26 दिन में फलता में हुए दो चुनाव के बीच बंगाल कितना बदल चुका है?

पश्चिम बंगाल की चर्चित फलता विधानसभा सीट पर री-पोलिंग चल रही है. 2026 चुनाव में फलता सीट पर पहले 29 अप्रैल को मतदान हुआ था, लेकिन चुनावी धांधली के चलते रद्द कर दिया गया था, अब दोबारा से मतदान रहा है. इस तरह 26 दिनों में फलता सीट ही नहीं बंगाल का गेम बदल गया है.

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बंगाल की सियासत क्या पूरी तरह बदल गई (Photo-ITG) बंगाल की सियासत क्या पूरी तरह बदल गई (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 21 मई 2026,
  • अपडेटेड 9:51 AM IST

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले की फलता विधानसभा सीट पर गुरुवार को दोबारा मतदान कराया जा रहा है. चुनाव आयोग ने 29 अप्रैल को हुए मतदान को चनावी धांधली के चलते रद्द कर दिया था और रीपोलिंग का आदेश दिया था. अब फलती सीट पर दोबारा से मतदान हो रहे हैं. इन 26 दिनों में फलता का सियासी रण और बंगाल की राजनीति ही बदल गई है. 

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फलता विधानसभा सीट पर कुल 6 उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं.  बीजेपी से देबांशु पांडा, टीएमसी से जहांगीर खान, सीपीआई से शंभु नाथ कुर्मी, कांग्रेस से अब्दुर रज्जाक और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चंद्रकांत रॉय और दीप हाती मैदान में है. 

हालांकि, टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने रिपोलिंग से पहले चुनावी मुकाबले से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं, लेकिन नामांकन वापस लेने की आधिकारिक समय सीमा खत्म हो चुकी थी. इसीलिए जहांगीर खान के पीछे हटने के बाद भी चुनावी सीन में बने हुए हैं. 

बंगाल के दूसरे चरण में फलता का चुनाव
बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में फलता विधानसभा सीट पर मतदान हुआ था. 29 अप्रैल को जब वोटिंग हुई थी, उस समय सत्ता में ममता बनर्जी काबिज थी.  बंगाल की सियासत में टीएमसी का सियासी दबदबा था.  पारंपरिक रूप से फलता का इलाका टीएमसी और खासकर अभिषेक बनर्जी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है.  2011 से लेकर 2021 तक टीएमसी का फलता सीट पर दबदबा था.  

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अभिषेक बनर्जी के राइट हैंड माने जाने वाले जहांगीर खान फलता सीट से चुनावी मैदान में थे, जिसके चलते उनके सियासी हौसले काफी बुलंद थे. इसके चलते फालता का चुनाव आम सियासी लड़ाई से कहीं आगे निकलकर एक एक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा हो चुका है. चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था, जिन्हें यूपी की सियासत में 'सिंघम' के तौर पर देखा जाता है. 

अजय पाल शर्मा ने फलता सीट पर नकेल कसी तो  टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने एक चुनावी जनसभा में खुलेआम चुनौती देते हुए कहा था, 'अगर तुम सिंघम हो, तो मैं पुष्पा हूं... पुष्पराज, झुकेगा नहीं.' इसके बाद29 अप्रैल को फलता सीट पर हुए चुनाव में मतदान के दौरान काफी धांधली की शिकायत सामने आई थी. ईवीएम मशीन में बीजेपी के चुनाव निशान पर ब्लैक टेक लगा हुआ था, जिसकी शिकायत किए जाने के बाद चुनाव आयोग ने फलता सीट पर हुई वोटिंग को पूरी तरह रद्द कर दिया था. चुनाव आयोग ने 21 मई को दोबारा से वोटिंग कराने का फैसला किया. 

26 दिन कितना बदला बंगाल का सियासी गेम
29 अप्रैल को जब फलता में पहली बार वोट पड़े थे, तब राज्य में टीएमसी सरकार थी, लेकिन 4 मई को आए नतीजों ने बंगाल को पूरी तरह बदल दिया, बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया, जिससे राज्य में 15 साल पुराना टीएमसी का शासन समाप्त हो गया. फलता अब एक 'विपक्षी गढ़' से बदलकर 'सत्तारूढ़ दल के प्रभाव' वाले क्षेत्र में तब्दील हो चुका है. 26 दिनों के भीतर बंगाल के राजनीतिक चेहरों का रसूख पूरी तरह बदल गया. 

