीटें बरकरार रखीं और 130 और सीटें जोड़ीं. भवानीपुर का उदाहरण लें, जो दक्षिण कोलकाता में ममता बनर्जी की अपनी सीट है. वे यह सीट बीजेपी के CM पद के दावेदार शुभेंदु अधिकारी से 15,105 वोटों से हार गईं. उस निर्वाचन क्षेत्र से 45,240 नाम हटाए गए थे, जो जीत के मार्जिन का तीन गुना हैं.
कोलकाता के टॉलीगंज में भी टीएमसी मंत्री अरूप बिस्वास 20 साल तक सीट पर काबिज़ रहने के बाद 6,013 वोटों से हार गए. SIR के तहत वहां से 33,533 नाम हटाए गए थे. कभी दक्षिण कोलकाता में वामपंथियों का गढ़ रहा जाधवपुर इलाका बीजेपी ने जीत लिया. इस सीट पर जीत का मार्जिन 27,716 वोट था. SIR द्वारा हटाए गए नामों की कुल तादाद 45,892 थी.
बांकुरा ज़िले की इंदस सीट 2021 से BJP के पास थी. 4 मई को पार्टी ने यह सीट सिर्फ़ 900 वोटों से बचा ली. वहां 4,617 वोट हटाए गए थे, जो जीत के अंतर से पांच गुना ज़्यादा थे.
डेटा से पता चलता है कि 2026 में TMC का सबसे मज़बूत प्रदर्शन उन सीटों पर रहा, जहां SIR की वजह से सबसे ज़्यादा वोट हटाए गए थे. 2021 में पार्टी के पास जो 21 सीटें थीं और जहां से 20 फीसदी से ज़्यादा वोटर हटाए गए थे, उनमें से आधे से भी कम सीटें विपक्ष के पाले में गईं, जो कि पूरे राज्य में पार्टी के 63 फीसदी के औसत से काफ़ी कम है. इसके उलट, जिन सीटों से पांच प्रतिशत से कम वोटर हटाए गए थे, उनमें से 86 प्रतिशत सीटें विपक्ष के पाले में चली गईं.
वोट हटाने का सबसे ज़्यादा असर तृणमूल के मज़बूत गढ़ों पर पड़ा और पार्टी ने उन्हीं इलाकों में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया, जहां उसे सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ था. जहां पार्टी हारी और अक्सर जीत के अंतर से भी कम वोटों से हारी, वे ज़्यादातर बीच के इलाके थे.
यही हिसाब-किताब TMC की जीतों पर भी लागू होता है. 4 मई को पार्टी ने जिन 80 सीटों पर जीत हासिल की, उनमें से 44 सीटों पर SIR की वजह से हटाए गए वोटों की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी. यह पार्टी की कुल जीतों का 55 फीसदी है, जो BJP के 46 प्रतिशत के आंकड़े से ज़्यादा है.
मुर्शिदाबाद के समसेरगंज में SIR प्रोसेस के तहत 86,977 वोटरों के नाम हटा दिए, जो राज्य में किसी एक सीट से हटाए गए नामों की सबसे बड़ी संख्या है. TMC ने 7,587 वोटों से यह सीट अपने पास बनाए रखी. उत्तरी कोलकाता के चौरंगी में, इस छंटनी में 83,364 नाम हटाए गए, तृणमूल ने 22,002 वोटों से जीत हासिल की. एसआईआर का असर उन सीटों पर भी पड़ा, जिन्हें TMC ने जीता था, ठीक वैसे ही जैसे उन सीटों पर पड़ा जिन्हें वह हार गई थी.
4 मई के नतीजों की एक अलग व्याख्या पोल करने वालों की तरफ़ से आई है, जिनका तर्क है कि SIR निर्णायक कारक नहीं था. CVoter के यशवंत देशमुख ने 'द फ़ेडरल' के साथ नतीजे आने के बाद हुए एक इंटरव्यू में कहा कि संदेशखाली आरोपों को लेकर महिलाओं का गुस्सा और साथ ही TMC की स्थानीय-निकाय व्यवस्था में भ्रष्टाचार की धारणा जैसे मुद्दों ने वोटर-लिस्ट से नाम हटाने की तुलना में चुनावी रुझान को ज़्यादा प्रभावित किया.
क्या नाम हटाने की प्रक्रिया ने किसी खास धार्मिक या सामाजिक समूह को असमान रूप से प्रभावित किया है, इस पर काफ़ी विरोधाभासी दावे सामने आए हैं. सबर इंस्टीट्यूट ने ECI द्वारा पब्लिश किए गए डेटा का हवाला देते हुए बताया कि नंदीग्राम और भवानीपुर जैसी सीटों पर मुसलमानों के नाम हटाने की दर ज़्यादा थी. वहीं, दूसरी तरफ़, अन्य मीडिया संस्थानों ने डेटा के दूसरे सेट का हवाला देते हुए दिखाया कि राज्य के अन्य हिस्सों में हिंदू-बहुल लोगों के नाम ज़्यादा हटाए गए थे.
लेकिन, DIU सीट-मार्जिन एनालिसिस सिर्फ़ यह देखने तक सीमित है कि क्या कटौती संख्या के हिसाब से इतनी बड़ी थी कि हर चुनाव क्षेत्र में कोई फ़र्क पड़े. चुनाव आयोग ने 2027 के चुनाव चक्र से पहले दूसरे सूबों में भी ऐसे ही बदलावों का संकेत दिया है. अगर बंगाल का पैटर्न बना रहा, तो एसआईआर पर बहस इस चुनाव से ज़्यादा चलने की संभावना है.
दीपू राय / मयंक मिश्रा