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से सुवेंदु अधिकारी से चुनाव हार गईं. फलता के दोबारा चुनाव में जाने तक राज्य की कमान और राजनीतिक धुरी पूरी तरह से बीजेपी और सुवेंदु अधिकारी के हाथों में शिफ्ट हो चुकी है. कानूनी शिकंजा भी कसा जाने लगा तो सारे गेम ही बदल गया. 

इन 26 दिनों में फलता के स्थानीय समीकरणों में सबसे बड़ा भूचाल तब आया, जब टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने ऐन री-पोलिंग से ठीक पहले खुद को चुनावी प्रक्रिया से अलग (किनारा) कर लिया. पहले विधानसभा चुनाव में मजबूती से लड़ रही टीएमसी का इस तरह मैदान से पीछे हटना कार्यकर्ताओं के मनोबल और पार्टी की स्थिति में आए भारी बदलाव को दिखाता है.

फलता का सियासी गेम कैसे पलट गया
फलता विधानसभा क्षेत्र अभिषेक बनर्जी के संसदीय क्षेत्र 'डायमंड हार्बर' का हिस्सा है,  जिसे टीएमसी का सबसे मजबूत किला और 'डायमंड हार्बर मॉडल' कहा जाता था (जहां 2021 में टीएमसी को एकतरफा करीब 89 फीसदी वोट मिले थे). बंगाल में सत्ता बदलने और फलता का चुनाव रद्द होने से टीएमसी के इस अभेद्य किले की राजनीतिक हनक और दबदबा इन 26 दिनों में ध्वस्त हो गया है.

29 अप्रैल को हुए चुनाव में भारी हिंसा, ईवीएम से छेड़छाड़ और बूथ कैप्चरिंग की शिकायतें आई थीं. लेकिन इन 26 दिनों के भीतर चुनाव आयोग ने ढिलाई को पूरी तरह खत्म कर दिया. इस बार सुरक्षा बलों की तैनाती दोगुनी (केंद्रीय बलों की लगभग 35 कंपनियां) कर दी गई. हर बूथ के अंदर-बाहर वेबकैम और आसमान में ड्रोन से निगरानी रखी जा रही है, जिससे चुनावी माहौल का डर पूरी तरह बदल गया है.

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बीजेपी कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हए 
इस चुनाव से ठीक पहले और इन 26 दिनों के दौरान बंगाल में जिस तरह का गेम हुआ है, उससे फलता और उसके आस-पास के क्षेत्रों में इस चुनावी शुद्धीकरण और वोटों के ध्रुवीकरण ने जमीनी गणित को पूरी तरह बदल दिया है,  जिससे अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक वोटों का समीकरण पहले जैसा नहीं रहा.

29 अप्रैल को फलता के मतदाताओं ने हिंसा, झड़पों और खौफ के माहौल में वोट डाला था, जिसके कारण चुनाव आयोग को पूरे 285 मतदान केंद्रों का चुनाव रद्द करना पड़ा। लेकिन आज (21 मई) जब फलता दूसरी बार वोट डाल रहा है, तो राज्य की बदली हुई राजनीतिक व्यवस्था है. बंगाल के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही शुभेंदु अधिकारी ने फलता सीट की कमान खुद अपने हाथों में संभाल रखी है. 

शुभेंदु अधिकारी ने बीजेपी उम्मीदवार देवांशु पांडा के समर्थन में एक बड़ी रैली की और सीधे जहांगीर खान पर निशाना साधते नजर आए थे. शुभेंदु ने सरेआम चेतावनी देते हुए कहा था कि वह (जहांगीर खान) खुद को पुष्पा कहता है, अब इस 'पुष्पा' की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है. फलता के लोगों ने पिछले 10 साल से आजादी से वोट नहीं डाला है, लेकिन इस बार बिना किसी खौफ के मतदान कीजिए और बीजेपी को एक लाख से अधिक वोटों से जिताइए. इससे बीजेपी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के हौसले बुलंद है.

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